Monday, 1 February 2016

फैशन की अंधी दौड़ में अग्रणी लड़कियों / महिलाओं को सम्बोधित

फैशन की अंधी दौड़ में अग्रणी लड़कियों / महिलाओं को सम्बोधित

क्या हमारा समाज वापस उसी बिन्दु पर पहुँचेगा जहाँ से सभ्यता की शुरुआत हुई थी?

ज़माना कितना भी बदल जाए, स्त्री-पुरुष के मध्य प्रेम की पिपासा हमेशा लहलहाएगी, जहाँ न कोई मुकाबला होता है, न दुराव, होता है तो बस पूर्ण समर्पण, पूर्ण भक्तिभाव। कहीं ऐसा न हो कि हम अपने ही हाथों प्रेम की उस लहलहाती फसल को उजाड़ दें।

फेमिनिस्ट किस ओर बढ़ रहे हैं? क्या स्त्री विमर्श की दिशा स्त्री-पुरुष के 'शरीर' पर टिक गई है? आज़ादी की पक्षधर लड़कियाँ कह रही हैं, 'लड़के अपनी टाँगें दिखा सकते हैं, कच्छे और shorts में घर से बाहर जा सकते हैं तो हम क्यों नहीं? साड़ी ही कौन सा शरीफों का पहनावा है? आखिर उसमें पेट दिखता है, कमर दिखती है. फिर घुटनों से ऊँची ड्रेस में क्या बुराई है? वक्ष स्त्री-शरीर का खूबसूरत हिस्सा है, उसे उभार कर दिखाने वाले वस्त्र क्यों न पहने जाएँ? लड़के बिना कमीज़-बनियान के घूम सकते हैं तो हम भी क्यों नहीं टॉपलेस घूम सकते? टॉपलेस यानि बिना ऊपरी वस्त्र धारण किए। आखिर ऊपर है ही क्या? शरीर का अंग ही तो है। लड़कों को कोई कुछ नहीं कहता। लड़कियों के लिए सारे नियम। यह न पहनो, वह न पहनो। ऐसे रहो, वैसे रहो। हमारी ज़िन्दगी, हम जैसे भी रहें। सड़क पर रेप हो जाए तो लड़कियों को दोष। ऐसे कपड़े पहन कर निकलीं, रात को देर तक सड़क पर घूमीं, इसलिए रेप हुआ। लड़कों को क्यों नहीं कुछ कहते? समझाना है तो लड़कों को समझाओ। हम चाहे सड़क पर नंगे घूमें, किसी को क्या? जिस तरह लड़के रह सकते हैं, उस तरह, उसी खुलेपन से हम क्यों नहीं रह सकते? क्या हम लड़कियाँ हैं, इसलिए? लड़के लड़कियाँ सब बराबर हैं। जो लड़के करेंगे, हम भी वही करेंगे। जिस तरह लड़के रहेंगे, हम भी उसी तरह रहेंगे।'

मुझे लगता है, लड़कियों की सोच सही दिशा में नहीं जा रही। लड़के और लड़की के शरीर की बनावट अलग है। लड़कों के शरीर पर बाल फबते हैं, जबकि लडकियाँ टाँगें खुली रखेंगी तो उन्हें पहले hair remover से साफ़ करेंगी। फिर तो लड़कियों, लड़कों की तरह दाढ़ी-मूंछ भी उगाओ. लडकियाँ टॉपलेस कैसे रह सकती हैं? आखिर सभ्यता की शुरुआत में स्त्री-पुरुष निर्वस्त्र ही रहते थे। सभ्यता की क्रांति ने शरीर ढकना सिखाया। लोग पत्तों से शरीर ढकने लगे। बाद में कपड़े का आविष्कार हुआ। तो क्या हम वापस उसी युग में लौट जाएँ?

सोचो ज़रा, शरीर के जिन अंगों से यौन-आनंद की उत्पत्ति होती है, उन्हें खुला रख कर हर राह चलते को आनंद क्यों लेने दिया जाए? हमारा शरीर फ़ालतू है क्या जो हर राह चलता, सड़कछाप भी कल्पनाओं में उसके मज़े ले ले?

मुकाबला शरीर से नहीं, दिमाग से करें। हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँ और अपनी काबिलियत साबित करें। अपनी सोचने की आज़ादी, निर्णय करने की आज़ादी का हक हासिल करें। पुरुषों से मुकाबले की लड़ाई ज़रूर जारी रखें, लेकिन शरीर के स्तर पर नहीं, अन्य स्तरों पर।

नहीं सुनना-समझना, तो सड़क पर नंगी ही जाएँ, रोज़ गर्भवती हों, रोज़ गर्भपात कराएँ। नहीं सुनना-समझना तो और आगे बढ़ें। पुरुषों को सबक सिखाना है तो जैसे पुरुष आपका रेप करता है, वैसे ही आप पुरुष का रेप करें। अन्यथा रेप की स्थिति में हो-हल्ला न मचाएँ, आराम से enjoy करें ताकि शारीरिक कष्ट न हो।

इन शब्दों ने स्त्री-विमर्शवादियों को यदि झकझोरा हो तो सोच की दिशा बदलें। पुरुष से लड़ाई हक की लड़ाई है, मानदंडों की लड़ाई है, सामाजिक ढाँचे में बदलाव की लड़ाई है, शरीर के स्तर पर उतर कर खुद को अनावृत करने की लड़ाई नहीं है क्योंकि आपका शरीर बहुमूल्य है, उसे दिखा कर मुफ्तखोरों की दिवाली न मनवाएं। उसे देखने का हकदार सिर्फ़ वही है जो आप पर दिल और जान न्यौछावर करे।

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