Thursday, 10 March 2016

विदेशों में बसे हुए भारतीय

विदेशों में बसे हुए भारतीय

विदेशों में बसे हुए भारतीय, चाहे वे किसी धर्म-सम्प्रदाय के हों, असहिष्णु होते हैं, या वहाँ जाकर असहिष्णु हो जाते हैं. (हाँ, कुछ अपवाद भी हैं जो नार्मल तरीके से पेश आते हैं,)

विदेशों में बसे हुए भारतीय अपने देश की मिट्टी से इस कदर जुड़े हुए होते हैं, जितने हम लोग अपने देश में रहते हुए भी जुड़े हुए नहीं होते। देश में रहते हुए चाहे कुछ सिरफिरे लोग अपने देश को ही नकार दें लेकिन विदेश में जाकर उन्हें अपने देश की कीमत पता चलती है. ऐसी बात नहीं कि विदेश की धरती पर अपने देश के सिरफिरे नहीं होते। होते हैं, इसीलिए वे वहाँ जाकर भी नकारवादी बातें करते हैं पर करते अपने देश की ही हैं. दूसरी धरती पर बैठ कर अपने देश को गालियाँ देते हैं, आखिर गालियाँ देते तो अपने देश को ही हैं ना? अपने देश की गंध को अपने इर्द-गिर्द न पाकर वे इतने बौखलाए रहते हैं कि विचित्र हरकतें करने लगते हैं. वहाँ रह कर भी अपने देश की गन्दी राजनीति करते हैं, देश की हर बात में टाँग अड़ाते हैं, दखलंदाज़ी करते हैं, इसलिए नहीं कि उनके बिना हमारा देश चल नहीं सकता, बल्कि इसलिए कि पराए देश में पैसे की चकाचौंध में वे जी तो रहे होते हैं, लेकिन उन्हें हर पल यह डर लगा रहता है कि कहीं एक दिन ऐसा न आए कि वे अपनी जन्मभूमि को भूल जाएँ या जन्मभूमि उन्हें भूल जाए. देशवासियों के मध्य अपना ध्यान आकर्षित करने के लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं. देश को गाली देना भी उनका एक हथकंडा होता है. क्योंकि कुछ अच्छा काम करेंगे तो पहचान बनाने में उम्र लग जाएगी। बुरा करो ताकि जल्दी नज़र में आओ. बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? हैं वस्तुतः यह देश के प्रति उनका लगाव ही, जो उन्हें मोहमाया से मुक्त नहीं होने देता। पर कुसंस्कारी होने के कारण लगे हुए हैं गलत संस्कार फैलाने में. इन्हें सद्बुद्धि आ नहीं सकती, इसलिए ईश्वर से क्या कहना कि ईश्वर, इन्हें सद्बुद्धि दे.

विदेशों में रह रहे कुछ लोग धर्म पर अटके रहते हैं. कोई ज़रा सा उनके धर्म का नाम ले ले, वे भड़क उठते हैं क्योंकि अपने देश की धरती छूटते ही असहिष्णुता उन्हें जकड लेती है. उनके धर्म का शब्द कहीं आया नहीं कि वे अपने देश से समूल उखड़ जाने की आशंका से भयभीत हो उठते हैं, अपना देश-धर्म उन्हें प्यारा है इसलिए हर पल अपने पाँवों के नीचे से अपने देश की धरती के खिसक जाने का भय सताता रहता है. वे सोचते हैं कि उनका धर्म और सम्प्रदाय केवल उनके कन्धों पर टिका है, उनकी ही ज़िम्मेदारी है धर्म को बचाने की. जबकि इस देश के लोग धर्म के मामलों में सहिष्णु होते जा रहे हैं. यहाँ लोग सोचते हैं कि आराम से जिओ यार, पंगा क्यों लेना? ऐसी बात नहीं की यहाँ पंगा लेने वाले लोग नहीं हैं. हैं, ज़रूर हैं. पर ये वही सिरफिरे लोग हैं जो कहीं भी चले जाएँ, नकार की अदा में अपना सिर फिराएँगे ही फिराएँगे।

कहने का अर्थ यह कि जो लोग भी विदेशों में बैठे हैं, उनकी आत्मा अपने देश में ही भटकती रहती है, अपने देश की मिट्टी उन्हें खींचती रहती है, देश-प्रेम उन्हें पुकारता रहता है, इसीलिए वे हर समय ऐसे भड़के, बहके रहते हैं और इस देश की राजनीति और धर्म को अपनी मुट्ठी में समझते हैं, जैसे उनके बिना यहाँ की गाड़ी नहीं चलेगी, जैसे उनसे देश की धरती अब छूटी, तब छूटी।

सच है, कहीं बस जाओ, अपने देश की मिट्टी खींचती रहती है।

(मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैंने यह पोस्ट विदेशों में बसे असहिष्णु भारतीयों की तारीफ़ में लिखी है या उन्हें शर्मिन्दा करने के लिए?)

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