Saturday, 12 March 2016

खाली दिमाग शैतान का घर

खाली दिमाग शैतान का घर

हमारे देश में जो घट रहा है, उसमें हमारी समस्या, सच मानिए, न बीजेपी है, न कॉंग्रेस, न केजरीवाल, न जेएनयू, न राष्ट्रविरोध, न जाट, न आरक्षण, न हिन्दू कट्टरवादी, न मुस्लिम कट्टरवादी, न मन्दिर, न मस्जिद, न गाय और सूअर के मांस पर प्रतिबन्ध, न कुछ और. ये सब मुद्दे मुद्दे हैं ही नहीं। इनमें उलझे रहने से देश का विकास नहीं होगा। ये सारी बातें विकास-विरोधी हैं. वस्तुतः समस्या कहीं और है. समस्या है हमारे दिमाग का खालीपन जो बेकार, गैरज़रूरी, निष्क्रिय, नकारात्मक, कुंठित, फ़ालतू ख्यालों से भरा रहता है. प्रतिद्वंदिता के इस युग में, जब देशवासियों को देश की उन्नति के लिए नए-नए आविष्कारों के बारे में सोचना चाहिए, सामूहिक खुशहाली पर बल देना चाहिए, नए-नए विचारों को जगाना चाहिए, हमेशा देश की तरक्की की बात सोचनी चाहिए, हम व्यर्थ की बहसों में उलझे हुए हैं, अपने व्यतिगत स्वार्थों की पूर्ती के लिए आज इससे तो कल उससे झगड़ रहे हैं. क्योंकि सच मानिए, हम सबका पेट भरा हुआ है. भूखे पेट आदमी सिर्फ रोटी की सोचता है. पेट भरा हुआ है, इसीलिए खुराफातें सूझती हैं. पेट भरा हुआ है लेकिन दिमाग खाली है. खाली दिमाग शैतान का घर. हमारी चर्चाओं का विषय देश का विकास क्यों नहीं है? क्या हम विकास-विरोधी हैं? विकास-विरोधी यानि राष्ट्र-विरोधी। हम कभी भी खुश नहीं थे, हम कभी खुश नहीं रह सकते, देश में किसी भी पार्टी का वर्चस्व हो, हमें उसकी आलोचना करनी ही करनी है. आज गद्दी उनके हाथ में है तो हम उन्हें बुरा कह रहे हैं. कल गद्दी नके हाथ में होगी तो हम न्हें बुरा कहेंगे, क्योंकि हमें खुश रहना नहीं आता. हम सबके दिमागों में लड़ाई के कीड़े घुसे हुए हैं. हम इस दिशा में क्यों नहीं सोचते कि हमारा देश विश्व में सर्वोपरि हो, तकनीक में, सुख-सुविधाओं में, सौंदर्य में, प्रेम-भाईचारे में, आर्थिक ऊँचाई पर, भौतिक ऊँचाई पर, नैतिक ऊँचाई पर. मेरा भारत जो आज है, कल उससे बेहतर हो. सोचिए, सोचिए। आज  इंटरनेट के इस युग में हमें सही सन्देश फैलाते देर नहीं लगेगी।

No comments:

Post a Comment