Sunday, 13 March 2016

मेरा देश प्रेम

मेरा देश प्रेम

मुझे इन दिनों यह अहसास हुआ है कि मुझमें देशभक्ति कूट-कूट कर भरी है. जब मैं बच्ची थी, मुझमें गाँधी, नेहरू के प्रति बड़ा सम्मान था. उनका नाम ही काफी था, क्योंकि मैंने उन्हें कभी देखा नहीं था। उन्हें नेता समझने की तो समझ ही नहीं थी, उन्होंने देश को आज़ाद करवाया, बस यही पता था. कांग्रेस पार्टी देश से जुडी हुई लगती थी, क्योंकि देश आज़ाद होने के साथ ही वह पार्टी क्रियाशील हुई थी. इन्दिरा गाँधी के द्वारा लगाईं गई एमरजेंसी तक न राजनितिक पार्टियों की समझ थी, न देश की राजनीति का पता था. एमरजेंसी के दौरान यह ज़रूर लगा था कि हमारे देश की जनता एकदम उजड्ड और अनुशासनहीन है, इसे किसी सख्त क़ानून से काबू में रखने की ज़रूरत है. (यह मैं इन दिनों भी सोच रही हूँ कि इस देश में एमरजेंसी (आपातकाल) लागू होनी चाहिए। मोदी जी को इस पर अमल करना चाहिए।) फिर इन्दिरा जी की मौत और राजीव गाँधी की मौत (सही शब्दों में कहें तो दोनों की हत्या) को मैंने दिल की गहराई तक महसूस किया, यहाँ तक कि उस समय मैं अपने आँसू भी नहीं रोक पाई थी. उस समय तक मेरे लिए वही देश थे. अब, ज़ाहिर है, मैं नरेंद्र मोदी जी के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हूँ. मुझे लगता है, देश को सुचारू रूप से चलाने में एकमात्र मोदी जी ही सक्षम हैं. ये सब बातें देश की ही हैं.

देश को हम व्यक्तियों के माध्यम से ही जानते हैं. हम अच्छे हैं तो हमारा देश अच्छा है. हम तरक्की कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि हमारा देश तरक्की कर रहा है. हमारे देश में कोई विकास कार्य होता है, कोई आविष्कार होता है, तो करते तो मनुष्य ही हैं, लेकिन देश का मस्तक ऊँचा होना कहा जाता है. देश जातिवाचक संज्ञा है, जो देशवासियों के ज़रिये ही जानी जाती है. देश का अपना कोई चरित्र नहीं होता, उसका चरित्र उसमें रहने वालों के चरित्र से ही बनता है.

देश के प्रति मेरा लगाव गहरा रहा है, इस बात का अहसास मुझे तब भी हुआ, जब मैंने नव युवावस्था में एक सखी के मुख से स्विट्ज़रलैंड के प्राकृतिक सौंदर्य की चर्चा सुनी। उस सखी को भी भारत पसंद था, इसीलिए उसने इन शब्दों में बताया कि स्विट्ज़रलैंड में मैन-मेड (मनुष्य के द्वारा बनाई गई) प्राकृतिक सुंदरता है, हमारे देश से उसका क्या मुकाबला? हमारे भारत में जगह-जगह प्राकृतिक सम्पदा बिखरी पड़ी है, हम पर प्रकृति की मेहर है. जब हमें प्रभु ने भौगोलिक सौंदर्य के मामले में इतना अमीर बनाया है, तो उपभोग करने हम कहीं और क्यों जाएं? पहले अपना देश तो पूरा घूम लें. इसका हर पहाड़, नदी, समुद्र, गुफ़ाएँ, कन्दराएँ, तो देख लें. हवा, मिट्टी, अंधड़, सूखा, अकाल, बाढ़, इन सबके बाद धरती जो स्वतः आकार लेती चली गई, पहले उससे तो रूबरू हो लें. विदेश भी घूम लेंगे। इसी ज़िद में मैंने अपना लगभग पूरा देश घूम लिया। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, महाराष्ट्र से लेकर बंगाल-आसाम तक. अभी बचा है, यात्राएँ जारी हैं.

विदेश जाने का कोई सपना न होने पर भी भाग्य ने या संयोग ने विदेश में नौकरी करवाई। वहाँ तीन वर्ष तो रहना ही था, आराम से तीन से छह वर्ष तक और रहा जा सकता था, जिसका मतलब था, अधिक धनोपार्जन, अधिक धन-प्राप्ति, लेकिन पहले तीन वर्ष काटने भी मुश्किल हो गए. मेरा समस्त परिवार यानि मेरा पुत्र मेरे साथ था, उसका दिल वहाँ लगा हुआ था, लेकिन मैंने विचित्र रूप से इस अजीब सी भावना को महसूस किया कि जैसे कोई मुझे भारत की ओर खींच रहा है, जैसे मेरे देश की मिट्टी मुझे बुला रही है. सुखों में कोई कमी नहीं थी वहाँ। शहर भी इतना खूबसूरत। नौकरी में गज़ब का रुतबा-रुआब। मान-सम्मान इतना जैसा कभी अपने देश में रहते नहीं मिला था. पैसा भी भरपूर। चैन से साहित्य-रचना का भी सुख. पुस्तकें पढ़ने के लिए समय ही समय. पर देश की मिट्टी नहीं थी. बस, मुझे भारत वापस लौटना है. भारत जाकर चाहे किसी से न मिलो, एक कमरे में बंद रहो, फिर भी शान्ति मिलती है. तो वहाँ मैंने देश के प्रति अपना असीम लगाव महसूस किया। तबादले के लिए जी तोड़ कोशिश की, यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधानमन्त्री को भी पत्र लिखा कि मुझे मेरे देश वापस बुलाएँ। और मैं वापस लौट आई, एक टर्म भी पूरी तरह से पूरी किए बिना। अपने इंजीनियर बेटे को भी यही समझाया कि अपना देश अपना देश होता है, किसी अन्य देश में सेटल नहीं होना। मैं खुश हूँ कि आज मैं सपरिवार अपनी धरती पर हूँ.

अब इन दिनों, जब देश में इतनी गड़बड़ें हो रही हैं, जैसे सारा देश जल रहा है, चारों तरफ़ खुराफातें, एक-दूसरे की काट, मैं बेहतर, तू बदतर, तो मन दुखी हो उठता है. देश का भविष्य कुछ अच्छा नज़र नहीं आता. हर वक़्त डर लगा रहता है, न जाने क्या हो? कब, कहाँ मारकाट हो जाए? कब, कहाँ उखाड़-पछाड़ हो? हम यह सोचें कि हमें न किसी धर्म को बचाना है, न जाति को. हमें न किसी मज़हब से सरोकार है, न किसी पंथ से. हमें सिर्फ इंसानियत को बचाना है. इसी से बचेगा देश. और जैसा कि मैंने पहले कहा, देश कोई व्यक्ति नहीं है जो उठ कर, चल कर खुद आगे बढ़ेगा। व्यक्तियों के माध्यम से हो देश चलेगा। इसके लिए एक सबल नेतृत्व की आवश्यकता है. हर आदमी एक अलग पहचान के रूप में खड़ा होकर देश नहीं चला सकता। चुनना तो किसी एक को ही पड़ेगा, जो देश की बागडोर सम्भाले।

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