Saturday, 12 March 2016

कविता रीमिक्स Kavita 251

कविता रीमिक्स

मैं वहाँ नहीं पहुँची हूँ 
जहाँ मुझे होना चाहिए
पर मैं वहाँ भी नहीं हूँ 
जहाँ मैं हुआ करती थी.
कुछ तो चली हूँ मैं लड़खड़ाए क़दमों से
कुछ अभी बाकी है उम्र ख़त्म होने तक.

मैं जैसी हूँ, कि वैसी हूँ
मैं वैसी हूँ, कि कैसी हूँ?
कभी मैं आईना देखूँ
कभी खुद को पढ़ा करती।
मेरी नींदें हुई गायब अजीब दहशत में
रात खामोश सिसकती है सुबह होने तक.

खौफ फैला है हवा में
सारे रास्ते मुश्किल हुए
आकाश आतुर गरजने को 
चारों दिशाएं हिल रही हैं.
असमंजसों में झूल रहा हर अधूरा स्वप्न 
दिलासा दूँ क्या इस दिल को सबर होने तक.

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