Sunday, 7 February 2016

मेरा मरना Kavita 249

मेरा मरना
ज़रा सी ताज़ी हवा पाने को
तोड़ दीं मैंने दीवारें और छत
वरना लोग तो
खिड़की और रोशनदान से भी
काम चला लेते हैं
एक ही फ्रेम में
कई तस्वीरें लगा लेते हैं
समान्तर-समान्तर
सब कुछ चला लेते हैं.
छल और झूठ भी कभी-कभी
कितने खूबसूरत होते हैं
कि लोग खूबसूरती को बनाए रखने के लिए
झूठ को भी सच की तरह ढोते हैं.
क्यों मैंने होना चाहा ईमानदार?
क्यों खुद पर लगाया
सत्यवादी होने का आरोप?
क्यों अपने को जगह-जगह तोड़ा?
आज खुले आसमान के नीचे
मैं कितनी अकेली खड़ी हूँ !
लेकिन दुःख इस बात का नहीं है.
दुःख तो यह है कि मैने
ज़िन्दगी के हिसाब को नहीं जाना
सिर्फ एक वहम की ज़िन्दा रखने के लिए
बेहिसाब मरने को सही माना।

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