Thursday, 31 March 2016

बिज़नेस के अनुभव

बिज़नेस के अनुभव

बिज़नेस के भी बड़े-बड़े अनुभव हैं. हम Handicraft Items बेचते हैं, हमारे शोरूम में एक जगह चस्पां है : No Exchange, No Refund, No Guarantee. एक ग्राहक ने एक बार टिप्पणी कर दी, 'आप तो बड़े ठसके से चीज़ें बेचते हैं.' हमने चाहते हुए भी उनसे यह नहीं कहा कि 'और जनाब, इन चीज़ों का कोई MRP भी नहीं होता।'
एक किस्सा मज़ेदार है. एक बार मेरा छोटा भाई, सगा भाई, मेरे पास घर में पड़ी एक पीतल की शिव की मूर्ति लेकर आया, बोला, 'इसे तुम बेच लो, बिकने के बाद जो ठीक समझो, मुझे दे देना।' मैंने कहा, 'अभी बताओ, कितने पैसे चाहिए?' 'नहीं, नहीं, तुम अपने पास से क्यों दोगी? बिकने पर दे देना।' 'नहीं भाई, तुम इसे जितने रूपये में मुझे देना चाहो, बता दो.' उसने बड़े संकोच से कहा, 'कबाड़ी तो इसके कुछ नहीं दे रहा, क्या 500 ठीक रहेंगे?' मैंने भाई को 600 रुपये पकड़ाए, 'ये लो 600 रुपये, अब यह जितने में भी बिके, बिके-न बिके, मेरी सिरदर्दी।'
मेरी एक स्ट्रेटेजी और है. मैं बहुत अच्छी पे-मास्टर हूँ इसलिए जहाँ-जहाँ से मेरा सामान आता है, वहाँ मुझसे पैसे माँगने की परवाह नहीं की जाती. 'मैडम खुद दे देंगी, कहाँ भागे जा रहे हैं,' मेरे प्रति उनका यह attitude होता है. अकसर मैं उन्हें हैरानी में डालते हुए पूछ बैठती हूँ, 'पेमेंट अभी करना चाहती हूँ, कैश. कितना दूँ?' 'मैडम, कोई जल्दी नहीं है, आप आराम से दें.' 'नहीं नहीं, पचास हज़ार का बिल है, अभी कैश दूँ तो कुछ कम तो करेंगे?' होलसेल कीमत पचास पर पाँच हज़ार आराम से कम हो जाते हैं. बढ़िया रहता है, नकद भुगतान, नो उधार.
हाँ जी, तो मैं भाई से 600 रुपये में शिव की पुरानी मूर्ति लेने की बात बता रही थी. वह असली ऐन्टीक पीस था. मैंने उसे पीतल की मूर्तियों में सबसे आगे सजा दिया। Next day, one foreigner came to my shop and showed his interest in buying that idol of Shiva. I told him, 'This is not for sale..This is of my fore-fathers time. यह बिक्री के लिए नहीं है, यह हमारे पूर्वजों के ज़माने की मूर्ति है.' But he insisted on buying it. I asked him, 'Ok, how much do you want to pay for it?' 'I can pay maximum 5000/- for it,' hesitatingly he said.  'Ok, done,' I said. 'But I don't have Indian Currency.' He told me. 'You can pay me in dollors,' I said as I had no problem in converting them into Indian currency.. My son used to go to USA on regular basis. That time, the rate of dollor was 40/-. I calculated and asked him to pay 125 dollors. He checked his wallet and said, 'Sorry, I've only 120.' I said, 'Never mind, give me 120.' Next day I got it converted into Indian Currency and got about Rs. 5800/-. So that was my salesmanship strategy.
बाद में मैंने भाई को बताया, कहा, 'भाई, आकर और पैसे ले जा.' वह बोला, 'नहीं, जो मेरी किस्मत में था, मुझे मिला, जो तुम्हारी किस्मत में था, तुम्हें मिला। मैं एक मूर्ति बेचने कहाँ जाता, कबाड़ी 100 रुपये भी नहीं दे रहा था, तुमने मेरे 500 कहने पर 600 दिए, मेरे लिए वही बहुत था. इतनी बड़ी दुकान लिए बैठी हो, सैकड़ों मूर्तियों में एक मूर्ति वह भी थी, इसलिए बिक गई, वरना एक अकेली मूर्ति क्या इतनी कीमत पर बिक पाती? मैं कहाँ बेचने जाता?'
अब हम पर तरस खाइए, इसके बावजूद हम हमेशा घाटे में रहते हैं.

Tuesday, 29 March 2016

फूलझाडू

फूलझाडू

हम घर का यानि रसोई का सामान फिक्स्ड दाम के बड़े स्टोर से खरीदते हैं जैसे बिग बाजार, स्पेंसर्स, ईज़ी डे से. चीज़ महँगी हो, सस्ती हो, इससे कोई मतलब नहीं, जो चाहिए होता है, जो मन होता है, लेते जाते हैं और बिल चुका देते हैं. एक-एक चीज़ का दाम हमारे घर में शायद किसी को न पता हो, कम से कम मुझे तो नहीं पता. शॉप्रिक्स मॉल में, जहाँ मेरी दुकान है, वहाँ दो बड़े स्टोर हैं, स्पेंसर्स और ईज़ी डे. ई डी एम मॉल में जहाँ मेरी दुकान है, वहाँ है, बिग बाजार। तो कल मैंने शॉप्रिक्स मॉल से घर लौटते हुए अपनी सेल्सगर्ल को 100 रुपये पकड़ाए कि चूँकि दुकान की फूलझाड़ू टूट गई है तो एक फूलझाड़ू खरीद ले. आज सुबह उसका फोन आया, 'मैम, स्पेंसर्स में फूलझाड़ू 161 रुपये की है, मैंने नहीं खरीदी।'

'ठीक है, आज सफाई वाली को बोलो कि सिर्फ पोछा लगा कर जाए. मैं घर से झाड़ू ले आऊँगी,' मैंने उसे निर्देश दिया और घर की कामवाली से कहा, 'एक फूलझाड़ू दुकान के लिए गाड़ी में रख दो.'

वह बोली, 'घर में कोई फ़ालतू झाड़ू नहीं है, एक नीचे के लिए है, ऊपर की झाड़ू ऊपर है, सबसे ऊपर की झाड़ू सबसे ऊपर है, बाहर की झाड़ू अलग है.' मैंने कहा, 'ओए महारानी, तेरा दिमाग खराब हुआ है? तीनों खन के लिए एक झाड़ू इस्तेमाल कर, बाहर के लिए अलग झाड़ू ठीक है. इस तरह घर में दो झाड़ू फ़ालतू हैं. एक गाडी में रख. पता है, झाड़ू कितनी महँगी है? 161 रुपये की.'

'नहीं मम्मी,' बीच में बरखा बोली, '161 की नहीं है, ये जो कॉलोनी में बेचने आता है, वह 150 की देता है. दुकान के लिए उससे खरीद लेंगे. घर से मत ले जाओ.'

'तो 150 कम होते हैं क्या?' मैंने कह कर कॉलोनी के परचूनिये को फोन मिलाया और उससे फूलझाड़ू का दाम पूछा। वह बोला, 'एक 70 की है, प्लास्टिक के हत्थे वाली, एक 80 की, स्टील के हत्थे वाली।'

'तुम 70 वाली एक भिजवा दो,' मैंने उसे घर का नंबर बताया और अपने ऊपर हैरान होती रही कि झाड़ू के दाम इतने बढ़ गए और मुझे पता ही नहीं। और यह भी कि दामों में कहीं एकसारता क्यों नहीं है?

इन बड़े स्टोर में हर चीज़ पर कोई न कोई स्कीम होती है, चार नमकीन लो तो एक नमकीन फ्री, एक अचार को बॉटल के साथ एक फ्री, दो पेप्सी लो तो 10 रुपये कम, एक किलो मटर के पैकेट के साथ 250 ग्राम मटर का पैकेट फ्री, यहाँ तक कि पिछले वर्ष 5 किलो बासमती चावल के पैकेट के साथ 5 किलो का वैसा ही पैकेट फ्री। लेकिन किसी भी स्कीम में झाड़ू फ्री नहीं है. क्या इन सब फ्री की कसर झाड़ू से पूरी कर रहे हैं?

मुझे लग रहा है, झाड़ू का बढ़ा दाम देख कर मेरा पतन हो गया जो आज मुझे झाड़ू पर पोस्ट लिखनी पड़ी. मित्रों, क्षमा करना।

Tahmina Durrani

Tahmina Durrani

पाकिस्तान की औरतें भी कम नहीं

I've two books of Pakistani writer Tehmina Durrani, her autobiography 
MY FEUDAL LORD and novel BLASPHEMY. A lot more has been written about her during last 20 years. Many times I also thought of writing about her, but before starting to write, many questions about her personal life made me sad and left me depressed. She seems to me a true fighter, a real warrior and a living example of absolutely liberated woman, who not only struggled to come out of her wrong marriage at a price of loosing custody of her children, but also struggled to make a place for herself on the literary front. When her first book, her autobiography, MY FEUDAL LORD published, it shook the Pakistani society. Nobody could believe that a girl from Pakistan's most influential and high class family, married to a most prominent political figure, would dare to sacrifice her reputation to fulfil her dreams of standing on her own. 
Tehmina Durrani, who is a former wife of former Punjab governor Ghulam Mustafa Khar and a noted writer, author of best-selling books and novels, had married to Pakistan 
Punjab Chief Minister Shahbaz Sharif and is living with him. This is third marriage for both, Tahmina and Shabaz. She started a campaign for women’s empowerment in 2001. He latest book, HAPPY THINGS IN SORROW TIMES was launched in 2013.

पिछले बीस वर्षों में तहमीना दुर्रानी के लिए क्या कुछ नहीं लिखा गया? देर से ही सही, दो शब्द-पुष्प मेरे भी.
हमारे भीतर जलती हुई वह कौन सी ज्वाला है जो हमें चैन से नहीं बैठने नहीं देती? समाज के हर सवाल को ठुकरा कर आदमी मानो जंगलों में निकल पड़ता है, अपनी भटकनों का उत्तर खोजने के लिए. पाकिस्तान जैसे दकियानूसी विचारधारा के सामाजिक वातावरण में पली-बढ़ी इस महिला के साहस ने उस समय पाकिस्तान के समाज को हिला कर रख दिया था. कोई विश्वास नहीं कर सका था कि पकिस्तान के बहुत ही प्रभावशाली और उच्च वर्गीय खानदान में जन्म लेकर, एक अत्यन्त नामी राजनीतिज्ञ से विवाह के कई बरस बाद उन्होंने उस गलत शादी से बाहर निकलने का फ़ैसला किया, जिसमे उन्हें अपने बच्चों तक की कस्टडी छोड़ देनी पड़ी. Tehmina Durrani, who is a former wife of former Punjab governor Ghulam Mustafa Khar and a noted writer, author of best-selling books and novels, had married to Pakistan Punjab Chief Minister Shahbaz Sharif and is living with him. This is third marriage for both, Tahmina and Shabaz. ज़िन्दगी को अपने तरीके से जीने की धुन में बदनामी झेलने का साहस उनमे कहाँ से आया होगा? वे एक सच्ची योद्धा थीं जिन्होंने अपनी शर्तों पर जीवन जिया, नारी शक्ति की, स्त्री स्वातंत्र्य की जीती-जागती मिसाल. उन्होंने सही किया या गलत, हम इसकी आलोचना करने वाले कौन? पर उन्होंने जो भी किया, अपने दम पर किया. इतनी हिम्मत जुटाना भी हिम्मत की बात है. उनकी आत्मकथा MY FEUDAL LORD और उपन्यास BLASPHEMY उनकी विजय-गाथा के उदाहरण हैं. She started a campaign for women’s empowerment in 2001. He latest book, HAPPY THINGS IN SORROW TIMES was launched in 2013.

Sunday, 27 March 2016

मैं शहंशाह हूँ

मैं शहंशाह हूँ

काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाए
एक लीक काजल की लागि है तो लागि है.

जिन लोगों की कोठरियाँ काजल से भरी होती हैं, मैं वहाँ ज़रूर जाती हूँ, उस अँधेरे में कुछ रोशनी भरने। उनकी कोठरियों में रोशनी हो जाती है पर मैं एक लीक काजल की साथ लेकर लौटती हूँ. मेरी सद्भावना की प्रतिक्रिया में उपजी कुछ काली रेखाएँ बदले की आग में जल-भुन कर मुझे परेशान करने आ जाती हैं. अप्रत्याशित सा कुछ देख कर कुछ पल के लिए मेरा असहज हो उठना स्वाभाविक है. लेकिन फिर जल्दी ही मैं अपने को समेट कर जैसे दोबारा युद्ध के लिए तैयार हो जाती हूँ. काजल की कोठरी में जाना मैं कैसे छोड़ दूँ? आखिर उन्हें मेरी ज़रूरत है.

दोस्तों, कई बार मैं खुद पर गर्व करती हूँ कि मणिका मोहिनी, क्या दिमाग पाया है तुमने। भाई लोगों, इज़्ज़त केवल लड़कियों / महिलाओं की ही खराब नहीं की जा सकती, लड़कों / पुरुषों की भी तहस-नहस की जा सकती है. पुरुषों के शरीर को नंगा करके यदि उन्हें बेइज़्ज़त नहीं समझा जा सकता, तो उनके पास रुतबा-रुआब तो होता है, परिवार और समाज तो होता है, कोई काम-धंधा तो होता है, मिला दो सब मिटटी में. और अगर यह कुछ भी नहीं है तो किसी फकीर से क्या डरना? कई मायनों में मुझे लगता है, मैं शहंशाह हूँ ('शहंशाह' फिल्म याद है ना?), शब्दों का नकाब लगा कर निकलती हूँ और बुरों को चौराहे पर बेनकाब करती हूँ. कौन पुलिस, कोर्ट, कचहरी के चक्कर में पड़े? मेरे पास शब्द हैं ना भिगो-भिगो कर मारने के लिए. मैं अपने शब्दों के सहारे ज़िंदा हूँ, ताकतवर हूँ, जीवन की हर लड़ाई को जीतने में सक्षम हूँ.

Thursday, 24 March 2016

यह किस्सा भी खूब रहा

यह किस्सा भी खूब रहा

जी, बाई गॉड की कसम. यह किस्सा भी खूब रहा. उसने मुझे FR भेजी। वैसे तो मैं दो-तीन म्यूच्यूअल फ्रेंड्स देख कर स्वीकार नहीं करती लेकिन उसका हाई क्लास स्टेटस देख कर स्वीकार कर ली. शुरू में मैं कभी उसकी पोस्ट पर नहीं गई. मुझे ध्यान भी नहीं, होगा कोई. अचानक मैंने महसूस किया कि वह मेरी हर पोस्ट को Like तो करता ही है, कभी-कभी हल्का-फुल्का कमेंट भी करता है. और तो और, मैं जिस मित्र की पोस्ट पर जाती हूँ, वह उसका मित्र न होने पर भी Public पोस्ट के कारण वहाँ भी मेरे कमेंट के बाद हल्का-फुल्का कमेंट करता है. कोई बात नहीं। मैंने भी उसकी पोस्ट पर Like-Comment करना शुरू किया। एक बार उसने मेरी वह पोस्ट शेयर की, जिसके नीचे मैंने लिखा था, Not to be shared. मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती जो मना करने के बावजूद मेरी पोस्ट शेयर करें। पर उसने कमेंट में लिखा, 'Madam, your post is too good, I could not resist sharing. Plz allow me.' मैंने जवाब दिया, 'Ok. Never mind.' And I allowed him, just because of his status. (मुझे वे मित्र क्षमा करें जो स्टेटस, हैसियत, औकात जैसे शब्दों पर भड़क उठते हैं. मैं खुल्लम-खुल्ला बोलती कि I am a status conscious person and HE WAS OF HIGH STATUS. एक बात और, मुझे वर्दी वाले बहुत आकर्षित करते हैं, डॉक्टर, वकील, पुलिस वाले, डिफ़ेंस वाले, यहाँ कि जेल की वर्दी वाले भी. वर्दी कोई भी हो, बस चपरासी और ड्राइवर की न हो. हाहाहा।) तो साहब, मैंने भी उसकी पोस्ट पर Like-Comment करना शुरू किया। मैंने उसकी पिछले दो-तीन साल की पोस्ट्स खंगाली, घोर रोमैंटिक पोस्ट्स थीं. शायद मेरी पोस्ट्स भी रोमैंटिक होती हैं, इसीलिए उसने मुझे मित्रता अनुरोध भेजा होगा। एक बात जो मुझे रोमांचित करती थी, वह यह कि उसके सैकड़ों, हज़ारों मित्रों में मैं उसकी एकमात्र महिला मित्र थी यानि I was his only 'GIRL FRIEND.' यहाँ की एक-दो लड़कियों ने मुझे बताया कि उन्होंने उसे FR भेजी पर उसने reject तो की ही, अपना वह option भी बंद कर दिया जिससे FR भेजी जा सके. GREAT.

एक दिन मैंने अपनी पुत्रवधु को सम्बोधित करके हास्य की एक पोस्ट डाली, जो यूँ थी : एक दिन बरखा की पुत्रवधु भी उससे यह कहेगी, Dear Mother-In-Law, dont teach me how to handle my children. I am living with one of yours who needs a lot of improvement. : लो जी गज़ब हो गया. उसने मेरी पोस्ट के कमेंट में ही लिख दिया, 'मैंने बहुत सहा है. माँ और पत्नी के बीच पिस कर रह गया हूँ. किसी से अपना दुःख शेयर करना चाहता हूँ पर कुछ कह नहीं पाता।' मैंने उसका कमेंट तुरंत हटाया. पर तुरंत भी कहाँ? एक घंटे बाद देखा, तब देखते ही हटाया। तो वह मुझसे कुछ कहना चाहता था. जो इस तरह के दुखी पति होते हैं, वे मुझे अपने बेटे लगने लगते हैं. मैं तड़प उठती हूँ कि हाय, कैसे उनका दुःख दूर हो? मेरा पुत्र और पुत्रवधु ही शायद एकमात्र खुश और सुखी कपल हैं, जिसके लिए मैं कभी-कभी पुत्रवधु को कह देती हूँ, 'तू तो बड़ी बेवकूफ़ है, ज़रा ध्यान तो दिया कर, तेरा पति किससे फेसबुक पर बात कर रहा है? किसे कार में लिफ्ट दे रहा है?' उसका बिंदास उत्तर होता है, 'छोडो मम्मी.' सच है, स्पेस देने से ही रिश्ते अच्छे से निभते हैं.

तो मैं आपको बता रही थी कि पत्नियों के सताए लड़के मुझे अपने बेटे लगते हैं और मैं उनके लिए बहुत दुखी होती हूँ. लडकियाँ मुझसे इस बात पर नाराज़ हो सकती हैं पर मैं स्पष्ट कर दूँ कि पतियों की सताई लड़कियाँ मुझे अपनी बेटी नहीं लगतीं बल्कि मुझे उन पर क्रोध आता है कि मूर्ख, निकलती क्यों नहीं गन्दगी से? क्यों सड़ रही हैं नरक में? मैं किसी पोस्ट में यह पहले लिख चुकी हूँ कि जल्लाद पतियों के चंगुल से निकलना आसान है, जल्लाद पत्नियों के चंगुल से निकलना आसान नहीं. मुझे अब किसी के लिए दुखी नहीं होना, क्योंकि मैं किसी का दुःख दूर नहीं कर सकती। मुझे अपने इस पुत्र-सम मित्र को अमित्र करना पड़ा. पर होली की दुआएँ तो उसे दे ही दूँ. शायद होली का कोई रंग उसके रिश्तों में रंग भर दे.

Sunday, 13 March 2016

मेरा देश प्रेम

मेरा देश प्रेम

मुझे इन दिनों यह अहसास हुआ है कि मुझमें देशभक्ति कूट-कूट कर भरी है. जब मैं बच्ची थी, मुझमें गाँधी, नेहरू के प्रति बड़ा सम्मान था. उनका नाम ही काफी था, क्योंकि मैंने उन्हें कभी देखा नहीं था। उन्हें नेता समझने की तो समझ ही नहीं थी, उन्होंने देश को आज़ाद करवाया, बस यही पता था. कांग्रेस पार्टी देश से जुडी हुई लगती थी, क्योंकि देश आज़ाद होने के साथ ही वह पार्टी क्रियाशील हुई थी. इन्दिरा गाँधी के द्वारा लगाईं गई एमरजेंसी तक न राजनितिक पार्टियों की समझ थी, न देश की राजनीति का पता था. एमरजेंसी के दौरान यह ज़रूर लगा था कि हमारे देश की जनता एकदम उजड्ड और अनुशासनहीन है, इसे किसी सख्त क़ानून से काबू में रखने की ज़रूरत है. (यह मैं इन दिनों भी सोच रही हूँ कि इस देश में एमरजेंसी (आपातकाल) लागू होनी चाहिए। मोदी जी को इस पर अमल करना चाहिए।) फिर इन्दिरा जी की मौत और राजीव गाँधी की मौत (सही शब्दों में कहें तो दोनों की हत्या) को मैंने दिल की गहराई तक महसूस किया, यहाँ तक कि उस समय मैं अपने आँसू भी नहीं रोक पाई थी. उस समय तक मेरे लिए वही देश थे. अब, ज़ाहिर है, मैं नरेंद्र मोदी जी के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हूँ. मुझे लगता है, देश को सुचारू रूप से चलाने में एकमात्र मोदी जी ही सक्षम हैं. ये सब बातें देश की ही हैं.

देश को हम व्यक्तियों के माध्यम से ही जानते हैं. हम अच्छे हैं तो हमारा देश अच्छा है. हम तरक्की कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि हमारा देश तरक्की कर रहा है. हमारे देश में कोई विकास कार्य होता है, कोई आविष्कार होता है, तो करते तो मनुष्य ही हैं, लेकिन देश का मस्तक ऊँचा होना कहा जाता है. देश जातिवाचक संज्ञा है, जो देशवासियों के ज़रिये ही जानी जाती है. देश का अपना कोई चरित्र नहीं होता, उसका चरित्र उसमें रहने वालों के चरित्र से ही बनता है.

देश के प्रति मेरा लगाव गहरा रहा है, इस बात का अहसास मुझे तब भी हुआ, जब मैंने नव युवावस्था में एक सखी के मुख से स्विट्ज़रलैंड के प्राकृतिक सौंदर्य की चर्चा सुनी। उस सखी को भी भारत पसंद था, इसीलिए उसने इन शब्दों में बताया कि स्विट्ज़रलैंड में मैन-मेड (मनुष्य के द्वारा बनाई गई) प्राकृतिक सुंदरता है, हमारे देश से उसका क्या मुकाबला? हमारे भारत में जगह-जगह प्राकृतिक सम्पदा बिखरी पड़ी है, हम पर प्रकृति की मेहर है. जब हमें प्रभु ने भौगोलिक सौंदर्य के मामले में इतना अमीर बनाया है, तो उपभोग करने हम कहीं और क्यों जाएं? पहले अपना देश तो पूरा घूम लें. इसका हर पहाड़, नदी, समुद्र, गुफ़ाएँ, कन्दराएँ, तो देख लें. हवा, मिट्टी, अंधड़, सूखा, अकाल, बाढ़, इन सबके बाद धरती जो स्वतः आकार लेती चली गई, पहले उससे तो रूबरू हो लें. विदेश भी घूम लेंगे। इसी ज़िद में मैंने अपना लगभग पूरा देश घूम लिया। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, महाराष्ट्र से लेकर बंगाल-आसाम तक. अभी बचा है, यात्राएँ जारी हैं.

विदेश जाने का कोई सपना न होने पर भी भाग्य ने या संयोग ने विदेश में नौकरी करवाई। वहाँ तीन वर्ष तो रहना ही था, आराम से तीन से छह वर्ष तक और रहा जा सकता था, जिसका मतलब था, अधिक धनोपार्जन, अधिक धन-प्राप्ति, लेकिन पहले तीन वर्ष काटने भी मुश्किल हो गए. मेरा समस्त परिवार यानि मेरा पुत्र मेरे साथ था, उसका दिल वहाँ लगा हुआ था, लेकिन मैंने विचित्र रूप से इस अजीब सी भावना को महसूस किया कि जैसे कोई मुझे भारत की ओर खींच रहा है, जैसे मेरे देश की मिट्टी मुझे बुला रही है. सुखों में कोई कमी नहीं थी वहाँ। शहर भी इतना खूबसूरत। नौकरी में गज़ब का रुतबा-रुआब। मान-सम्मान इतना जैसा कभी अपने देश में रहते नहीं मिला था. पैसा भी भरपूर। चैन से साहित्य-रचना का भी सुख. पुस्तकें पढ़ने के लिए समय ही समय. पर देश की मिट्टी नहीं थी. बस, मुझे भारत वापस लौटना है. भारत जाकर चाहे किसी से न मिलो, एक कमरे में बंद रहो, फिर भी शान्ति मिलती है. तो वहाँ मैंने देश के प्रति अपना असीम लगाव महसूस किया। तबादले के लिए जी तोड़ कोशिश की, यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधानमन्त्री को भी पत्र लिखा कि मुझे मेरे देश वापस बुलाएँ। और मैं वापस लौट आई, एक टर्म भी पूरी तरह से पूरी किए बिना। अपने इंजीनियर बेटे को भी यही समझाया कि अपना देश अपना देश होता है, किसी अन्य देश में सेटल नहीं होना। मैं खुश हूँ कि आज मैं सपरिवार अपनी धरती पर हूँ.

अब इन दिनों, जब देश में इतनी गड़बड़ें हो रही हैं, जैसे सारा देश जल रहा है, चारों तरफ़ खुराफातें, एक-दूसरे की काट, मैं बेहतर, तू बदतर, तो मन दुखी हो उठता है. देश का भविष्य कुछ अच्छा नज़र नहीं आता. हर वक़्त डर लगा रहता है, न जाने क्या हो? कब, कहाँ मारकाट हो जाए? कब, कहाँ उखाड़-पछाड़ हो? हम यह सोचें कि हमें न किसी धर्म को बचाना है, न जाति को. हमें न किसी मज़हब से सरोकार है, न किसी पंथ से. हमें सिर्फ इंसानियत को बचाना है. इसी से बचेगा देश. और जैसा कि मैंने पहले कहा, देश कोई व्यक्ति नहीं है जो उठ कर, चल कर खुद आगे बढ़ेगा। व्यक्तियों के माध्यम से हो देश चलेगा। इसके लिए एक सबल नेतृत्व की आवश्यकता है. हर आदमी एक अलग पहचान के रूप में खड़ा होकर देश नहीं चला सकता। चुनना तो किसी एक को ही पड़ेगा, जो देश की बागडोर सम्भाले।

Saturday, 12 March 2016

कविता रीमिक्स Kavita 251

कविता रीमिक्स

मैं वहाँ नहीं पहुँची हूँ 
जहाँ मुझे होना चाहिए
पर मैं वहाँ भी नहीं हूँ 
जहाँ मैं हुआ करती थी.
कुछ तो चली हूँ मैं लड़खड़ाए क़दमों से
कुछ अभी बाकी है उम्र ख़त्म होने तक.

मैं जैसी हूँ, कि वैसी हूँ
मैं वैसी हूँ, कि कैसी हूँ?
कभी मैं आईना देखूँ
कभी खुद को पढ़ा करती।
मेरी नींदें हुई गायब अजीब दहशत में
रात खामोश सिसकती है सुबह होने तक.

खौफ फैला है हवा में
सारे रास्ते मुश्किल हुए
आकाश आतुर गरजने को 
चारों दिशाएं हिल रही हैं.
असमंजसों में झूल रहा हर अधूरा स्वप्न 
दिलासा दूँ क्या इस दिल को सबर होने तक.

खाली दिमाग शैतान का घर

खाली दिमाग शैतान का घर

हमारे देश में जो घट रहा है, उसमें हमारी समस्या, सच मानिए, न बीजेपी है, न कॉंग्रेस, न केजरीवाल, न जेएनयू, न राष्ट्रविरोध, न जाट, न आरक्षण, न हिन्दू कट्टरवादी, न मुस्लिम कट्टरवादी, न मन्दिर, न मस्जिद, न गाय और सूअर के मांस पर प्रतिबन्ध, न कुछ और. ये सब मुद्दे मुद्दे हैं ही नहीं। इनमें उलझे रहने से देश का विकास नहीं होगा। ये सारी बातें विकास-विरोधी हैं. वस्तुतः समस्या कहीं और है. समस्या है हमारे दिमाग का खालीपन जो बेकार, गैरज़रूरी, निष्क्रिय, नकारात्मक, कुंठित, फ़ालतू ख्यालों से भरा रहता है. प्रतिद्वंदिता के इस युग में, जब देशवासियों को देश की उन्नति के लिए नए-नए आविष्कारों के बारे में सोचना चाहिए, सामूहिक खुशहाली पर बल देना चाहिए, नए-नए विचारों को जगाना चाहिए, हमेशा देश की तरक्की की बात सोचनी चाहिए, हम व्यर्थ की बहसों में उलझे हुए हैं, अपने व्यतिगत स्वार्थों की पूर्ती के लिए आज इससे तो कल उससे झगड़ रहे हैं. क्योंकि सच मानिए, हम सबका पेट भरा हुआ है. भूखे पेट आदमी सिर्फ रोटी की सोचता है. पेट भरा हुआ है, इसीलिए खुराफातें सूझती हैं. पेट भरा हुआ है लेकिन दिमाग खाली है. खाली दिमाग शैतान का घर. हमारी चर्चाओं का विषय देश का विकास क्यों नहीं है? क्या हम विकास-विरोधी हैं? विकास-विरोधी यानि राष्ट्र-विरोधी। हम कभी भी खुश नहीं थे, हम कभी खुश नहीं रह सकते, देश में किसी भी पार्टी का वर्चस्व हो, हमें उसकी आलोचना करनी ही करनी है. आज गद्दी उनके हाथ में है तो हम उन्हें बुरा कह रहे हैं. कल गद्दी नके हाथ में होगी तो हम न्हें बुरा कहेंगे, क्योंकि हमें खुश रहना नहीं आता. हम सबके दिमागों में लड़ाई के कीड़े घुसे हुए हैं. हम इस दिशा में क्यों नहीं सोचते कि हमारा देश विश्व में सर्वोपरि हो, तकनीक में, सुख-सुविधाओं में, सौंदर्य में, प्रेम-भाईचारे में, आर्थिक ऊँचाई पर, भौतिक ऊँचाई पर, नैतिक ऊँचाई पर. मेरा भारत जो आज है, कल उससे बेहतर हो. सोचिए, सोचिए। आज  इंटरनेट के इस युग में हमें सही सन्देश फैलाते देर नहीं लगेगी।

Thursday, 10 March 2016

विदेशों में बसे हुए भारतीय

विदेशों में बसे हुए भारतीय

विदेशों में बसे हुए भारतीय, चाहे वे किसी धर्म-सम्प्रदाय के हों, असहिष्णु होते हैं, या वहाँ जाकर असहिष्णु हो जाते हैं. (हाँ, कुछ अपवाद भी हैं जो नार्मल तरीके से पेश आते हैं,)

विदेशों में बसे हुए भारतीय अपने देश की मिट्टी से इस कदर जुड़े हुए होते हैं, जितने हम लोग अपने देश में रहते हुए भी जुड़े हुए नहीं होते। देश में रहते हुए चाहे कुछ सिरफिरे लोग अपने देश को ही नकार दें लेकिन विदेश में जाकर उन्हें अपने देश की कीमत पता चलती है. ऐसी बात नहीं कि विदेश की धरती पर अपने देश के सिरफिरे नहीं होते। होते हैं, इसीलिए वे वहाँ जाकर भी नकारवादी बातें करते हैं पर करते अपने देश की ही हैं. दूसरी धरती पर बैठ कर अपने देश को गालियाँ देते हैं, आखिर गालियाँ देते तो अपने देश को ही हैं ना? अपने देश की गंध को अपने इर्द-गिर्द न पाकर वे इतने बौखलाए रहते हैं कि विचित्र हरकतें करने लगते हैं. वहाँ रह कर भी अपने देश की गन्दी राजनीति करते हैं, देश की हर बात में टाँग अड़ाते हैं, दखलंदाज़ी करते हैं, इसलिए नहीं कि उनके बिना हमारा देश चल नहीं सकता, बल्कि इसलिए कि पराए देश में पैसे की चकाचौंध में वे जी तो रहे होते हैं, लेकिन उन्हें हर पल यह डर लगा रहता है कि कहीं एक दिन ऐसा न आए कि वे अपनी जन्मभूमि को भूल जाएँ या जन्मभूमि उन्हें भूल जाए. देशवासियों के मध्य अपना ध्यान आकर्षित करने के लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं. देश को गाली देना भी उनका एक हथकंडा होता है. क्योंकि कुछ अच्छा काम करेंगे तो पहचान बनाने में उम्र लग जाएगी। बुरा करो ताकि जल्दी नज़र में आओ. बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? हैं वस्तुतः यह देश के प्रति उनका लगाव ही, जो उन्हें मोहमाया से मुक्त नहीं होने देता। पर कुसंस्कारी होने के कारण लगे हुए हैं गलत संस्कार फैलाने में. इन्हें सद्बुद्धि आ नहीं सकती, इसलिए ईश्वर से क्या कहना कि ईश्वर, इन्हें सद्बुद्धि दे.

विदेशों में रह रहे कुछ लोग धर्म पर अटके रहते हैं. कोई ज़रा सा उनके धर्म का नाम ले ले, वे भड़क उठते हैं क्योंकि अपने देश की धरती छूटते ही असहिष्णुता उन्हें जकड लेती है. उनके धर्म का शब्द कहीं आया नहीं कि वे अपने देश से समूल उखड़ जाने की आशंका से भयभीत हो उठते हैं, अपना देश-धर्म उन्हें प्यारा है इसलिए हर पल अपने पाँवों के नीचे से अपने देश की धरती के खिसक जाने का भय सताता रहता है. वे सोचते हैं कि उनका धर्म और सम्प्रदाय केवल उनके कन्धों पर टिका है, उनकी ही ज़िम्मेदारी है धर्म को बचाने की. जबकि इस देश के लोग धर्म के मामलों में सहिष्णु होते जा रहे हैं. यहाँ लोग सोचते हैं कि आराम से जिओ यार, पंगा क्यों लेना? ऐसी बात नहीं की यहाँ पंगा लेने वाले लोग नहीं हैं. हैं, ज़रूर हैं. पर ये वही सिरफिरे लोग हैं जो कहीं भी चले जाएँ, नकार की अदा में अपना सिर फिराएँगे ही फिराएँगे।

कहने का अर्थ यह कि जो लोग भी विदेशों में बैठे हैं, उनकी आत्मा अपने देश में ही भटकती रहती है, अपने देश की मिट्टी उन्हें खींचती रहती है, देश-प्रेम उन्हें पुकारता रहता है, इसीलिए वे हर समय ऐसे भड़के, बहके रहते हैं और इस देश की राजनीति और धर्म को अपनी मुट्ठी में समझते हैं, जैसे उनके बिना यहाँ की गाड़ी नहीं चलेगी, जैसे उनसे देश की धरती अब छूटी, तब छूटी।

सच है, कहीं बस जाओ, अपने देश की मिट्टी खींचती रहती है।

(मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैंने यह पोस्ट विदेशों में बसे असहिष्णु भारतीयों की तारीफ़ में लिखी है या उन्हें शर्मिन्दा करने के लिए?)

Wednesday, 9 March 2016

मनु स्मृति में क्या है?

मनु स्मृति में क्या है?
मनु स्मृति सूर्य पुत्र प्रथम मनुष्य राजा मनु के बनाये हुए सिद्धान्त है। इसमें कुछ गलत नहीं लिखा है। मूल मनुस्मृति नष्ट हो चुकी है। नालंदा विश्विद्यालय को जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ने जलाया था. तब उसकी लाइब्रेरी 6 महीने तक जली थी। उसके साथ भारत का गौरवमय इतिहास भी जल कर खाक हो गया।
मनु स्मृति में कुछ भी गलत नहीं लिखा है। मनु स्मृति में जाति नहीं, बल्कि वर्ण व्यवस्था का वर्णन है जो कर्म-आधारित है। मनु स्मृति में नारी को लेकर भी कुछ गलत नहीं लिखा है। मनु स्मृति के तीसरे अध्याय में लिखा है, "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता"।
मनु स्मृति के अनुसार अगर ब्राह्मण किसी की हत्या कर दे तो उसे फांसी दी जाये। क्षत्रिय किसी की ह्त्या करे तो उसे 40 वर्ष का कारावास। वैश्य हत्या करे तो उसे 20 वर्ष का कारावास। और शूद्र हत्या करे तो 7 वर्ष का कारावास। क्योंकि शूद्र में बुद्धि नहीं होती और ब्राह्मण अगर बुद्धिमान होकर भी ऐसा कुकर्म करे तो वह क्षम्य नहीं.
इस तरह मनु स्मृति ब्राह्मण विरोधी है.
मनु स्मृति के अनुसार मनुष्य कर्म से ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र है. इसके सैंकड़ो उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं.
राजा विश्वसेन ने राजपाठ त्याग दिया और ब्राह्मण बनने हेतु तप किया और विश्वामित्र के नाम से विख्यात हुए.
राजा हरिश्चंद्र क्षत्रिय थे। इनका जन्म राजा मनु के पुत्र इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। मगर राजा हरिश्चंद्र आजीवन चांडाल (शूद्र) कहलाये। क्योंकि सत्य बोलने के कारन इन्हें राजपाट छोड़ना पड़ा और शमशान में चांडाल का कार्य करना पड़ा, जो शूद्र कर्म है। इस तरह एक क्षत्रिय राजा शूद्र बन कर आजीवन शमशान में रहा।
इसी वर्ण व्यवस्था की बात करती है मनु स्मृति।
सत्यकाम शूद्र था मगर गौ सेवा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ और सत्यकाम ब्राह्मण कहलाये। वाल्मीकि शूद्र थे मगर तप किया और ब्राह्मण कहलाये।
ऐतरेय ब्राह्मण की माँ इतरा एक भंगी की बेटी थी। इतरा के पुत्र ऐतरेय हुए, जिन्हें ब्राह्मण स्वीकार किया गया। 108 उपनिषदों में एक उपनिषद "ऐतरेय ब्राह्मण उपनिषद" भी है, जो महात्मा ऐतरेय ने ही लिखा था।
Krishna Kumar Tripathi के सौजन्य से.
(इस पोस्ट में शूद्र शब्द का कई जगह प्रयोग हुआ है, जिससे कई लोगों को ऐतराज़ हो सकता है. यह सिर्फ पहचान बताने के लिए दिया गया मात्र एक शब्द है. वर्ण व्यवस्था द्वारा निश्चित की गई जातियों का नाम भर है. क्यों लोग ब्राह्मण शब्द को अच्छा समझते हैं और शूद्र शब्द को बुरा?)

Tuesday, 8 March 2016

ABVP rebels to burn Manusmriti copy on Women’s Day

ABVP rebels to burn Manusmriti copy on Women’s Day
ABVP JNU unit ने कहा है कि "वे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन मनुस्मृति की प्रति को जला कर यह जताना चाहते हैं कि जो सिस्टम भेदभाव की नीति की वकालत करता है, उसे ख़त्म कर देना चाहिए। मनुस्मृति को जलाना ज़ुल्मों के इतिहास को जलाने के समान होगा। इसमें लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव तथा महिलाओं के लिए अपमानजनक बातें लिखी हैं. बी आर एम्बेडकर ने भी मनुस्मृति की एक प्रति को जलाया था. एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह के पिछड़े विचारों के लिए कोई स्थान नहीं है. वामपंथी पार्टी के छात्रों ने भी इस अभियान में शामिल होने की बात कही है." यह छात्रों ने कहा है.
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मनुस्मृति को जला दो. सारे धर्मग्रन्थ जला दो. सारे इतिहास जला दो. कोई दस्तावेज़ न रहने दो मनुष्यता के विकास का.
क्या ये तुलसीदास को भी नहीं छोड़ेंगे? तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है....
ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारि
ये सब ताड़न के अधिकारि।
ताड़न शब्द संस्कृत के ताड़ से बना है, जिसके दो अर्थ होते हैं. एक तो सामान्य अर्थ, जो सब समझते हैं, पीटना। दूसरा शिक्षा देना। उदाहरण के लिए देखिए कि कौटिल्य ने चाणक्य नीति में लिखा है....
लालने बहवो दोषः, ताडने बहवो गुणः
तस्मात पुत्रं च शिष्यम च, ताडयेत न च लालयेत.
अर्थात लाड़ करने में बहुत से दोष होते हैं और शिक्षित करने में बहुत से गुण. अतः बच्चों और छात्रों का लाड़ करने की बजाय उन्हें शिक्षित करना चाहिए।
अतः यह समझा जाए कि तुलसादास जी ने निम्न जातियों एवं स्त्रियों को शिक्षित करने की बात पर ज़ोर दिया है. इसी प्रकार लक्षणा से पशुओं को काबू में करने और ढोल के स्वर को ठीक करने के लिए उसकी मरम्मत करने की बात कही है.
ताड़न का अर्थ तारण यानि तारन से भी समझा जाता है कि ये सब तारने के, उद्धार किए जाने के पात्र हैं.
हर ग्रन्थ अपने समय का दस्तावेज़ होता है. उसे अमानत के तौर पर संभाल कर रखना ज़रूरी है. जिनमे मूलतः शिक्षा का अभाव होगा, वही किसी ग्रन्थ को जलाने की बात करेगा। आखिर कितने लोगों ने पढ़ी है मनु स्मृति? ऐसे तो सारे इतिहास जला दो, सारे पौराणिक ग्रन्थ जला दो. पर सभी धर्मों-सम्प्रदायों के जलाओ ना. और हाँ, सबसे पहले तो अपनी किताबें जलाओ, जो पढ़ने का सिर्फ बहाना कर रहे हो. आखिर युनिवर्सिटी करने क्या जाते हो? ऊधम मचाने? समाज में गन्दगी फैलाने? शरीफ घरों के बच्चों को बरगलाने?अशिक्षा का ऐसा प्रतिफलन? पथभ्रष्ट युवाओं को कोई तो सही राह पर लाओ.
Shame on you, Dear Students.

Friday, 4 March 2016

आत्मालाप Kavita 250

आत्मालाप

चुप हूँ मैं इतनी ऐसी
जैसे सन्नाटे का शोर
कोई मुझसे बोले क्यों?
बंद दरवाज़े खोले क्यों?

मैं हूँ ऐसी गंध नहीं
जो बिखरूँगी मौसम में
हवा मुझे बहकाए क्यों?
दृढ़ चट्टान हिलाए क्यों?

मन सूखा दरिया जैसे
धूल-धूसरित घर-आँगन
सैर-सपाटे जाना क्यों?
मन को यूँ ललचाना क्यों?

खेल-खिलाड़े बीत गए
हर रौनक धुँधली लगती
अब यह शोर-शराबा क्यों?
अब यह वक़्त-खराबा क्यों?

दूर रहो मुझ से अब सब
मैं हूँ इस दुनिया से दूर
सोई हुई हूँ, जागूँ क्यों?
सबसे डर कर भागूँ क्यों?