Sunday, 27 March 2016

मैं शहंशाह हूँ

मैं शहंशाह हूँ

काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाए
एक लीक काजल की लागि है तो लागि है.

जिन लोगों की कोठरियाँ काजल से भरी होती हैं, मैं वहाँ ज़रूर जाती हूँ, उस अँधेरे में कुछ रोशनी भरने। उनकी कोठरियों में रोशनी हो जाती है पर मैं एक लीक काजल की साथ लेकर लौटती हूँ. मेरी सद्भावना की प्रतिक्रिया में उपजी कुछ काली रेखाएँ बदले की आग में जल-भुन कर मुझे परेशान करने आ जाती हैं. अप्रत्याशित सा कुछ देख कर कुछ पल के लिए मेरा असहज हो उठना स्वाभाविक है. लेकिन फिर जल्दी ही मैं अपने को समेट कर जैसे दोबारा युद्ध के लिए तैयार हो जाती हूँ. काजल की कोठरी में जाना मैं कैसे छोड़ दूँ? आखिर उन्हें मेरी ज़रूरत है.

दोस्तों, कई बार मैं खुद पर गर्व करती हूँ कि मणिका मोहिनी, क्या दिमाग पाया है तुमने। भाई लोगों, इज़्ज़त केवल लड़कियों / महिलाओं की ही खराब नहीं की जा सकती, लड़कों / पुरुषों की भी तहस-नहस की जा सकती है. पुरुषों के शरीर को नंगा करके यदि उन्हें बेइज़्ज़त नहीं समझा जा सकता, तो उनके पास रुतबा-रुआब तो होता है, परिवार और समाज तो होता है, कोई काम-धंधा तो होता है, मिला दो सब मिटटी में. और अगर यह कुछ भी नहीं है तो किसी फकीर से क्या डरना? कई मायनों में मुझे लगता है, मैं शहंशाह हूँ ('शहंशाह' फिल्म याद है ना?), शब्दों का नकाब लगा कर निकलती हूँ और बुरों को चौराहे पर बेनकाब करती हूँ. कौन पुलिस, कोर्ट, कचहरी के चक्कर में पड़े? मेरे पास शब्द हैं ना भिगो-भिगो कर मारने के लिए. मैं अपने शब्दों के सहारे ज़िंदा हूँ, ताकतवर हूँ, जीवन की हर लड़ाई को जीतने में सक्षम हूँ.

No comments:

Post a Comment