Monday, 22 February 2016

कालबेलिआ नर्तकी गुलाबो

कालबेलिआ नर्तकी गुलाबो

कुछ समय पूर्व मैंने किसी न्यूज़ चैनल पर राजस्थान के लोक नृत्य कालबेलिआ यानि सपेरा डांस को पहचान दिलाने वाली पहली सपेरा नर्तकी गुलाबो को देखा था और बोलते सुना था. मैं प्रभावित हुई थी उसकी सुन्दरता से और आत्मविश्वास से भरी बातचीत से. साथ ही उसके जीवन से जुड़ा एक बड़ा चमत्कार भी मुझे अचंभित कर गया था. तभी सोचा था, गुलाबो के बारे में लिखने के लिए लेकिन व्यस्त रहने के कारण आजकल मेरा फेसबुक पर आना कम हो रहा है. बहरहाल, गुलाबो के जीवन का चमत्कार यह कि ...... गुलाबो अपने माता पिता की सातवीं संतान थी और चौथी बेटी, जिसे लड़की होने के कारण जन्म लेते ही किसी सगे सम्बन्धी द्वारा ज़मीन में गाड़ दिया गया था. लेकिन माता-पिता ने ऐसा नहीं चाहा और जब उसकी माँ ने गाड़ने के पाँच घंटे बाद उसे ज़मीन से निकाला तो उन्हें उसके जीवित होने की कोई उम्मीद नहीं थी. पर जाको राखे साइयाँ, मार सके ना कोए. पाँच घंटे ज़मीन में गड़े रहने के बावजूद गुलाबो जीवित थी. यही चमत्कार था. उसे एक विशिष्ट क्षेत्र में अपना नाम जो बनाना था.

कालबेलिआ नृत्य को जिप्सी डांस भी कहते है. कालबेलिआ यानि खानाबदोश यानि सपेरे। कालबेलिआ प्रजाति मूल रूप से साँपों को पालने वाली प्रजाति है. कालबेलिआ डांस राजस्थान का लोकप्रिय सपेरा डांस है, जिसमें साँपों के movements दिखाए जाते हैं, इस नृत्य को राजस्थान की गुलाबो ने विश्व प्रसिद्धि दिलाई। यूनेस्को ने इस डांस को भारत की सांस्कृतिक धरोहर मान लिया है. गुलाबो ने आठ वर्ष की आयु से स्टेज पर नृत्य करना शुरू किया। जैसा किसी-किसी के नसीब में लिखा होता है कि कोई ऐसा संयोग बनेगा, जो उन्हें बुलंदियों पर पहुँचाएगा। ऐसा ही संयोग गुलाबो के जीवन में भी बना.


Friday, 19 February 2016

स्मार्ट मोबाइल फ़ोन Freedom 251

स्मार्ट मोबाइल फ़ोन Freedom 251

आपने कल Hindustan Times में मुखपृष्ठ और उससे अगले पृष्ठ पर 251 रुपये में मिलने वाले स्मार्ट मोबाइल फ़ोन Freedom 251 का विज्ञापन देखा होगा। यह लाखों का विज्ञापन निश्चित रूप से अन्य अखबारों में भी छपा होगा. इस फ़ोन को बुक करने की अवधि केवल चार दिन है, 18 से 21 फ़रवरी तक, जो उनकी website पर मूल्य राशि + 40 रुपये delivery charges यानि 290 रुपये अग्रिम जमा करके बुक किया जा सकता है. फोन 30 जून तक प्राप्त होगा।


प्रश्न यह है कि क्या वाकई 251 रुपये में स्मार्ट फोन मिल सकता है?

जो कहानी अखबार में छपी ख़बरों एवं सुनी हुई बातों से सामने आई, वह यह है ...... 

मोहित गोयल नामक युवा Amity University का स्नातक है. कुछ अरसा पहले तक वह उत्तर प्रदेश के श्यामली गाँव में अपने पिता की परचूनिये की दुकान संभालने में उनकी मदद करता था. कुछ समय पूर्व उसकी मुलाक़ात IIT के पासआउट Middle aged अशोक चड्ढा से हुई. उन दोनों ने संभवतः यह बिज़नेस प्लान बनाया, जिसमे ज़ाहिर है, Technical दिमाग अशोक चड्ढा का और प्रबंधन मोहित गोयल का होगा। पाँच महीने पहले नॉएडा में मोहित ने Ringing Bells Pvt. Ltd. नामक कंपनी की स्थापना की, वह स्वयं मालिक, उसकी पत्नी CEO, उसके माता पिता तथा अशोक चड्ढा Director हैं. अभी इस कंपनी ने सिर्फ एक एड्रेस बनाया है, इसके पास मोबाइल बनाने की मशीनें तथा अन्य Infrastructure नहीं है. ज़ाहिर है, विज्ञापनों में पैसा मोहित ने लगाया होगा। 17 फ़रवरी को हुए इसके Launch कार्यक्रम में मोहित और चड्ढा, दोनों ने बताया कि इस योजना में उन दोनों का पैसा नहीं है, वे Loan लेंगे और Equity के ज़रिये आए पैसे से इस योजना को कार्यान्वित करेंगे।

यह योजना बनाने वालों ने कमाल का दिमाग पाया है. विज्ञापन की प्रतिक्रिया में उनके पास इतना पैसा एकत्र हो जाएगा कि वे मई में काम शुरू करेंगे और 30 जून तक आर्डर पूरे करेंगे। अब खुदा-ना-खास्ता मोहित गोयल का यह बिज़नेस जम गया और वह करोड़पति .....  नहीं, अरब-खरबपति बन गया तो यही माना जाएगा कि भई, गज़ब का दिमाग पाया है।

Friday, 12 February 2016

कृष्णा सोबती

कृष्णा सोबती

कृष्णा सोबती के नाम से कौन परिचित नहीं होगा? डार से बिछुड़ी, ज़िंदगीनामा, ए लड़की, मित्रो मरजानी, हम हशमत उपन्यासों से प्रसिद्ध, 1980 में अपने उपन्यास 'ज़िंदगीनामा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, हिन्दी की यह सुप्रसिद्ध लेखिका आज नब्वे के दशक में चल रही हैं। इस 18 फ़रवरी को ये अपने जीवन के 91 वर्ष पूरे करेंगी। मेरी उन्हें अनत शुभकामनाएँ।

पिछले दिनों उन्होंने एक साक्षात्कार के दौरान साक्षात्कारकर्ता को बताया कि एक बार उनसे किसी ने पूछा, 'शायद आपका एक प्रेम प्रसंग रहा था।' तो कृष्णा जी ने उत्तर दिया, 'मेरे हालात इतने भी खराब नहीं थे कि एक ही प्रेम प्रसंग होता।'

कृष्णा सोबती जी ने इससे पहले कभी अपने व्यक्तिगत जीवन की ओर कोई संकेत नहीं किया था। वे एक तरह से सिर से पैर तक लबादे में लिपटी एक रहस्यमय व्यक्तित्व की मालकिन रहीं, जिनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में शायद ही कोई जानता हो। तो जीवन के अंतिम पड़ाव में इतनी बड़ी बात कह देना, कि हालात इतने भी खराब नहीं थे कि एक ही प्रेम प्रसंग होता, मायने रखता है।

क्या जीवन के अंतिम पड़ाव में व्यक्ति अपने रहस्यों के बारे में बता कर किसी बोझ से मुक्त होना चाहता है? ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया की मानिन्द?

या

क्या यह सही है कि हर आदमी अपने प्रेम प्रसंगों के बारे में कम से कम किसी एक को बताने के लिए कुलबुलाता रहता है? क्या यह भी सही है कि जीवन में प्रेम प्रसंगों का घटित होना उस जीवन का सफल होना है, जिसे बता कर व्यक्ति अपने मुख्य होने को दर्शाना चाहता है? जिसके जीवन में कोई प्रेम न हुआ हो, क्या उसका जीवन नाकारा है? अपने जीवन में अनेक प्रेम प्रसंगों का होना क्या मनुष्य को अपने ऊपर गर्व करने का मौका देता है? सच है, जिसकी ओर किसी ने चाहत भरी नज़र से नहीं देखा, जिसकी ओर कभी कोई आकर्षित नहीं हुआ, जिसकी ज़रूरत किसी ने महसूस नहीं की, वह इंसान क्या? वह तो सिर्फ माँस का लोथड़ा है।

काश ! कृष्णा सोबती जी एक लेखक होने के नाते अपने अनुभवों को बेझिझक साझा करें। जिनके 'हालात खराब' नहीं होते, उन्हें ज़िन्दगी को खुल कर जीने का और नज़दीक से देखने का मौका मिलता है। लेखक इस नज़दीक से देखे हुए जीवन का लाभ अपने पाठकों को दे सकता है।


Sunday, 7 February 2016

मेरा मरना Kavita 249

मेरा मरना
ज़रा सी ताज़ी हवा पाने को
तोड़ दीं मैंने दीवारें और छत
वरना लोग तो
खिड़की और रोशनदान से भी
काम चला लेते हैं
एक ही फ्रेम में
कई तस्वीरें लगा लेते हैं
समान्तर-समान्तर
सब कुछ चला लेते हैं.
छल और झूठ भी कभी-कभी
कितने खूबसूरत होते हैं
कि लोग खूबसूरती को बनाए रखने के लिए
झूठ को भी सच की तरह ढोते हैं.
क्यों मैंने होना चाहा ईमानदार?
क्यों खुद पर लगाया
सत्यवादी होने का आरोप?
क्यों अपने को जगह-जगह तोड़ा?
आज खुले आसमान के नीचे
मैं कितनी अकेली खड़ी हूँ !
लेकिन दुःख इस बात का नहीं है.
दुःख तो यह है कि मैने
ज़िन्दगी के हिसाब को नहीं जाना
सिर्फ एक वहम की ज़िन्दा रखने के लिए
बेहिसाब मरने को सही माना।

Monday, 1 February 2016

फैशन की अंधी दौड़ में अग्रणी लड़कियों / महिलाओं को सम्बोधित

फैशन की अंधी दौड़ में अग्रणी लड़कियों / महिलाओं को सम्बोधित

क्या हमारा समाज वापस उसी बिन्दु पर पहुँचेगा जहाँ से सभ्यता की शुरुआत हुई थी?

ज़माना कितना भी बदल जाए, स्त्री-पुरुष के मध्य प्रेम की पिपासा हमेशा लहलहाएगी, जहाँ न कोई मुकाबला होता है, न दुराव, होता है तो बस पूर्ण समर्पण, पूर्ण भक्तिभाव। कहीं ऐसा न हो कि हम अपने ही हाथों प्रेम की उस लहलहाती फसल को उजाड़ दें।

फेमिनिस्ट किस ओर बढ़ रहे हैं? क्या स्त्री विमर्श की दिशा स्त्री-पुरुष के 'शरीर' पर टिक गई है? आज़ादी की पक्षधर लड़कियाँ कह रही हैं, 'लड़के अपनी टाँगें दिखा सकते हैं, कच्छे और shorts में घर से बाहर जा सकते हैं तो हम क्यों नहीं? साड़ी ही कौन सा शरीफों का पहनावा है? आखिर उसमें पेट दिखता है, कमर दिखती है. फिर घुटनों से ऊँची ड्रेस में क्या बुराई है? वक्ष स्त्री-शरीर का खूबसूरत हिस्सा है, उसे उभार कर दिखाने वाले वस्त्र क्यों न पहने जाएँ? लड़के बिना कमीज़-बनियान के घूम सकते हैं तो हम भी क्यों नहीं टॉपलेस घूम सकते? टॉपलेस यानि बिना ऊपरी वस्त्र धारण किए। आखिर ऊपर है ही क्या? शरीर का अंग ही तो है। लड़कों को कोई कुछ नहीं कहता। लड़कियों के लिए सारे नियम। यह न पहनो, वह न पहनो। ऐसे रहो, वैसे रहो। हमारी ज़िन्दगी, हम जैसे भी रहें। सड़क पर रेप हो जाए तो लड़कियों को दोष। ऐसे कपड़े पहन कर निकलीं, रात को देर तक सड़क पर घूमीं, इसलिए रेप हुआ। लड़कों को क्यों नहीं कुछ कहते? समझाना है तो लड़कों को समझाओ। हम चाहे सड़क पर नंगे घूमें, किसी को क्या? जिस तरह लड़के रह सकते हैं, उस तरह, उसी खुलेपन से हम क्यों नहीं रह सकते? क्या हम लड़कियाँ हैं, इसलिए? लड़के लड़कियाँ सब बराबर हैं। जो लड़के करेंगे, हम भी वही करेंगे। जिस तरह लड़के रहेंगे, हम भी उसी तरह रहेंगे।'

मुझे लगता है, लड़कियों की सोच सही दिशा में नहीं जा रही। लड़के और लड़की के शरीर की बनावट अलग है। लड़कों के शरीर पर बाल फबते हैं, जबकि लडकियाँ टाँगें खुली रखेंगी तो उन्हें पहले hair remover से साफ़ करेंगी। फिर तो लड़कियों, लड़कों की तरह दाढ़ी-मूंछ भी उगाओ. लडकियाँ टॉपलेस कैसे रह सकती हैं? आखिर सभ्यता की शुरुआत में स्त्री-पुरुष निर्वस्त्र ही रहते थे। सभ्यता की क्रांति ने शरीर ढकना सिखाया। लोग पत्तों से शरीर ढकने लगे। बाद में कपड़े का आविष्कार हुआ। तो क्या हम वापस उसी युग में लौट जाएँ?

सोचो ज़रा, शरीर के जिन अंगों से यौन-आनंद की उत्पत्ति होती है, उन्हें खुला रख कर हर राह चलते को आनंद क्यों लेने दिया जाए? हमारा शरीर फ़ालतू है क्या जो हर राह चलता, सड़कछाप भी कल्पनाओं में उसके मज़े ले ले?

मुकाबला शरीर से नहीं, दिमाग से करें। हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँ और अपनी काबिलियत साबित करें। अपनी सोचने की आज़ादी, निर्णय करने की आज़ादी का हक हासिल करें। पुरुषों से मुकाबले की लड़ाई ज़रूर जारी रखें, लेकिन शरीर के स्तर पर नहीं, अन्य स्तरों पर।

नहीं सुनना-समझना, तो सड़क पर नंगी ही जाएँ, रोज़ गर्भवती हों, रोज़ गर्भपात कराएँ। नहीं सुनना-समझना तो और आगे बढ़ें। पुरुषों को सबक सिखाना है तो जैसे पुरुष आपका रेप करता है, वैसे ही आप पुरुष का रेप करें। अन्यथा रेप की स्थिति में हो-हल्ला न मचाएँ, आराम से enjoy करें ताकि शारीरिक कष्ट न हो।

इन शब्दों ने स्त्री-विमर्शवादियों को यदि झकझोरा हो तो सोच की दिशा बदलें। पुरुष से लड़ाई हक की लड़ाई है, मानदंडों की लड़ाई है, सामाजिक ढाँचे में बदलाव की लड़ाई है, शरीर के स्तर पर उतर कर खुद को अनावृत करने की लड़ाई नहीं है क्योंकि आपका शरीर बहुमूल्य है, उसे दिखा कर मुफ्तखोरों की दिवाली न मनवाएं। उसे देखने का हकदार सिर्फ़ वही है जो आप पर दिल और जान न्यौछावर करे।