Friday, 4 March 2016

आत्मालाप Kavita 250

आत्मालाप

चुप हूँ मैं इतनी ऐसी
जैसे सन्नाटे का शोर
कोई मुझसे बोले क्यों?
बंद दरवाज़े खोले क्यों?

मैं हूँ ऐसी गंध नहीं
जो बिखरूँगी मौसम में
हवा मुझे बहकाए क्यों?
दृढ़ चट्टान हिलाए क्यों?

मन सूखा दरिया जैसे
धूल-धूसरित घर-आँगन
सैर-सपाटे जाना क्यों?
मन को यूँ ललचाना क्यों?

खेल-खिलाड़े बीत गए
हर रौनक धुँधली लगती
अब यह शोर-शराबा क्यों?
अब यह वक़्त-खराबा क्यों?

दूर रहो मुझ से अब सब
मैं हूँ इस दुनिया से दूर
सोई हुई हूँ, जागूँ क्यों?
सबसे डर कर भागूँ क्यों?

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