Monday, 4 January 2016

मेरे मित्र

मेरे मित्र

आज नए साल में मैं अपने उन सभी मित्रों को याद कर रही हूँ जिनका स्नेह मुझे मिला और जिनके स्नेह की छाँह तले मैंने अपने जीवन के गर्दिश भरे दिन गुज़ारे। आज वो सब पता नहीं कहाँ हैं. आज मुझे इस बात का भी गर्व है कि मेरा कोई दुश्मन नहीं है। मुझे नापसंद करने वाले कुछ दिलजले ज़रूर हो सकते हैं। पर जी, मेरे मित्रों का जवाब नहीं था। सिर्फ एक किस्सा सुनाना चाहती हूँ जो मेरी इस बात की गवाही देगा।
मैं अपने पुत्र का जन्मदिन अवश्य मनाती थी। वह चाहे हमेशा हॉस्टल में रहा, पढ़ा, लेकिन उसका जन्मदिन गर्मी की छुट्टियों में पड़ने के कारण उस दिन वह मेरे पास होता था। सारे मित्रों को मालूम रहता था और उस दिन आने के लिए पहले से ही पूछताछ शुरू हो जाती थी। तो हुआ यह कि एक बार मैंने जन्मदिन पर किसी को भी न बुलाने का फैसला किया। क्यों किया, आज याद नहीं, शायद उदासी रही होगी। तो उस वर्ष उस दिन अपने आप एक मित्र आए, 'कहाँ है बॉबी?' एक सहेली आई केक लेकर। एक अन्य मित्र आए हाथ में कुछ पकडे हुए। फिर एक और। फिर एक और। फिर एक और।
'तुमने इस बार मनाया क्यों नहीं?'
'बस ऐसे ही।'
'अब ऐसा करो कि जल्दी से मटर-चावल बना लो। हमें कुछ तो खिलाओगी?'
मैं हैरान। बॉबी खुश। मित्र-मित्राणि आपसी गप्पों में मग्न।
अंत में जब केक काटा जा रहा था, एक प्रिय सखी का प्रवेश हुआ। आक्रोश में तनी हुई, 'अच्छा, सब को बुलाया, मुझे ही नहीं बुलाया?'
'किसी को नहीं बुलाया यार, सब अपने आप आए है।'
'झूठ। केक भी है, समोसे और गुलाबजामुन भी हैं, पुलाव भी है। मणिका, तूने मुझे भूलने की हिम्मत कैसे की?'
'कोई समझाओ इसे। मैंने सिर्फ पुलाव बनाया है। बाकी चीज़ें ये सब लोग लाए हैं। एक तू ही है जो खाली हाथ आई है।'
उसने पर्स से लिफाफा निकाला और बॉबी को पकड़ाते हुए बोली, 'खबरदार, जो मम्मी को दिया तो।'
तो ऐसे दोस्तों पर कौन ना मर जाए खुदा, पत्थर भी मारते है फूलों में लपेट कर।


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