Monday, 4 January 2016

आत्म मंथन

आत्म मंथन

कभी सोचा है, हमारी ये इन्द्रियाँ हमें खुद से मिलने देने में कितनी बड़ी बाधा हैं? कान हर घड़ी शोर को सुनते हैं. आँखें बाहरी दृश्यों में रमी रहती हैं. नासिका को सुगंध की आदत. मन चंचल चलायमान। मस्तिष्क को निर्देश देने से फुर्सत नहीं। ठीक है, ये इन्द्रियाँ अपने सारे कर्तव्य निभाएँ लेकिन कभी-कभी खुद से मिलना भी बहुत ज़रूरी है, इसीलिए मेडिटेशन, साधना आदि के उपाय बताए जाते हैं ताकि सब तरफ से अपना ध्यान समेट कर आत्मकेंद्रित किया जाए और अपने भीतर झाँका जाए कि वहाँ सब कुछ ठीकठाक चल रहा है या नहीं? समय-समय पर आत्म-मंथन बहुत ज़रूरी है.

रात मैंने आत्म मंथन किया तो पता चला कि मेरे भीतर तो बहुत सारे अवांछित तत्व साधिकार जमे बैठे हैं. इन सब का सफाया ज़रूरी है. कौन जाने, जब वांछित तत्व आए तो भीतर भीड़ देख कर बाहर से बाहर वापस लौट जाए. सफाई करने की कला सीखने के साथ यह कला भी सीखनी होगी कि मन के दरवाज़े बंद रखे जाएँ, हर किसी के लिए न खोल दिए जाएँ। मन की आँखें खोल, मितवा, मन की आँखें खोल.



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