Sunday, 24 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 7 क्वचिदम् कुमाता भवति

आम आदमी की ख़ास कहानी : 7

क्वचिदम् कुमाता भवति

अपने एक निकट सम्बन्धी के बारे में बता रही हूँ, इतने निकट कि यदि उन्होंने यह पढ़ लिया तो परिवार में उधम मच सकता है कि अच्छा, मैं इनके बारे ऐसे विचार रखती हूँ? लोग गलत होते हैं पर उन्हें अपनी गलती का आभास नहीं होता क्योंकि वे वैसा करते हैं जो उनका मन चाहता है, वैसा नहीं जो करना चाहिए, जैसा करना चाहिए. यानि ये इस किस्म के लोग होते हैं जिनकी हाँ में हाँ मिलाई जाए तो ये खुश रहते हैं, ज़रा उनकी आलोचना की नहीं कि ये रिश्ते तक तोड़ने को तैयार हो जाते हैं. ये किसी की खुशामद नहीं करते, पर इन्हें खुशामदी लोग पसंद हैं. ये समझते हैं कि ये हर हाल में सही ही हैं और कोई उन्हें गलत न कहे. अब सुनिए, ऐसी ही एक लड़की का कथा-पुराण.

एक लड़की ने प्रेम-विवाह किया. चूँकि लड़का-लड़की दोनों आईटी इंडस्ट्री से जुड़े थे, अतः शादी के बाद अमेरिका में नौकरी मिली तो वहाँ चले गए. लड़के के घरवाले इस विवाह से खुश नहीं थे. उनका एकलौता बेटा था, शायद कुछ और सोच कर रखा हो, लड़की बहुत महत्वाकांक्षी थी, दोनों का लाखों का पैकेज था. लड़का उसके मुकाबले एकदम सीधा संत समान था.

लड़की ने अमेरिका पहुँचते ही अपने माँ-बाप-भाई-बहन को टिकट भेजा और महीना भर अपने पास रखा. लड़की ने अपने पैसे खर्च करके अपने मायके वालों को टिकट भेज अमेरिका में घुमाया. उसके बाद लड़के ने अपने घरवालों को. अच्छी नौकरी वाली बहुत सी लडकियाँ जब कमाती हैं तो शायद पहले ही पति से तय कर लेती हैं कि वे अपनी तनख्वाह अपने माता-पिता के घर पर खर्च करेंगी। चलो, जो भी हो, जैसे भी दो लोग खुश रहें। दोनों फिलहाल खुश थे लेकिन स्वार्थी लोगों के लिए ख़ुशी कितनी देर की?

लड़की एक साल के भीतर गर्भवती हुई, लड़के की माँ डिलिवरी के लिए अमेरिका गई और एक महीना रह कर आ गई. लड़की ने बेटे को जन्म दिया. लड़की की माँ को बस अमेरिका घूमने से मतलब था, बेटी के बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने से नहीं। अमेरिका में नौकर की समस्या। लड़के ने लड़की से कहा, 'बेटे के थोड़ा बड़ा होने तक तुम नौकरी छोड़ दो, क्योंकि बाद में भी नौकरी मिल ही जानी है.' लड़की ने कहा, 'नहीं, नौकरी तुम छोडो। मैं नौकरी नहीं छोड़ूँगी। बेटा तुम्हारा भी है, तुम भी ज़िम्मेदारी उठाओ।' अब बच्चे को पालना भी ज़रूरी था. लड़के ने नौकरी छोड़ दी और बेबी सिटिंग करने लगा. तब उसे ख्याल आया कि क्यों ना बेटे को भारत ननिहाल या ददिहाल भेज दिया जाए. लड़की ने कहा, 'मेरी माँ नहीं सँभाल पाएगी, अपने घर भेज दो.' लड़का बेटे को अपने घर अपनी माँ की निगरानी में छोड़ने चला गया. दादी ने पोते को ख़ुशी से अपना लिया। अब कुछ दिन यहाँ रुकना ही था. तो उसे अपने देश में एक अच्छी नौकरी का ऑफर मिला। कंप्यूटर वालों को नौकरियों की क्या कमी? उसने यहाँ ज्वाइन कर लिया। लड़की वहाँ अकेली खुश. दुखी होने का टाइम ही कहाँ?

एक दिन लड़के की माँ मुझसे मिलने आई और बोली, 'हम तो ऐसे फँस गए, आखिर क्या करें? न इधर के रहे, न उधर के रहे. ऐसी लड़की के साथ कैसे निभे जो अपना बच्चा तक सँभालने को राजी नहीं?'

चूँकि मैं फैसले तुरत-फुरत करती हूँ इसलिए मैंने उनसे सीधा ही कह दिया, 'बेटे को तलाक दिलवा कर उसकी दूसरी शादी कर दो.'

शायद वह पहले ही ऐसा सोचे बैठी थीं, और शायद उनके घर में भी ऐसी बात पहले हो चुकी थी, इसलिए उन्हें मेरी बात अच्छी लगी. उन्होनें मुझे गले से लगाया और विदा ली.

ये दोनों मेरे अच्छे परिचित थे, इसलिए मैं दोनों की ही भलाई में. पर पता नहीं कैसे, मेरे मुँह से कभी-कभी भविष्यवाणी हो जाती है जो सच निकलती है. वह लड़का शादी से पहले किसी काम से हमारे घर आया था, तो मैंने अपने बेटे से कहा था, 'अभी यह लड़का नींद में है, जिस दिन इसकी आँख खुलेगी, यह इस लड़की से अलग हो जाएगा.' और वही हुआ. अलग होने का निर्णय लड़के ने लिया. असल में कुछ लड़कियों को पति एक एडिशनल कम्फर्ट की तरह चाहिए होता है, जो हर समय दुम हिलाता उनके आगे-पीछे घूमे.

फिर लड़की भारत आई, आपसी रज़ामंदी से तलाक हुआ, बेटे की कस्टडी पिता को मिली, महीने में एक बार माँ से मिलने की इजाज़त के साथ, जिसके लिए लड़की ने कोई ऐतराज़ नहीं किया।

अब मैं तो दोनों तरफ की थी, इसलिए मैंने लड़की को समझाया, 'बेटे की कस्टडी तुम लो, बेटा ज़िन्दगी में बड़ा काम आता है, तुम खुशनसीब हो कि तुम्हारे बेटा है, तुम उसे लेने की कोशिश क्यों नहीं करतीं?'

उसका तुरंत उत्तर मिला, 'अरे नहीं आंटी, मैं नौकरी करूँगी या बेटा सम्भालूँगी? मेरे लिए यह ज़्यादा कन्वीनिएंट है कि मैं महीने में एक बार बेटे से मिल लिया करूँगी।'

लानत है तुझ पर, मैंने मन ही मन उसे गाली दी.

वह तलाक के बाद एकाध बार ही बेटे से मिल पाई. एक तो हर महीने अमेरिका से यहाँ आना मुश्किल, दूसरे, धीरे-धीरे बेटे ने मिलने से इंकार कर दिया, बड़ा जो हो रहा था.

जिसके पास बच्चा रहता है, उसी से मोह होता है. अगर कोई यह सोचे कि सिर्फ इस नाम से कि फलाँ मेरा पिता है या फलाँ मेरी माता है, बच्चों के दिल में मोह जागेगा, तो ऐसा नहीं होता. बच्चे भी बड़े उस्ताद होते हैं, उन्हें अपने अंतर्ज्ञान से पता चल जाता है कि किसने हमारे लिए क्या किया? किसने हमारे लिए सही अर्थों में त्याग किया? फिर बच्चे उसी की तरफ जाते हैं.

मैंने सोचा था, कई स्त्रियाँ तन से बाँझ होती हैं, कई मन से. ऐसी कुमाता को क्या कहेंगे? वाकई, हर बच्चे की माता कुमाता नहीं होती. कुछ अपने बच्चों के लिए अपना सारा जीवन दाँव पर लगा देती हैं. नौकरी तो चीज़ क्या? कुमाता हर रोज़ हर घर में देखने को नहीं मिलती, कभी-कभार ही कोई माता कुमाता होती है.


आम आदमी की ख़ास कहानी : 6 चोरी और सीनाज़ोरी

आम आदमी की ख़ास कहानी : 6
चोरी और सीनाज़ोरी

मेरी दुकान में चोरी करने वाले एक कर्मचारी की कहानी सुना रही हूँ. यह चोर भी सच में बड़ा अजब-गज़ब था. हेकड़ी देखिए, 'मैं तो जी चोर हूँ, हाँ, मैंने आपकी दुकान में चोरियाँ की हैं, जो करना है, कर लीजिए.' अब सुनिए कथा शुरू से.

मेरा एक कर्मचारी मेरे नाम एक चिट्ठी छोड़ गया कि अगले दिन से वह काम पर नहीं आएगा। उस चिट्ठी में उसने मेरी भरपूर तारीफें कीं और लिखा कि मैं उसे फोन न करूँ क्योंकि वह अपनी सिम नष्ट कर रहा है। मैंने तुरंत उसका फोन मिलाया पर मिला नहीं। मैंने सोचा, ठीक है, चला गया सो चला गया।

दो-चार दिन के बाद कुछ भयंकर चोरियाँ सामने आईं। मैंने उसका आवेदन पत्र देखा तो उसने एक दूसरा मोबाइल नम्बर भी दिया हुआ था। मैंने उस पर सदेश भेजा, 'भाई, तुम इतना चोरों की तरह क्यों गए? अब जो चीज़ें नहीं मिल रहीं, उनके लिए क्या मैं तुम्हारी पुलिस में रिपोर्ट करूँ?'

उसका उत्तर (एसएमएस) आया, 'मैडम, मैं पहले भी दो बार जेल जा चुका हूँ। मैं एक चोर हूँ पर मैंने आपके यहाँ कोई बड़ी चोरी नहीं की, क्योंकि आप बहुत अच्छी है, वर्कर्स का बहुत ख्याल रखती हैं, खुद पूछती हैं कि एडवांस तो नहीं चाहिए। दूसरे, शोरुम में कभी आती नहीं।'

(हे राम, मैंने चोर को चाबियाँ पकड़ाई हुई थी।)

'आपने ही तो कहा था कि आपके पास समुद्र है.'

(कमबख्त, पैसों का नहीं, शोरुम में चीज़ों का)

'इसमें से कोई दो-चार बूँद ले भी लेगा तो आपको फर्क नहीं पड़ेगा।'

(तुच्छ, यह भी तो कहा था कि उससे लेने वाले का इतना भला नहीं होगा जितना उसे चोरी का पाप लगेगा। पर चोरों को पाप की क्या परवाह?)

'मैंने जो भी आवेदन पत्र में लिखा था, वह सब झूठ था, मेरा पता, परिचय, सब। यहाँ तक कि मेरा नाम भी। मेरे पास बहुत सारे मोबाइल नंबर हैं, जो मैंने दूसरों की आई डी पर लिए हुए हैं। कोई मुझे ढूंढ नहीं सकता।'

मैंने तुरंत जवाब दिया, 'भई तुम ग्रेट हो। तुम तो एक कहानी के मसाले हो। अपने बारे में यूँ ही लिखते रहो। जब तुम इतने निडर हो तो यह भी बताओ कि मेरे समुद्र में से तुमने कितनी बूँदें चुराई हैं? और फिर तुम नौकरी छोड़ कर क्यों गए?'

उसने उत्तर दिया, 'कुछ ख़ास नहीं। मैंने आपको ज्यादा नुक्सान नहीं पहुँचाया। मैं तो बस यह करता था कि आपका लिखा हुआ दाम हटा कर कस्टमर को ज्यादा बताता था और ऊपर के पैसे खुद रखता था।'

(निकृष्ट, तूने मेरी दुकान के कस्टमर बिगाड़ दिए।)

'नौकरी मैंने इसलिए छोड़ी, क्योंकि दूसरे कर्मचारियों के कारण ज्यादा खाने का मौका नहीं मिल रहा था। फिर न इतने कस्टमर आते हैं, न इतनी सेल है। मैडम, अब मैं यह सिम फ़ेंक रहा हूँ। आपके आशीर्वाद से अब मैं दूसरी नौकरी ढूंढूंगा।'

मैंने उसे आखिरी एसएमएस किया, 'मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है पर मैं तुम्हारे ये सारे एसएमएस पुलिस को दे रही हूँ। तुम्हारा बुरा नहीं चाह रही, बस यह देखने के लिए कि पुलिस तुम्हें खोज पाती है या नहीं।'

किस्सा ख़त्म हुआ लेकिन मैंने जैसा उसे लिखा था, वैसा नहीं किया। मैं ठहरी रहमदिल. वैसे भी व्यर्थ में पुलिस के चक्कर लगाने का क्या लाभ था? पुत्र कहता ही है, 'मॉम, थोड़ी बहुत चोरियाँ तो आप इनकी तनख्वाह में शामिल समझें.' समझ लीं जी. दस मैं दे रही थी, इतना ही ऊपर से कमा रहा होगा. और फिर शिकायत कैसी? और किससे? मुझे भी तो कमा कर दे ही रहा था. ओह्हो ! मैं क्या चोर को सपोर्ट कर रही हूँ? मन को समझाने के लिए मन कैसे-कैसे स्वांग रचता है, यह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है?

Friday, 22 April 2016

एमिली ब्रौंटे का उपन्यास 'वुदरिंग हाइट्स'

एमिली ब्रौंटे का उपन्यास 'वुदरिंग हाइट्स'

एमिली ब्रौंटे ने अपना एकमात्र उपन्यास 'वुदरिंग हाइट्स' अपनी 27 वर्ष की आयु में 1845-1846 के बीच लिखा था, जो 1847 में प्रकाशित हुआ था तथा इसके एक साल बाद इस प्रतिभाशाली लेखिका की मात्र 30 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई थी. यह उपन्यास इस कदर रोचक एवं पठनीय है कि इसे एक बार पढ़ना शुरू कर देने पर पूरा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता. एक बड़े समीक्षक ने इसके बारे में यह भी कहा था कि इसे पढ़ लेने के बाद यह संभव ही नहीं है कि इस पर कुछ लिखा न जाए या अपने विचार व्यक्त न किए जाएँ. यह उपन्यास हमारे बी ए के पाठयक्रम में लगा था, जो मैंने तब और उसके बाद कई बार पढ़ा, अंग्रेजी अच्छी न आने के बावजूद. लगभग 170 वर्ष पूर्व लिखे गए इस उपन्यास की मानसिकता सार्वभौमिक और सर्वकालिक है. इसमें चित्रित पात्र आज भी हमें अपने आसपास मिल जाऐंगे। इस उपन्यास में प्रेम के ऐसे नाज़ुक पक्ष को उभारा गया है, जिससे भय तो लगता है, लेकिन जिसकी असलियत से इंकार नहीं किया जा सकता.

एमिली ब्रौंटे के उपन्यास 'वुदरिंग हाइट्स'.का नायक हीथक्लिफ अपनी प्रेमिका से बेइन्तहा प्रेम करता है, एकाधिकार की भावना रखता है। किसी कारणवश वह उसे मिल नहीं पाती यानि उससे छिन जाती है और उसकी ईमानदारी, वफ़ादारी के प्रति हीथक्लिफ संदेहशील हो उठता है तो वह पागलों की तरह उसका दुश्मन हो जाता है, उसके खून का प्यासा। यानि जिस मात्रा में वह उसे प्यार करता था, उसी मात्रा में उससे दुश्मनी की भावना रखता है। इस उपन्यास ने दिल पर ऐसी छाप छोड़ी थी कि जहाँ एक ओर हीथक्लिफ के प्रति मन कभी-कभी सहानुभूति से भर उठता था, वहीँ दूसरी ओर यह प्रश्न भी सालता रहता था कि जिस व्यक्ति को हम कभी जान देने की हद तक प्यार करते हैं, उसी के जानलेवा क्यों हो जाते हैं? यूँ यह भावना व्यक्ति-दर-व्यक्ति अपनी मात्रा में कम-ज्यादा हो सकती है लेकिन यदि प्यार सच्चा है तो प्रेमी के मन में उसे तोड़ने वाले, बेवफाई करने वाले के प्रति गुस्से की, बदले की भावना रहती ज़रूर है। क्यों इंसान उसी का दुश्मन हो जाता है, जिसे वो कभी हद से ज्यादा चाहता है? प्यार में यदि यह मारक तत्व निहित है तो प्यार सचमुच एक खतरनाक स्थिति है।


Thursday, 21 April 2016

संस्मरण लेखन क्या है?

संस्मरण लेखन क्या है?

संस्मरण लेखन क्या है? अन्य व्यक्ति से जुड़ी अपनी स्मृतियों का लेखन. जब हम किसी अन्य व्यक्ति से जुडी अपनी स्मृतियों का लेखन करते हैं, तो हमारा स्व भी उसमें स्वतः आ जाता है. जिस व्यक्ति को हम बहुत नज़दीक से जानते हैं, उसे पहचानने का दावा करते हैं, उसके बारे में यदि कुछ लिखेंगे तो उस लेखन में खुद को अदृश्य नहीं रख सकते. हम उसमें दिखेंगे ही दिखेंगे.
'आम आदमी की ख़ास कहानी : 5 : ज्वाला से ज्वालामुखी तक', इस संस्मरण की अपनी इस सखी पर मैंने तीस-पैंतीस वर्ष पूर्व एक कहानी लिखी थी, 'ढाई आखर प्रेम का'. कहानी में असली स्थितियाँ नहीं लिखी थीं, कल्पना का मिश्रण था, पर संवाद वहाँ भी सच्चे थे. कहानी का अंत यूँ हुआ था : सखी मेरे हाथ से पुस्तक खींच कर परे फ़ेंक देती है और कहती है, 'पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोए. ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित हुए.' और मैं सोचती रह जाती हूँ कि क्या इसने उन ढाई आखरों का अर्थ समझा है? : पर इस संस्मरण का कोई अंत नहीं. ज्वाला (नकली नाम) आज भी मेरी सखी है. जब तक जीवन चलेगा, यह संस्मरण भी चलेगा.
अब पुनः नए सिरे से इस स्मृति को लिखा है, जिसने एक कहानी का रूप ही ले लिया है. सिर्फ नाम नकली है, स्थितियाँ असली हैं. मुझे विश्वास है, यह नव-निर्मित रचना आपको अवश्य रुचेगी. बस, ज़रा सा इंतज़ार और.
मुझे जीवन में विविध प्रकार के लोगों से मिलना हुआ. चाहे उनकी जीवन-शैली से ध्वनित कुछ भी हो, यदि वे मुझसे एक अच्छी कहानी लिखवा गए तो मेरे लिए उनका मिलना किसी दैवीय प्रावधान से कम नहीं था. मैंने सभी कहानियाँ ज़िन्दा पात्रों पर लिखी है. मेरी कहानियों में स्थितियाँ काल्पनिक हो सकती हैं लेकिन चरित्र काल्पनिक नहीं. मुझे अपनी कहानियों के सभी पात्र अत्यन्त प्रिय हैं. मैं अकसर अपने पात्रों से यादों में मिलती हूँ, 'कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन' की माफ़िक. यह मेरा प्यारा शगल है.
हाँ, चलते-चलते एक बात और. मेरी फेसबुक मित्र Ma Jivan Shaifaly (Shaifaly Topiwala) की रूप-छटा मेरी इस सखी की रूप-छटा से मैच करती है, जिसका नाम मैंने ज्वाला रखा है, और जिसके रूप का खासा वर्णन इस संस्मरण और कहानी में किया है. शैफाली ने अपने जीवन के कठिन दौर की चर्चा फेसबुक पर कई बार की है. सम्भवतः उनके विचार भी कुछ भिन्न तरीके से क्रांतिकारी रहे हों. बहरहाल, सबका कल्याण हो.

Wednesday, 20 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 5 ज्वाला से ज्वालामुखी तक

आम आदमी की ख़ास कहानी : 5
ज्वाला से ज्वालामुखी तक

इंसान ज्वालामुखी ऐसे ही नहीं बनते। बड़े जिगर वाले होते हैं वे, जो ज्वालामुखी बनने के लिए खुद को प्रस्तुत करते हैं.

बात तीस-पैंतीस वर्ष पहले की है. मेरा पुत्र शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में पढ़ रहा था. एक बार मैं बॉबी से मिलने शिमला गई तो ज्वाला (नकली नाम) मुझे वहाँ मिली. उसके दो बेटे भी उसी स्कूल में पढ़ रहे थे, बड़ा बॉबी से एक साल सीनियर था, छोटा एक साल जूनियर. जब पता चला कि वह दिल्ली में रहती है तो अच्छा लगा और आपस में बातचीत शुरू हुई. बातों में जब यह पता चला कि वह दिल्ली में उसी कॉलोनी में रहती है जिसमें मैं, तो और ज़्यादा अच्छा लगा. बातें आगे बढ़ीं, कुछ अपनापन बढ़ा. और जब यह पता चला कि मेरी तरह वह भी अकेली रहती है तो हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. यह तो सोने पर सुहागा था. उसने कहा, मैंने भी सोचा, अब हम पक्की सहेलियाँ हैं. चलो, अपनी दोस्ती का उत्सव तो मना लें. उत्सव मनाने के लिए दिल्ली लौटने तक सब्र किसे था? वहीँ किसी अच्छे रेस्तराँ में डिनर किया. बिल डच सिस्टम से चुकाया यानि उसने अपने पैसे दिए, मैंने अपने. और रात की बस लेकर हम शिमला से साथ लौटे। दिल्ली लौटने तक हम 'आप' से ' 'तुम' और 'तुम' से 'तू' पर आ चुके थे.

उसका रंग गोरा और सुनहरापन लिए था, शरीर इस कदर नपा-तुला, एक-एक चीज़ सही अनुपात में, बातों का लुभावना अंदाज़, रूप ऐसा जैसे तस्वीर में देखी देवियों वाला, कि लाख ढूँढने पर भी कोई दोष न मिले. रास्ते में चलती तो लोग ठहर जाते। (इसी के लिए मैंने एक बार एक पोस्ट में लिखा था कि कुछ रूप-सौंदर्य ऐसे होते हैं जिन्हें देख कर मन में वासना नहीं, भक्ति-भाव उपजता है.) तो ऐसी रूपवती थी वह.

हम दोनों का हर समय साथ रहने का सिलसिला शुरू हो चुका था. दिन भर हम दोनों अपने-अपने काम पर रहतीं. रात कभी मेरे घर गुज़रती, कभी उसके घर.

एक शाम मैं ऑफिस से सीधे उसके घर पहुँच गई. वह भी तभी लौटी थी. मेरा ध्यान अचानक इस बात की ओर गया कि उसने लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी. एक और दिन उसने लाल रंग का सलवार-सूट पहना था. तभी उसने साड़ी उतार कर एक ओर फेंकी और लाल साटन का नाइट गाउन पहन लिया. मैंने हँस कर कहा, 'ज्वाला, तुझे लाल रंग बहुत पसंद है.'

उसने हँसी में लपेट कर एक वाक्य मेरी ओर उछाल दिया, 'जानेमन, अब कपड़ों में ही रंग रह गए हैं, ज़िन्दगी के रंग तो फीके पड़ गए.'

वह पहचानी जाती थी, अपने इसी खूबसूरत अंदाज़ से. उसके बोलने का लहज़ा ही ऐसा था, एकदम मस्त, जो उसके व्यक्तित्व में रच-बस गया था.

उसने रसोई में जा गैस पर चाय का पानी चढ़ा दिया. फिर पीठ पर लहराते अपने खुले लम्बे बालों को जूड़े की शक्ल में लपेट लिया. अब उसका शोख चेहरा गरिमापूर्ण सम्भ्रान्त चेहरे में बदल गया था. कमरे से बाहर निकल वॉश बेसिन पर जा उसने चेहरा साबुन से धो लिया. अब उसके लिपस्टिक-विहीन चेहरे से सात्विकता झलक रही थी. पल-पल बदलते उसके रूप को मन ही मन सराहती मैं मंत्रमुग्ध हो गई थी. तभी कॉफ़ी का प्याला थमाते हुए उसने कहा था, 'सुन, तेरे चेहरे पर इतने काले धब्बे क्यों हैं? फेशियल नहीं कराती क्या?'

मैंने कभी अपने बाह्य रूप की ओर ध्यान नहीं दिया था. ऑफ़िस के अलावा समय या तो रोने में गुज़रता था या सोने में. कभी पढ़ने में भी. 'फेशियल.... कभी-कभी करा लेती हूँ,' मैंने जवाब दिया.

'अब तू नियम से फेशियल कराएगी,' उसने कहा, 'ज़रा सज-बन कर रहा कर. इतनी भी काली नहीं है तू, जितना अपने को बना कर रखा हुआ है. यूँ ही उलटे-सीधे कपड़े पहनती है और ऑफिस चल देती है. अब तू ढंग से रहेगी. मैं तुझे सजना सिखाऊंगी। और हाँ, रोेएगी तो बिलकुल नहीं।'

मैं उसके स्वर्ण की भाँति दमकते संगमरमरी रंग में खो गई, मैं उसके निष्कलंक सौंदर्य पर इतनी मुग्ध थी, कुछ उसकी बातें कानों में रस घोल रही थीं, मैं संवारूँगी तुझे, सारे ग़म दे दे मुझे, मैं मन ही मन उस पर न्यौछावर हो गई.

जैसा कि उसने बताया था, उसका विवाह बहुत छोटी उम्र में हो गया था. विवाह के एक वर्ष बाद एक बेटे को जन्म दिया। उसके जन्म के डेढ़ वर्ष बाद सात महीने की गर्भवती थी, कि पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई. पति की मृत्यु के दो महीने बाद उसने दूसरे पुत्र को जन्म दिया. पति अपने पीछे जमा-जमाया बिज़नेस और पर्याप्त धन-राशि छोड़ गए थे. उसने पति का बिज़नेस सम्भाला। नियति ने उसके साथ क्रूर मज़ाक किया था. धन-धन्य तो भरपूर दिया था पर पति का साथ छीन लिया था.

तभी उसके जीवन में एक चमत्कार हुआ. एक क्वारा लड़का, जो उससे उम्र में छोटा था, उसके रूप पर इस कदर मुग्ध हुआ कि अपने माता-पिता से ज़िद की कि वह शादी करेगा तो उसी से, अन्यथा किसी से नहीं. अमीर खानदान का इकलौता बेटा दो दुधमुँहे बच्चों वाली विधवा से शादी करना चाहता है, माँ-बाप मानें भी तो कैसे? बस एक बार उससे मिल लीजिए, बेटे की ज़िद पर माँ-बाप लड़की के परिवार से संपर्क करके इस लड़की से मिले, जिसे मैंने यहाँ ज्वाला नाम दिया है, तो त्राहि त्राहि कर उठे, 'ओह, इतनी प्यारी, इतनी कम उम्र की लड़की, देवियों वाला रूप, इसके दुर्भाग्य में इसका क्या कसूर? हम तैयार हैं.' और उसकी दूसरी शादी हो गई. वह गृहस्थिनों की तरह एक संयुक्त परिवार में रहने लगी.

दूसरी शादी के एक साल बाद उसने फिर एक बेटे को जन्म दिया और यहीं से शुरू हुआ उसकी बदनसीबी का सिलसिला. अब संयुक्त परिवार तो संयुक्त परिवार होता है, सास, ससुर, देवर, ननद, जितने लोग, उतनी बातें. बदनसीबी शुरू हुई इस बात से कि 'यह अपने बेटों को ज़्यादा प्यार करती है, हमारे को कम.' ज्वाला ने बताया था कि उस समय उसे उनसे कहने के लिए यह तर्क नहीं सूझा कि 'ये तीनों बच्चे आपके लिए अलग-अलग होंगे, एक आपका, दो मेरे, लेकिन मेरे लिए तो तीनों ही बेटे मेरे हैं. मैं एक को कम और दूसरे को ज़्यादा प्यार कैसे करूंगी?' उस समय उसके पहले दो बेटों की उम्र मात्र पाँच वर्ष और साढ़े तीन वर्ष थी.

उसने पति और ससुराल वालों के कहने पर अपने इतने छोटे बच्चों को शिमला के इस स्कूल में भर्ती कर दिया, जिसमें मेरा बेटा दस वर्ष की आयु में गया था. (जब हम दोनों मिले तो हमारे बच्चे दस-ग्यारह वर्ष के थे.) मेरा मन इस बात से बहुत दुखी हुआ था कि पाँच वर्ष के बच्चे को हॉस्टल में डाल दिया जाए. लेकिन इसके बावजूद उसकी दूसरी शादी टिक न सकी. उन्होंने तीसरा बेटा अपने पास रख लिया और आपसी रज़ामंदी से विवाह विच्छेद कर दिया. ज्वाला ने ज़िद-ज़बरदस्ती नहीं की क्योंकि उसका कहना था कि जो रिश्ता दिलों में टूट गया, उस रिश्ते के घिसटते रहने में कोई तुक नहीं थी. यह हमारा बेटा, यह तुम्हारा बेटा, यह सवाल बाद में भी उठ सकता था.

एक बात अच्छी हुई, जिसके लिए ज्वाला के दूसरे पति की जी भर कर तारीफ़ मैंने की थी. ज्वाला के दूसरे पति ने शादी के समय इसकी पहली शादी से उत्पन्न दोनों बेटों को कानूनन अडॉप्ट किया था. यह बात उन्होंने निभाई कि बेटों के प्रति वे सारा दायित्व निभाएँगे, समय-समय पर उनसे हॉस्टल जाकर मिलेंगे, उन्हें किसी बात का पता नहीं चलने देंगे.

(मैंने ज्वाला से कहा था कि जब बच्चों को गोद लिए पिता से भी ज्वाला का तलाक हो चुका है तो बच्चों को उनके असली पिता के बारे में क्यों न बताया जाए? मेरी सलाह पर ज्वाला ने स्कूली शिक्षा पूरी होने पर बच्चों को असलियत से परिचित कराया. बच्चे यह सच्चाई मानने को तैयार नहीं थे कि उनके पिता, जो उन्हें इतना प्यार करते थे, उनकी हर इंच्छा पूरी करते थे, उनके सगे पिता नहीं थे. और जो उनके सगे पिता थे, उन्हें उन्होंने कभी देखा तक नहीं था, उनकी कोई स्मृति उनके पास नहीं थी. उन्हें धक्का तो ज़रूर लगा लेकिन भगवान जब जीवन में हादसे देता है तो उन्हें सहने की शक्ति भी देता है.)

इस हादसे से गुज़र कर ज्वाला फिर पुराने ढर्रे पर थी. उसने अपने पहले पति का बिज़नेस सम्भाल लिया था. बिज़नेस भी ऐसा जो कभी किसी महिला को करते नहीं सुना था, मोटर पार्ट्स का, जो ज्वाला ने पूरी तरह सीखा, समझा और सफलता पूर्वक चलाया.

'यार, यह पति बड़ी बकवास चीज़ होता है,' एक शाम, जब हम ऐसे ही साथ थे, तब उसने कहा था.

'छोड़ ना, कहाँ यह पति-पुराण ले बैठी?' मैंने कहा.

वह आगे बोली, 'भीड़-भाड़, चिल्लपौं की आदत अब ख़त्म हो गई है. कितनी अच्छी ज़िन्दगी है, न कहीं जाने के लिए किसी से आज्ञा लेनी, न किसी के लौटने की प्रतीक्षा. मन आए खिचड़ी बनाओ, मन आए, बाज़ार में खाओ. कितनी अच्छी ज़िन्दगी है. है ना?'

मैं क्या कहती? खिचड़ी बनाते और बाज़ार में खाते मेरा मन ऊब चुका था. घर में ढेर सारे लोग हों तो कितने भिन्न-भिन्न प्रकार के खाने बनें, अकेले के लिए क्या बनाओ? उसका कहना था, विवाह आवश्यक होते हुए भी आदर्श स्थिति नहीं है. अचानक उसके चेहरे की चमक बुझ गई, उसकी आँखें खाली हो गईं और एक असहायता उसके सौंदर्य को फीका कर गई. ऐसे में उसे अपने पुराने दिन यूँ याद आए, 'कभी हम भी पतिव्रता थे. पति के पैर दबाते थे, ससुराल वालों की सेवा में जुटे रहते थे, बच्चों के रोने-धोने से घिरे रहते थे. आखिर वह भी तो ज़िन्दगी थी, उसमें भी तो हम खुश थे. यह तो जो हम आज हैं, सब परिस्थितिओं की बदौलत.'

उसका बहुवचन में बात करना टूटी हुई स्त्रियों की स्थिति का सामान्यीकरण करना था. इस सामान्यीकरण ने मुझे उसके और नज़दीक पहुँचा दिया था. वातावरण में एकाएक छा गई चुप्पी से मुझे महसूस हुआ था, हम किसी गूढ़ विषय पर आकर अटक गए हैं. अपने अतीत की बातें दोहरा-दोहरा कर हम अपने वर्तमान को भी दुखद बना लेते हैं. मैं सोच ही रही थी कि फिर उसका ठहाका हवा में उछला था, 'अब हम रोने-धोने में विश्वास नहीं करते. हम का मतलब, मैं और तू.'

'फिर किसमें विश्वास करते हैं?' मैंने पूछा था.

''इश्क करने में. अब हम हज़ारों इश्क करेंगे. हमें ज़िन्दगी जीने की पूरी छूट मिली है. अब हम ज़िन्दगी को पूरी तरह जिएँगे,' वह बोली थी.

भयंकर. मैंने सिर्फ सोचा था, बोला था यह, 'मैं तो सोचती थी, एक चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है और तुम हज़ारों की बात कर रही हो.'

'पगली, चाहने वाला एक तो कभी मिलता ही नहीं और हज़ारों बड़ी आसानी से मिल जाते हैं.' उसने कहा था और मैं उदास हो गई थी.

जब हम इतनी-इतनी देर तक बातें करते थे, तो एक-दूसरे के घर सोना स्वमेव निश्चित हो जाता था. मैंने उदास स्वर में कहा था, 'अब सोएँ? बारह बज चुके हैं. लाइट बंद कर दो.'

वह मेरे पास खिसक आई थी और बोली थी, 'तुम तो वाकई बहुत उदास हो गई हो. लगता है, तुम्हें तुम्हारा 'वह' याद आ रहा है.'

मुझे 'वह' याद नहीं आ रहा था. अभी तक मैं उस की 'हज़ारों' की बात पर टिकी हुई थी. एक तरह से उखड़ गई थी. इधर उसकी छनछनाती हँसी से शब्द झर रहे थे, 'बावली, तूने बताया था, तेरे उस निर्लज्ज ने दूसरी शादी कर ली है. इसलिए अब तू उसके बारे में मत सोचा कर. यहाँ तू उसे याद कर रही है, वहाँ वह अपनी बीवी के साथ सोया होगा.'

उसकी बातें इतनी दिलकश थीं कि मैं अधिक देर तक उदास नहीं रह पाई थी. रात बहुत बीत चुकी थी. सुबह काम पर जाना था, इसलिए हमें सोना पड़ा था.

एक दिन ज्वाला ने गम्भीर होकर पूछा, 'तुम्हारे फ़िगर की किसी ने तारीफ़ की?'

'लोगों की आँखों में कभी-कभी ऐसा भाव ज़रूर नज़र आया है, लेकिन तारीफ़ तो कोई तब करेगा, जब मैं करने दूँगी,' मैंने गर्वोन्नत होकर कहा था.

'यानि कि तुम हौआ हो?' उसने मेरा मज़ाक उड़ाते हुए और अपने प्रशंसकों की गिनती गिनाते हुए चंचलता से कहा, 'अपना तो भई यह उसूल है कि दो-चार प्रशंसक अपने इर्द-गिर्द ज़रूर होने चाहिए.'

वर्षों से स्थिर मेरे ह्रदय-सागर में उसने जैसे एक कंकरी फेंकी थी और शांत जल में छोटी-छोटी लहरियाँ उठने लगी थीं. मैं स्वयं को काफ़ी मूर्ख नज़र आ रही थी. वह कितनी समझदार है. हँसना जानती है, जीना जानती है. यह तो सरासर नादानी है कि दुःख को अपने से चिपटाए रखो. उसकी बातों में मुझे अपने लिए खुशियों के द्वार खुलते हुए जान पड़े थे.

उस दिन हम दोनों मेरे घर में थी. मैंने उससे पूछा, 'सिर्फ बातों से पेट भरना है क्या? चलूँ, कुछ खाना-वाना बना लूँ.'

वह बोली, 'हाँ यार, भूख तो लगी है. चल, आज खिचड़ी से थोड़ा ऊपर उठते हैं. मटर-चावल बना ले, वह कहते हैं ना जिसे, पुलाव.'

घर में मटर नहीं थी. खिचड़ी बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी थी. ब्रेड-अण्डों से काम चला लिया था. और उसकी बातों की लोरियों में नींद कब आ गई थी, पता नहीं चला था.

यहीं से शुरू हुआ था हमारी जिंदादिलियों का सिलसिला. पार्टियाँ और महफ़िलें. मुझे अचानक एक दिन अहसास हुआ कि जीवन में एकाएक रौनक आ गई है. इसमें बुरा भी क्या है? फिर जो भीड़ है, सब उसकी है. मैं सिर्फ उसके साथ हूँ, उसके जीने के ढंग में बाधा न बनते हुए, अपने जीने के ढंग को ज्यों का त्यों बनाए हुए. पर कितनी हैरानी की बात थी कि इतने बड़े पुरुष-वर्ग में से किसी की आँखों में भावनाओं का वह सागर लहराता नज़र नहीं आता था, जिसकी मुझे  तलाश थी. 'छोड़ यार, सब टाइम वेस्ट है,' मैंने उससे कहा था.

'नो जानेमन, यह टाइम वेस्ट नहीं, यह टाइम पास है,' वह मुझे समझाते हुए बोली थी, 'तू खुद सोच, कभी-कभी हम कितने अकेले हो जाते हैं? समय बिताना चाहें तो कोई साथ नहीं मिलता. रोना चाहें तो किसका कंधा है सिर रख कर रोने के लिए? मरना चाहें तो किसे हमारी ज़रूरत है जो आगे बढ़ कर हमें रोक लगा, मरने न देगा? यहाँ तक कि हँसना भी चाहें तो कौन निष्कपट ह्रदय से हँसेगा हमारे साथ?'

उसकी बातें सच प्रतीत होते हुए भी मुझे बड़ी उलझन में डाल जाती थीं. हमें क्या ज़रूरत है रोने के लिए किसी कंधे की? हँसने के लिए किसी के साथ की? हम अकेले ही क्यों नहीं....

'अकेले तो हम हैं ही,' वह कहती, 'परन्तु दो-चार पल के लिए यदि कोई साथ मिलता है तो उसे क्यों खोएँ? अब हम खुशियों को क्षणों में एकत्र करेंगे. क्षण-क्षण जोड़ कर अपने लिए पूर्णता का सृजन करेंगे.'

उसकी आवाज़ दार्शनिक हो उठी थी. मुझसे कोई उत्तर देते न बना था. मेरा सारा ज्ञान उसके तर्कों के सम्मुख चौपट हो गया था. मैं चुप सुनती रही जब उसने कहा, 'लोग बड़े आराम से जी रहे हैं. लोगों को हमारी परवाह है कि हम कैसे जिएँगे? अकेले हम कैसे जी पाएँगे? लोगों के पास मन है, क्या हमारे पास मन नहीं है? लोगों के पास शरीर है, क्या हमारे पास शरीर नहीं है? क्या हमारे मन और शरीर की अपनी-अपनी माँगें नहीं हैं? अगर हम अकेले हैं तो क्या यह अकेलापन हमारा चुना हुआ है?'

मेरे दिमाग में खट से कुछ बजा और मैंने जैसे सच को स्वीकार करते हुए कहा, 'हाँ, यह मेरा अकेलापन मेरा चुना हुआ है.'

'नहीं माई डिअर, तुम्हारा अकेलापन तुम्हारा चुना हुआ नहीं है, बल्कि तुम इसे चुनने के लिए विवश हुईं,' उसने मुझे टोक कर कहा, 'कोई आत्महत्या करता है तो क्या वह ख़ुशी से आत्महत्या करता है? नहीं, वह आत्महत्या करने के लिए विवश होता है, विवश किया जाता है.'

'पता नहीं तेरे दिमाग में इतनी बातें कहाँ से आती हैं?' मेरी जिज्ञासा का समाधान उसने इन शब्दों में किया था, 'तेरी तरह पोथियाँ नहीं पढ़ीं मैंने, मणिका डार्लिंग, ज़िन्दगी को पढ़ा है.'

एक दिन तो गज़ब ही हो गया. मैं रात को उसी के घर थी. उसने मेरे सामने एक फोटो रखा और बोली, 'इसे ज़रा देख तो.' वह मेरे लिए एक 'लड़का' ढूँढ लाई थी, एकदम अरेंज मैरिज माफिक. बहुत पैसे वाला. उसके अन्य गुण क्या थे, यह बताने के लिए वह बोलना शुरू हुई कि मैंने उसे डाँट दिया, 'पागल हुई है क्या? इससे तू ही तीसरी शादी कर.'

'ना मेरी बच्ची,' क्या-क्या अदाएँ थीं उसकी? रिश्ता लाई थी, इसलिए मेरी माँ बन गई, 'तू एक बार उससे मिल तो ले, 'हाँ' कर दे, बहुत पैसे वाला है, तुझ पर पैसा पानी की तरह बहा देगा.'

'फिट्टे मुँह तेरा. बस, अब हमारी दोस्ती ख़त्म.' मुझे उस पर इतना गुस्सा आया कि मैंने उस दिन उससे दोस्ती ख़त्म करने का फैसला कर लिया था. वह 'सुन तो ज़रा, सुन तो ज़रा' कहती रह गई और मैं आधी रात को उसके घर से उठ कर अपने घर आ गई.

संयोग कुछ ऐसा बना कि मैं कुछ दिन बाद ही मुंबई ट्रांसफर पर चली गई, फिर वहाँ से गयाना. दस साल बाद जब दिल्ली लौटी तो पता ही नहीं चला कि ज्वाला कहाँ है?

कुछ समय पहले अचानक वह टकरा गई, एक मॉल में शॉपिंग करते हुए. मैं पुत्र और परिवार के साथ थी, वह भी अपने बड़े पुत्र और परिवार के साथ थी. उसने बताया, उसके दूसरे पति से उत्पन्न पुत्र की तेज़ बाइक चलाने के कारण सोलह वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई थी. उसके पहले पति से उत्पन्न बड़ा पुत्र यहीं दिल्ली में वेल सेटल्ड है. छोटा पुत्र विदेश में है, बहुत अच्छी जॉब में. उसकी भी शादी हो गई है. ज्वाला छह महीने यहाँ रहती है, बड़े पुत्र के साथ और छह महीने वहाँ रहती है, छोटे पुत्र के साथ. संतुष्ट है कि बिना बाप के बच्चे उम्मीद से ज़्यादा ऊँचे उठे हैं.

जैसे इतनी कटी है, बाकी भी कट जाएगी, जानेमन, चिन्ता क्या?

Sunday, 17 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 4 यह है निर्दयी नगरिया, तू देख बबुआ

आम आदमी की ख़ास कहानी : 4
यह है निर्दयी नगरिया, तू देख बबुआ

वे मेरी सम्मानित सम्बन्धी थीं. उस समय उनकी आयु 92 वर्ष थी. एक बार उनके बेटा-बहु हमसे मिलने आए तो हमने उनकी माँ का हालचाल पूछा। बेटा बोला, 'जिए ही जा रही हैं. जिए ही जा रही हैं, आदमी थकता नहीं इतना जीते-जीते?'

बहु ने ठहाका लगाया। हम क्या कहते? हम भी मुस्कुरा कर रह गए. मुझे उन वृद्धा सम्बन्धी पर तरस आया, मैंने कहा, 'जीना, मरना क्या अपने बस में है? यह जीवन दोबारा नहीं मिलता। अच्छा है, जितना जी लें.'

'उन्हें जीने से कौन रोक रहा है? हमारे चाहे मर जाएँगी क्या वो?' बहु तमक कर बोली।

'ऐसे न बोलो। बस स्वस्थ रहें, मैं यही दुआ करती हूँ.' मैंने कहा.

'स्वस्थ? अजी, बहुत तगड़ी हैं वो. सारे घर में फुर्ती से इधर-उधर घूमती रहती हैं. सुबह छह बजे उठ जाती हैं, अपनी चाय बनाती हैं. अब हमारे बस का तो है नहीं इतनी जल्दी उठना,' बहु बोली।

'निर्लज्ज,' मैंने उस बहु को मन में गाली दी.

बहु मेरे बेटे-बहु से बोली, 'भई, जब एक ही बेटा हो तो करना तो उसे ही पड़ता है, चाहे हँस के करो, चाहे रो के करो.'

उसके ऐसा कहने से मैं डर गई. यह तो मेरे बेटा-बहु को बिगाड़ के रख देगी। मेरे बेटा-बहु तो ठीक ही हैं. 'पर,' मेरे अंतर्मन से कोई बोला, 'तुम ही आज कौन सी 92 की हो, अभी तुम घर में हर तरह से सहयोग कर रही हो, कौन जाने, कल क्या हो?' ऐसी बातों से कौन नहीं डर जाएगा? कल का क्या पता? हम गारंटी से किसी के बारे में कुछ नहीं कह सकते।

वे विदा हुए, हमें अपने घर आने का निमंत्रण दे कर. हम कहाँ जाने वाले थे? उनका घर दूसरे शहर की तरह दूर था. वैसे भी मैं टूटे-फूटे परिवारों में, गलत संस्कार के लोगों के बीच जाने से कतराती हूँ, उनके बुरे सितारे मुझ पर असर न करें, इस डर से. साथ ही, मन दुखी भी होता है. लेकिन एक दिन जाना ही पड़ा. हमारे घर में कोई आयोजन था, दोपहर को सम्बन्धियों के भोजन की व्यवस्था थी. मैंने उन्हें फोन किया तो बोले, 'नहीं नहीं, आप कभी हमारे घर नहीं आईं, तो बुलाने के बहाने ही आइए.'

मैं और बेटा उनके घर गए. बातें, हँसी-मज़ाक, ठहाके। ज़िद करके उन्होंने खाना खिलाया। कहीं 'वो' नहीं दिख रही थीं. मैंने उनके बारे में पूछा तो वे मुझे उनके कमरे में ले गए. वे अपनी चारपाई पर लेटी हुई थीं. मुझे देखते ही उठ बैठीं। मैं उनके पास बैठ गई. उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरा, 'आ मोहिनी, तुझे सालों बाद देखा।'

जो लोग मेरे बचपन और माँ-पिता के घर की यादों से जुड़े हैं, वे सब मुझे 'मोहिनी' नाम से पुकारते हैं.

'ठीक हो?' मैंने पूछा।

'हाँ, ठीक ही हूँ. मेरे बेटा-बहु बहुत अच्छे हैं, देखो ना, घर में ही रह रही हूँ, कम से कम मुझे घर से बाहर तो नहीं निकाला,' वे बोलीं।

उफ़ ! उनके इस कथन से मैं तड़प उठी. 'यह घर तो आपका ही है, आपका ही बनवाया हुआ,' मैंने उन्हें तसल्ली दी, और आगे कहा, 'आइए, आप भी हमारे साथ ड्राइंग रूम में बैठिए। बॉबी, इनका हाथ पकड़ लो,' मैंने अपने बेटे से कहा तो उनका बेटा बेशर्मी से बोला, 'हाथ पकड़ने की ज़रूरत नहीं है, यह कोई अपाहिज थोड़े ही हैं, चल सकती हैं, सारे घर में दौड़ती फिरती हैं,'

मैं उन बेशर्मों को कैसे समझाती कि हाथ पकड़ने की ज़रूरत सिर्फ अपाहिजों को ही नहीं होती. इसे टच थेरेपी (Touch Therapy) कहते हैं, जिससे अपनापन मिलता है, अपनों का भरोसा मिलता है. पर कोई अपनापन देना चाहे, तब ना.

मैं उन्हें हाथ पकड़ कर ड्राइंग रूम में लाई, वे मुझसे फुसफुसा कर बोलीं, 'मोहिनी, तुझसे बोल कर आज मेरे मुँह की हवा निकली है, वरना मैं तो किसी से बोलने को तरस गई थी.'

'हमारे घर भी तो इतनी दूर-दूर हैं, वरना मैं तो रोज़ आपसे बोलने आ जाती,' मैंने भी फुसफुसा कर कहा, 'किसी की परवाह मत करो, आराम से जिओ, सोचो, सब मर गए हैं, आप अकेली हैं.'

'अरे मोहिंनी, मर तो मैं चुकी हूँ, सालों पहले, बस, अब तो बस यह शरीर छोड़ना बाकी है,' उन्होंने कहा.

'हमारे घर में दस दिन बाद पार्टी है, सब रिश्तेदारों और कुछ मित्रों को दोपहर के खाने पर बुलाया है. आपको ज़रूर आना है, आपका आशीर्वाद चाहिए। देखो, इन्हें ज़रूर लाना,' मैंने उनके बेटे से कहा और विदा ली.

अगले दिन दोपहर उनके बेटे का फोन आया, वे गुज़र गईं, रात को सोते में ही शायद दम तोड़ दिया। मैं हैरान-परेशान, क्या वे सिर्फ मुँह की हवा निकलने का इंतज़ार कर रही थीं? क्या वे किसी से अपने मन की आखिरी बात कहना चाहती थीं?

हम उसी समय उनके घर गए. तीसरे दिन उनके चाओथे/उठाले में भी गए तो मैंने उनके बेटे से कहा, 'क्या मैं अपना फंक्शन स्थगित कर दूँ, क्योंकि तुम लोग तो आओगे नहीं?'

वह बोला, 'अरे नहीं, हम इन बातों को नहीं मानते। हम ज़रूर आएँगे।'

तो यह दुनिया है. जब किसी के जीते-जी ही किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा तो मर जाने के बाद क्या फर्क पड़ता?
डर लगता है ना कि हम जब उस उम्र में पहुँचेंगे तो हमारा क्या हाल होगा? चाहे हमने अपनी संतान को कितने ही अच्छे संस्कार दिए हों लेकिन घर से जुड़ने वाले अन्य रिश्ते भी अपने संस्कार बाँटते हैं, बाहर दोस्तों से भी व्यक्ति सीखता है. कहाँ-कहाँ से बचा कर रखेंगे अपनी संतान को? किसी डिब्बे में बंद करके तो रख नहीं सकते।

संस्कारों की बात भी छोड़ दें तो यह सच है कि घर के बड़े-बुजुर्गों के लम्बी उम्र तक जीने से नई पीढ़ी सच में ऊब जाती है. बूढ़ों की कोई उपयोगिता तो रह नहीं जाती, सिवाय आशीर्वाद देने के. बल्कि वे नई पीढ़ी के गतिशील जीवन में बाधा होते हैं, उनके रोज़ के दुःख-दर्द को लेकर बच्चे बैठे रहें या अपना जीवन जीएँ? बच्चों और जवानों के अपने जीवन में करने के लिए इतना कुछ होता है कि उन्हें यह सोचने की भी फुर्सत नहीं होती कि कभी हम भी उस उम्र को पहुँचेंगे।

जैसे दुनिया चलती आई है, ऐसे ही चलती रहेगी।

Saturday, 16 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 3 जब मैंने पत्नी के हक में फैसला दिया

आम आदमी की ख़ास कहानी : 3
जब मैंने पत्नी के हक में फैसला दिया

यह कहानी सच्चे किरदारों की सपाट कहानी है.

कई बार बाहरी तत्व हमारी ख़ुशी में बाधा नहीं होते। हमारा अपना मन ही हमें भँवरजाल में उलझाए रखता है.

इधर वर्षों बाद उन मिस्टर एन्ड मिसेज़ से मुलाकात हुई। मिसेज़ पहले की तरह ही गोरी-चिट्टी और खाते-पीते घर के डीलडौल वाली थीं। मिस्टर एकदम बुढ़ा  गए थे। उनके स्वास्थ्य में इतना अधिक परिवर्तन था कि यदि अकेले दिखते तो मैं उन्हें पहचान न पाती। आखिर बीसेक साल बाद देख रही थी। भला हो उनकी मिसेज़ का, जो वे पहचाने गए। मुझसे रहा न गया और मैंने पूछ ही लिया, 'ओये, तू इतना कैसे ढल गया कि पहचान में ही नहीं आ रहां? भाभी जी को देखो, पहले की तरह चमक रही हैं।'

हम एक जैसी उम्र के थे और एक ही मोहल्ले में साथ-साथ पले-बढे थे.

'दो-दो को संभाल रहा हूँ। मज़ाक है क्या?'

हैं? यह उन्होंने क्या कह दिया? वह भी इतने खुल्लम-खुल्ला? क्या पत्नी को बता दिया है अपनी उस दूसरी के बारे में?

'ये तो ऐसे ही कुछ भी बोलते रहते हैं,' मिसेज़ ने स्पष्टीकरण दिया।

लगभग चालीस वर्ष पूर्व उन दोनों का विवाह हुआ था। पहले दिन से मिस्टर को मिसेज़ पसंद नहीं आईं। कारण बताया, 'मोटी है।'
विवाह के समय दोनों की आयु उन्नीस-बीस वर्ष रही होगी। उस समय वे कॉलेज में पढ़ रहे थे। एक तरह से बाल विवाह था। माता-पिता की इच्छा के आगे कुछ कह नहीं पाए। अमीर व्यापारी पिता थे। करोड़ों की चल-अचल सम्पत्ति। इकलौती संतान यह पुत्र। माता पिता के मन में ढेरों चाव। बस, विवाह होना था, हो गया।

उनके विवाह के एक साल के भीतर पिता के अचानक असमय निधन के बाद उन्हें बिज़नेस सम्भालना पड़ा। पढ़ाई बीच में रुक गई, एक तरह से ख़त्म ही हो गई। संयोग कहिए कि अपने कार्यक्षेत्र के नज़दीक रहने वाली एक लड़की से उनका जो परिचय हुआ, वह प्रेम और उसके बाद मंदिर में चोरी-छुपे फेरों तक पहुँच गया। उन्होंने ही मुझे उस लड़की के बारे में बताया। मुख्य बात कि 'पतली है, एकदम छरहरी।' और उनकी ज़िन्दगी आराम से चलने लगी। घर में पत्नी के साथ भी ठीक से रहने लगे। दूसरी होने से पत्नी के साथ शायद ज़्यादा ठीक से रहा जाता है कि कहीं दूसरी का भेद न खुल जाए।

बीस वर्ष मैं उस अवैध सम्बन्ध की साक्षी रही। मैं क्या, हमारे हमउम्र बहुत से मित्रों को पता था लेकिन उनकी पत्नी को कानोकान खबर नहीं थी। पत्नी के साथ भी घूमना-फिरना, सैर-सपाटे, फ़िल्म-तमाशे, बदस्तूर जारी थे। कार्यक्षेत्र में सब यह समझते थे कि वह दूसरी उनकी पत्नी है। वह बाकायदा माँग में सिन्दूर, बिन्दी, चूड़ी, करवा चौथ, सारे तीज-त्यौहार नियम से करती थी. वहाँ अलग मकान, अलग गृहस्थी बसी हुई थी। दोनों से एक-एक बेटा कुछ महीनों के अंतराल पर हुआ। दोनों बेटे अलग-अलग बढ़िया स्कूलों में। दोनों तरफ ठाटबाट। सच में आदर्श ज़िन्दगी थी। पहली को कुछ पता नहीं। दूसरी को कोई समस्या-शिकायत नहीं।

हम मित्र प्रायः यह बात किया करते, 'यार, यह तो बड़ा नसीब वाला निकला। एक घरवाली और दूसरी बाहरवाली, दोनों के साथ बढ़िया तालमेल बैठाया हुआ है. इसके तो मज़े हैं यार.'

क्या यह पैसे का खेल था? या वे मिस्टर समझदारी से चल रहे थे?


एक दिन मिस्टर मेरे पास आए और बोले, 'मोहिनी, मैं बहुत परेशान हूँ। मुझे पता है, तू बहुत अक्लमंद है, तू ही मेरी समस्या हल कर सकती है।'

'बता, क्या हुआ?' मैंने पूछा।

'यार, मैं थक गया हूँ दोहरी ज़िन्दगी जीते-जीते। एक ही फ़िल्म दो-दो बार देखनी पड़ती है। एक ही होटल में आज इसके साथ खाना खाओ, कल उसके साथ। आज इसे शॉपिंग कराओ, कल उसे. मैं तो सच मर गया.'

'तो? यह सब तुम्हारा ही चुना हुआ है,' मैंने कहा.

'बस, अब एक तरफ होना चाहता हूँ. उसके भाई भी कई बार कह चुके हैं कि पत्नी से तलाक लो और हमारी बहन से कानूनन शादी करो. आखिर उसके सारे रिश्तेदारों में पता है कि हम पति-पत्नी हैं. मैं उसकी साइड के हर फंक्शन में उसके साथ जाता हूँ.'

'यानि तुम यह कहना चाहते हो कि तुम पत्नी को छोड़ कर उसे चुन रहे हो?' मैंने पूछा।

'नहीं, मेरा वह मतलब नहीं। मैं असल में कन्फ्यूज्ड हूँ. समझ नहीं पा रहा, किसे चुनूँ? अब मुझे वाइफ से भी कोई शिकायत नहीं है. घर में सब ठीक चल रहा है, इज़्ज़त बनी हुई है. मुझे दूसरी भी बेहद पसंद है. असल में मैं दोनों के साथ रहना चाहता हूँ पर थक गया हूँ. मैं खुद को फँसा हुआ महसूस करता हूँ. मेरे जीवन से सुकून ख़त्म हो गया है. मैं क्या करूँ? तू ही बता, मोहिनी, मैं क्या करूँ?'

'तेरी समस्या का हल मुश्किल है. जिसे भी छोड़ेगा, उसे ही दुःख होगा।'

'एक बात और साफ़ कर दूँ कि मैं किसी का दिल नहीं दुखाना चाहता। मैं दोनों के प्रति वफादार हूँ.'

क्या बात है वफादारी की? वाह वाह. सबके पास अपने हिसाब से वफादारी की परिभाषा है. मैंने सोचा। कहा यह, 'यूँ तो दोनों ठीक हैं, किसी को भी चुन सकते हो. पर पत्नी का पलड़ा एक वजह से ज़्यादा भारी है.'

'किस वजह से?'

'इस वजह से क्योंकि वह तेरी ब्याहता पत्नी है. दूसरे, यदि तूने उस दूसरी औरत की खातिर पत्नी को छोड़ना होता तो क्या इतने सालों में छोड़ नहीं चुका होता? अब शादी के बीस साल बाद क्यों सब उलट-पुलट करना? और मैं क्या कह सकती हूँ? आगे तू जान.'

बस, उसके बाद मेरा उन लोगों से मिलना नहीं हुआ. उसकी कहानी एक तरह से मेरे दिमाग से ही निकल गई. इतने साल बाद अब मिलना हुआ तथा उसका यूँ खुलेआम कहना कि 'दो-दो को संभाल रहा हूँ,' मेरी जिज्ञासा को जगा गया कि आखिर अब वह दूसरी कहाँ है?

मिस्टर ने मिसेज़ को इधर-उधर करके संक्षेप में मुझे जानकारी दी कि वे उस समय तुरंत तो कोई निर्णय नहीं कर पाए थे, हाँ, बाद में उस दूसरी के भाइयों ने पाँच करोड़ में समझौता किया और अपनी बहन को भी शायद दुनियादारी सिखाई। उसका बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त कर अमेरिका में सेटल है, माँ भी, जो अब सास बन चुकी है, उसके साथ अमेरिका में है. मिस्टर की पत्नी से पैदा हुआ बेटा मर्चेंट नेवी में है, विवाह हो चुका है, बेटा अपनी पत्नी के साथ ज़्यादातर शिप पर रहता है. मिस्टर का राज़ अभी तक मिसेज़ को नहीं पता, यह कितने बड़े सुकून की बात है.

अंत भला तो सब भला.

Friday, 15 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 2 और वह सचमुच मर गया.

आम आदमी की ख़ास कहानी : 2
और वह सचमुच मर गया.

(यह सत्य कथा मैंने 2014 में दो पोस्ट में दी थी, जिसमें सारे मैसेज कॉपी पेस्ट किए थे. अब पुनः सम्पादित कर एक बार में यहाँ दे रही हूँ. पुराने मित्रों ने पढ़ा होगा. नए मित्रों के लिए प्रस्तुत है.)

मुझसे फेसबुक पर बहुत लोग निकटता महसूस करते हैं और अपनी समस्याएँ डिस्कस करते हैं. अपनी कितनी गुप्त बातें भी बता देते हैं. मेरी रचनाओं से, मेरी पोस्ट से लोगों को लगता है कि मैं प्रेम के मसले सुलझाने में पारंगत हूँ. (यह बात उन्हें नहीं पता कि मैं अपने ही मसले नहीं सुलझा पाती।) तो कई बार ऐसा होता है कि दूर बैठे भी किसी के साथ हमारी हृदयतन्त्री मिल जाती है और हम अपना दुःख-सुख बाँट लेते हैं.

एक 28 वर्षीय पुरुष, जो अच्छी कमाई वाले एक सम्भ्रान्त पेशे में थे, ने मुझे लिखा, 'यदि आपने मेरी समस्या का समाधान नहीं किया तो मैं आत्महत्या कर लूँगा।' मैंने समस्या बताने के लिए कहा. पूरा दिन मैसेज करके उन्होंने बताया कि वे अविवाहित हैं और अपने से नौ वर्ष बड़ी एक विवाहित महिला से उनका प्रेम सम्बन्ध है तथा शारीरिक सम्बन्ध भी है. उस महिला के दो या तीन (?) बड़े बच्चे हैं. बड़ी बेटी पंद्रह वर्ष की है. वह महिला भी उनसे उतना ही प्रेम करती है, उसके पति का व्यवहार उसके साथ ठीक नहीं है.

मैंने कहा, 'जब आप दोनों ही एक-दूसरे से इतना प्रेम करते हैं तो समस्या कहाँ है? यूँ ही चलाते रहिए।'

वे बोले, 'नहीं, अब मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होता कि वे एक गैर मर्द के साथ रहें.'

'गैर मर्द? मैं समझी नहीं,' मैंने पूछा।

'उनका पति. न जाने रात में वह उनके साथ क्या करता होगा। सोच कर ही मेरा खून खौल उठता है। मेरे लिए अब यह बात बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है कि वे प्यार मुझसे करतीहैं और रहती किसी और के साथ हैं. मैं मर जाऊँगा, मणिका जी, आप कुछ कीजिए।'

मैं कहना चाहती थी कि गैर मर्द तो आप हैं, लेकिन उस समय यह कहना उन मित्र का दिल तोड़ना होता। मैंने पूछा, 'आप मुझसे क्या सहयोग चाहते हैं?'

'आप मुझे बताएँ कि मैं उनके आदमी को रास्ते से कैसे हटाऊँ? मैं उनके बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। मैं ज़हर खा लूँगा।'

प्यार वाकई जुनूनी होता है.

'क्या आप उस औरत से शादी कर सकते हैं?' मैंने पूछा।

'ज़रूर कर सकता हूँ, करना चाहता हूँ पर कैसे करूँ?'

'क्या आप उसके बच्चों को, जो आपसे बारह-पंद्रह साल छोटे हैं, अपने बच्चों की तरह अडॉप्ट करेंगे? उनके पिता बनेंगे?' मैंने पूछा।

'हाँ, ज़रूर बनूँगा, लेकिन बच्चे शायद माँ के साथ आना पसंद न करें क्योंकि वे अपने पिता से ज़्यादा प्यार करते हैं.'

यहाँ मुझे लगा कि बच्चों के लिए उनके मन में पूर्ण स्वीकार नहीं है.

'फिर भी, आप अपनी बताएँ कि बच्चों को अपनाने में आपको कोई ऐतराज़ तो नहीं?' मैंने फिर पूछा।

'नहीं, मुझे कोई ऐतराज़ नहीं।'

'आपके घरवालो को ....… '

'मुझे किसी की कोई परवाह नहीं।'

'तो ऐसा कीजिए, उन महिला से कहिए कि आप उनसे शादी करना चाहते हैं, वे अपने पति से तलाक लेने की तैयारी करें,' मैंने उन्हें सुझाव दिया।

'मैं अभी उनसे यह पूछता हूँ, और आपसे रात को फिर बात करता हूँ,' उन्होंने कहा.

मैंने सोचा, फोन पर पूछ रहे होंगे या उनसे मिलने चले गए होंगे। शायद नज़दीक रहती हों.

रात को उनका मैसेज आया, 'मणिका जी, वे अपने पति से तलाक लेने के लिए तैयार नहीं हैं. मैंने बहुत कहा, उनके आगे रोया, गिड़गिड़ाया कि मैं उनके बिना जी नहीं सकता लेकिन वे नहीं मानीं। कहने लगीं, इतने बड़े बच्चे हैं, ये सब बातें शोभा नहीं देतीं, उनका पति जैसा भी है, वह उसी के साथ गुज़ारा कर लेंगी।'

'अब आप सोचिए कि आपको क्या करना है? यूँ ही अधर में लटके रहना है या आगे बढ़ना है? यह सोच कर अपने दिल को समझाइए कि आपने प्यार तो सच्चा किया लेकिन पात्र सही नहीं चुना,' मैंने कहा.

'पता नहीं, मैं मर जाना चाहता हूँ. एकदम से उन्हें नहीं छोड़ पाऊँगा।'

'एक झटके से तोड़ दीजिए, कष्ट एक ही बार होगा। रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ेंगे तो कष्ट रोज़ होगा,' मैंने कहा और मैसेज बॉक्स बंद कर के सो गई.

सुबह उठी तो आधी रात को आया हुआ उन मित्र का मैसेज देखा, लिखा था, 'आपसे बात करके बहुत तसल्ली मिली। मैं रोज़ उनके साथ भागने के ख्वाब देखता था, सोचता था, जब कहूँगा, वे मेरे साथ भाग चलेंगी, सब कुछ छोड़-छाड़ कर. उन्हें तलाक दिलवा कर शादी करने की बात कभी सोची ही नहीं थी. आपने सुझाया तो अच्छा हुआ, उनका जवाब पता चल गया. अब अपने को समेटूँगा। फिलहाल, बड़ा हल्का महसूस कर रहा हूँ. आपका शुक्रिया।'

मुझे हैरानी हुई, लो, यह तो जैसे कोई समस्या ही नहीं थी, इतना चटपट इसका समाधान भी निकल आया. कई बार एक छोटी सी चिंगारी ही रोशनी दे जाती है. लेकिन यह भी मानना पड़ेगा दोस्तों कि लड़के भी पागलपन की हद तक प्यार करते हैं.

इन मैसेज के आदान-प्रदान के दो महीने बाद मैंने उन मित्र की फेसबुक प्रोफाइल खोली, यह देखने के लिए कि देखूँ, वह क्या लिख रहे हैं और उनसे पूछूँ कि उनकी समस्या का कोई हल निकला या नहीं, तो देखती गई, उनकी लिखी कोई पोस्ट नहीं थी, सब टैग्ड पोस्ट थीं. पिछले महीने में एक मित्र ने उन्हें टैग करके उनकी फोटो के साथ यह पोस्ट डाली थी कि ये अब हमारे बीच नहीं रहे. कमेंट्स में लोगों ने पूछा कि क्या हुआ था तो मित्र ने लिखा कि एक दिन पहले लोकल अखबार में उनकी मृत्यु की खबर छपी थी. अप्राकृतिक मृत्यु रही होगी, मैंने सोचा, तभी तो अखबार में खबर छपी. मैंने उस अखबार का एक माह पुराना अंक नेट पर सर्च किया तो उनकी फोटो के साथ उनकी आत्महत्या की खबर छपी देखी। वे अपने माता-पिता की एकलौती संतान थे.

उसने सच कहा था कि वह मर जाएगा और वह सचमुच मर गया. उसे बदनाम करना मेरा उद्देश्य नहीं, बस, सच्चे भावुक लोगों से मेरा यही कहना है कि प्रेम बेशक अंधा कहा गया है लेकिन सच्चे लोग आँख खोल कर ही प्रेम-पात्र का चुनाव करें। सबको अपने बारे में पता होता है कि कौन भावनाओं में जुड़ कर कितना टूट सकता है. अतः खुदगर्ज़ और निकृष्ट लोगों की पहचान करें, जिन्हें दूसरे की भावनाओं से खेलने में कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें अपने से दूर रखें। मृत्यु किसी समस्या का हल नहीं है. प्रेम के सिवा और भी ज़िम्मेदारियाँ हैं, जिनके लिए आपको ज़िंदा रहना है.

प्रेम में मर तो जाएँ पर पहले ऐसा साथी तो मिले जिसके लिए मरा जा सके.

Thursday, 14 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 1 ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया

आम आदमी की ख़ास कहानी : 1
ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया

(लेखकों की संस्मरण-श्रृंखला को मैंने नाम दिया है, 'लागा चुनरी में दाग़'. अब कुछ अ-लेखकों के संस्मरण पढ़िए। इस श्रृंखला को मैंने नाम दिया है, 'आम आदमी की ख़ास कहानी'. जब-जब जो मन में आएगा, उसकी कहानी आपके सामने पेश करूँगी, लेखक की भी और -लेखक की भी.)

आज सुनिए एक आम आदमी के 'सच' और सचाई की कथा. कई साल से एक बात मन में कुलबुला रही थी. समझ नहीं पा रही थी, उसे आप सब के साथ कैसे बाँटूँ? जब से मैंने कैदियों द्वारा जेल में रह कर लिखी गई पुस्तकों के बारे में कई पोस्ट यहाँ फेसबुक पर डाली, तब से मुझे कई फेसबुक मित्रों ने संपर्क किया, जो या जिनके परिचित मिलती-जुलती परिस्थितियों से गुज़र चुके हैं. एक फेसबुक मित्र की कहानी ने मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। यह कहानी उन्होंने मुझे शायद 2013 में पूर्व सुनाई थी. उसके बाद वे कहाँ गायब हो गए, नहीं जानती. उनकी कहानी कुछ यूँ है..... 

वे पत्नी और छोटे बेटे के साथ एक छोटे शहर में रहते थे. सरकारी नौकरी थी. कुछ झंझट नहीं था. ज़िन्दगी आराम की होनी चाहिए थी लेकिन ज़िंदगियों को भी तो चैन नहीं होता कि आराम से बीत जाएँ. पत्नी अकसर मायके जाया करती थी. पति के सामने यह रहस्य कई वर्ष बाद खुला कि मायके की तरफ के किसी पुरुष के साथ पत्नी के अवैध सम्बन्ध थे. उस समय उनका बेटा चार वर्ष का था. उनके पूछने पर पत्नी ने स्वीकार किया कि वह किसी अन्य पुरुष के साथ अधिक खुश है और उसी के साथ जीवन जीना चाहती है. यह जानने के बाद वे तीन-चार दिन आत्म-मंथन की स्थिति में रहे. उनके मन के भीतर घोर संघर्ष था. वे बहुत अपमानित और नीचे गिरा हुआ महसूस कर रहे थे. आखिर उनमें क्या कमी थी? वे पत्नी के प्रति ईमानदार थे, उससे प्रेम करते थे, उसका पूरा ख्याल रखते थे. अच्छी सरकारी नौकरी थी. पत्नी को ससुरालियों का भी कोई झंझट नहीं था. तो क्या सिर्फ शरीर-सुख के लिए..... वे जैसे-जैसे सोचते, उनका क्रोध बढ़ता जाता. वे बाहर से शांत नज़र आते लेकिन उनके भीतर ज्वालामुखी भभक रहा था. उन्हें महसूस होता, पत्नी शायद उन्हें मूर्ख समझ रही है, शायद सोच रही है कि उन्होंने उसके अवैध सम्बन्ध को स्वीकृति दे दी है. लेकिन वे भीतर ही भीतर दहक रहे थे. अजीब सी ग्लानि और हीनभाव से ग्रसित होते जा रहे थे. उन्हें अपना जीवन व्यर्थ लग रहा था. क्यों न वे मर जाएँ? उन्होंने सोचा था. पर कैसे मरें? वे तो जीते जी मर गए थे. पत्नी की दी हुई इस चोट को आखिर कितना सहें? पत्नी को पहले उनसे अलग होना चाहिए था, बाद में यह सब करती. उनकी छत्रछाया के नीचे रह कर उनसे धोखा क्यों किया?

तीन-चार दिन अकेले घुटते रहने के बाद एक शाम उनके सब्र का अंत हो गया. उस दिन ऑफिस से आकर वे फ्रेश हुए, उन्होंने चाय-नाश्ता किया, थोड़ी देर आराम किया और फिर खाना बनाती हुई पत्नी के पास रसोई में चले गए. उन्होंने पत्नी से सीधा सवाल किया, 'तो तुम उसके साथ रहना चाहती हो?' पत्नी शायद उनके मूड को नहीं समझी और सहज बोली, 'हाँ.' उन्होंने वहीँ रसोई में पत्नी को ज़मीन पर गिराया और उसकी चुन्नी उसके गले में तब तक कसते रहे, जब तक उसका छटपटाना बंद नहीं हो गया. यानि उन्होंने अपनी पत्नी की गला घोट कर हत्या कर दी. उनका चार वर्ष का बेटा वहीँ रसोई में अपनी आँखों के सामने यह काण्ड देखता रहा. पता नहीं, कितना क्या समझ पाया था?

उसके बाद वे पुत्र को अपने साथ कमरे में ले आए और सो गए. सुबह-सुबह उनके पुत्र ने उन्हें जगाया कि 'भूख लगी है.'  उन्होंने उसे खाने के लिए कुछ बिस्कुट दिए और बच्चे को गोद में उठाया, घर का ताला बंद किया और ट्रेन या शायद बस (ध्यान नहीं, क्या बताया था) से नज़दीक के किसी दूसरे शहर में रहने वाले अपने माँ-बाप के घर पहुँच गए. वहाँ उन्होंने कुछ नहीं बताया, बच्चे को माँ के पास छोड़ा, कहा, 'मुझे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है.' और बस लेकर किसी अन्य शहर चले गए. उस शहर में पंद्रह दिन रहने के बाद उन्होंने डरते-डरते अपनी माँ को फोन किया तो माँ ने बताया कि उनके चार साल के बेटे ने दादा-दादी को बता दिया था कि पापा ने माँ को मार दिया है. उनकी माँ ने उन्हें यह भी बताया कि उनके घर से तीन-चार दिन बाद बदबू आने के कारण पुलिस ने ताला तोड़ कर लाश बरामद की और उन्हें ढूँढते हुए उनके पिता के घर आई थी. उनके माँ-बाप ने उन्हें सुझाया कि जल्दी आकर पुलिस के आगे सरेंडर कर दें.

उन्होंने अगले दिन अपने शहर पहुँच कर सरेंडर कर दिया लेकिन पुलिस के आगे एवं कोर्ट में इस बात से इंकार किया की हत्या उन्होंने की है. उनके अनुसार, उनके वकील ने उन्हें समझाया था, 'जब तक केस डिसाइड नहीं हो जाता तुम मंदिर में भगवान के आगे भी कबूल नहीं करोगे कि हत्या तुमने की है.' वे छह महीने जेल में अंडरट्रायल रहे. उनके साथ यह चमत्कार हुआ कि पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट में डॉक्टर्स द्वारा इसे स्वाभाविक मौत बताया गया, जिसका, उन्हें खुद नहीं मालूम कि ऐसा कैसे हुआ? मैंने पूछा था, शायद उन्होंने डॉक्टर्स को रिश्वत खिलाई हो. लेकिन उन्होंने इंकार किया. उन्होंने कहा कि शुरू में जेल जाते समय उनके वकील के जेल में तीस हज़ार रुपये बतौर रिश्वत दिए थे, ताकि उनकी पिटाई न हो. जेल से बाहर आने के बाद छह वर्ष तक मुकदमा चला जिसमे वे निर्दोष करार दे कर बरी कर दिए गए. वे एक सरकारी नौकरी में थे, जिसमे जेल की छह माह की अवधि में सस्पेंड रहे और बाद में रीइंस्टेट कर लिए गए.

बाद में उन्होंने अखबारी विज्ञापन के ज़रिये अनेक अड़चनों के बाद दूसरा विवाह किया। उस दूसरी महिला के पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हुई थी. उन्होंने हर जगह सच बता कर ही अपने रिश्ते के लिए बात की. आज वे एक सुखी गृहस्थ हैं और एक और बेटे के पिता, जो आज पाँच वर्ष का है. उनकी इस दूसरी पत्नी के साथ उनका रिश्ता ठीक चल रहा है. आज उनका पहला पुत्र लगभग 20 वर्ष का होगा, शायद इंजीनियरिंग जैसा कुछ पढ़ रहा है (मैं भूल गई, क्या बताया था)

उनका कहना था, उन्होंने कोर्ट के सिवा कहीं झूठ नहीं बोला। मुझ अनजान तक के सम्मुख अपना सच कबूला। वे कोर्ट में गुनाह-मुक्त ठहराए गए, फिर से पत्नी और घर का सुख मिला, सरकारी नौकरी बरकरार रही. कुछ दिन तक वे कार्यालय में सहकर्मियों के स्नेह और विश्वास से वंचित रहे, लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक हो गया.

एक बार फिर मेरा मन हुआ कि मैं चमत्कारों पर विश्वास करूँ। यह बात दूसरी है कि इस कहानी के सच्चे नायक के सच बोलने की सराहना करने के बाजजूद मैं खुद ही नहीं समझ पाई कि उनके उस कृत्य की सराहना कैसे करूँ जिसके लिए उन्हें कोई मलाल नहीं था. मैंने सारी कथा सुनने के बाद उनसे पूछा था, 'एक बात सच-सच बताएँ, क्या आपके मन में कोई अपराधबोध या ग्लानि या पछतावा है?' उन्होंने कहा था, 'नहीं, कोई अपराधबोध नहीं, कोई पछतावा नहीं। जरा सा भी नहीं।'

उनकी हिन्दी लेखनी और कथन-शैली अत्यंत सुन्दर, सुगढ़ एवं समृद्ध है, कि मुझ जैसा हिन्दी वाला प्रभावित हुए बिना न रह सका. 'वे चाहें तो अपनी कहानियाँ खुद लिख सकते हैं,' मैंने उनसे कहा था. उनके अनुसार, 'दसवीं पास की थी, तब कई कवितायें और कुछ कहानियाँ लिखी थीं। फिर धीरे-धीरे कम होता गया। विवाह के बाद तो मेरे हाथ से किताबें छीन ली जातीं थीं, इस कारण पी एच डी भी पूरी नहीं कर सका।'

मैंने इस सम्बन्ध में फेसबुक पर या अन्यत्र लिखने के बारे में उनसे पूछा तो उनका कहना था, 'फेसबुक पर क्या प्रतिक्रिया रहती है, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लोग अपनी जगह बैठ कर सोचते हैं. जाहिर है, कुछ लोग इन्सानियत जताते हुए गुज़र जाने वाले के प्रति सहानुभूति जतायेंगे। मेंरी जगह आकर सोचने की ज़हमत नहीं उठायेंगे। मुझे उस दिन फर्क पड़ेगा जब कोई मेरे हालात से गुज़रा हुआ व्यक्ति यह कहेगा कि यह आपने गलत किया।'

उनकी ज़र्रानवाज़ी है कि उन्होंने मुझसे कहा, 'दीदी, आप संशय में न रहें। मुझे यकीन है आप पर और आप यकीन करें मुझ पर। आप बेफिक्र होकर पोस्ट या कहानी, कुछ भी लिखें। पूरी सृजनात्मक स्वतंत्रता लें। जरूरी बदलाव भी चाहें तो कर सकती हैं. अब कथानक आपका है। अब यह कहानी आपकी हुई, आप इसे जिस मर्ज़ी दृष्टिकोण से लिखें। पाठक इसके बारे में जो मर्ज़ी सोचें, मुझे फर्क नहीं पड़ता।'

मैंने उनसे कहा, 'अपनी इतनी निजी बातें किसी को बताते हुए आपको भय नहीं लगता?' उनका कहना था. 'दीदी, सबको कहाँ? मैं तो केवल सुपात्रों से ही इस बारे में बात करता हूँ। आप मुझे अनजान नहीं लगीं! कुछ है जो हमें जोड़ता है. पता नहीं क्या है। आज का दिन चमत्कारों के नाम।'

हाँ, यह भी एक चमत्कार ही था जो उन्होंने मुझे यह सब बताने योग्य समझा.

मैंने उनसे पूछा, 'आपने मुझ पर कैसे विश्वास किया कि आप मुझे अपने जीवन का इतना निजी पक्ष बता सकते हैं और मैं आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी? मैं पहली बार में ही आपको कैसे विश्वसनीय लगी?'

उनका कहना था, 'कुछ तो शब्दातीत भी होता ही है, दीदी. किसी का चेहरा, किसी की पोस्ट, किसी की आँखें..... कुछ है ऐसा जिसे शब्दों में बताना असंभव है. वह क्या कहते हैं..... इन्ट्यूशन जैसा कुछ. मुझे लगा, आपको बताया जा सकता है.'

मैं धन्य हुई भाई कि आपने मुझे इस योग्य समझा. आप जहाँ कहीं भी हों, सुख से रहें. खुश रहें.

Wednesday, 13 April 2016

लागा चुनरी में दाग़ : 15 राजेंद्र यादव

लागा चुनरी में दाग़ : 15

राजेंद्र यादव
यारों का यार, बड़ा दिलदार

राजेंद्र यादव जी के बारे क्या है ऐसा, जो लिखने से रह गया? क्या है ऐसा, जिसे कोई नहीं जानता? हरि अनत, हरि कथा अनंता। राजेंद्र यादव का जीवन व्यक्तिगत और साहित्यिक कथा-कहानियों से भरा पड़ा है. उनके बारे में लिखूँ तो क्या लिखूँ?

राजेंद्र यादव को भीड़ में रहने का बहुत शौक था. हर वक़्त उनके चारों तरफ भीड़ रहती थी, लेकिन मैं कभी उस भीड़ में शामिल नहीं हुई. मैं बल्कि यह सोचती थी, अभी भी यही सोचती हूँ कि जो व्यक्ति, खासतौर से लेखक हर समय लोगों से घिरा रहता है, वह चिन्तन-मनन-लेखन कब करता होगा? क्या वे खुद से भागते थे जो हर समय भीड़ में रहते थे? 

वे दिल्ली में उसी कॉलोनी में रहते थे, जहाँ मैं रहती थी. उन्होंने बहुत चाहा कि मैं भी उनकी भीड़ का हिस्सा बनूँ, इसलिए नहीं कि वे मुझे या मेरी लेखनी को पसंद करते थे, बल्कि शायद इसलिए कि उनके इर्द-गिर्द जो भी लोग थे, वे उन्हें कम लगते थे, उनके चौखटे में हर कोई फिट हो सकता था. लेकिन तब तक मैं अपने एकांतवास में प्रवेश कर चुकी थी और यह मेरे बस का नहीं था. मुझे लोगों से एक तरह से एलर्जी हो गई थी. पर मैं यह बात किसी को बता नहीं पाती थी और लिहाजवश मिलती भी रहती थी, जितना कम हो सके उतना कम.

एक बार उन्होंने मुझे ब्रेकफास्ट के लिए अपने घर बुलाया. अब इतना बड़ा लेखक बुलाए तो जाना तो था ही, लेकिन मुझे उनसे कोई बात ही नहीं करनी आती थी. उनके नौकर यानि सहायक, जो उनके परिवार की तरह ही था और हर समय उनके साथ रहता था, उसने कुछ बनाया, मैंने खाया और मैं वापस अपने घर.

यूँ मैं भी उन्हें निमंत्रित कर चुकी थी. मनु के जन्म की ख़ुशी में मैंने डिफ़ेन्स क्लब, धौला कुआँ में कॉकटेल डिनर रखा था. सगे सम्बन्धी आमंत्रित थे और कतिपय लेखक मित्र. राजेंद्र यादव भी आमंत्रित थे. वे आए थे किसी लेखिका के साथ. बोले, 'मणिका, तुम इन्हें बुलाना चाहती थी ना? इसलिए मैं इन्हें साथ ले आया.' मैंने कहा, 'हाँ, अच्छा किया, आप इन्हें ले आए.'

मैंने एक बार और उन्हें खाने पर बुलाया था. उन्होंने कहा था, 'मेरे ही मोहल्ले में रह रही हो और मुझे कभी तुमने घर नहीं बुलाया.' तो मैंने उन्हें लंच पर इन्वाइट किया था. अब राजेन्द्र यादव जी तो ठहरे शहंशाह. वे अपने लाव-लश्कर के साथ हर जगह जाते थे. मेरे घर आए तो उनके साथ छह-सात लोग थे, एकाध को मैं व्यक्तिगत रूप से पहले मिल चुकी थी, एकाध का नाम भर सुना था, कई एकदम अपरिचित थे. अब यादव जी तो यादव जी.

उन्हें स्त्री-पुरुष संबंधों में बहुत रुचि थी, पर शायद टूटे हुए सम्बन्धों में. उन्हें शायद यह लगता था कि जो लड़कियाँ अकेली रहती हैं, वे निश्चित रूप से अनेक प्रेम सम्बन्धों के बीच से गुज़रती होंगी. बहुत साल पहले प्रेस क्लब में न जाने कौन सी गोष्ठी थी, वहाँ मिले तो कहने लगे, 'मणिका, तुम अपनी आत्मकथा लिखो. मैं जानता हूँ कि तुम्हारी आत्मकथा बहुत रोचक होगी.' इसके बाद भी बहुत बार यह बात कही. एक बार बोले, 'यार, तुमने जीवन में इतने लड़कों से दोस्तियाँ की होंगी. सबके बारे में खुल कर लिखो.' मैंने इसके जवाब में एक बार कह दिया था, 'जी, मैं कौन सी इतनी महान हो गई हूँ कि अपनी आत्मकथा लिखूँ?' मेरे मन में कहीं कचोटता था कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के बनने और टूटने के दर्द के अलावा भी दर्द होते हैं जो वे नहीं समझ सकते थे. समझते तो कभी तो मेरे बच्चे के बारे में भी मुझसे पूछा होता. खैर.

अगस्त, 1986 में उन्होंने 'हंस' पत्रिका का शुभारम्भ किया. उसी माह मैंने भी अपनी पत्रिका 'वैचारिकी संकलन' की शुरुआत की थी, मुंबई में. 1996 में वै. सं. के दस वर्ष पूरे होने पर मैंने दिल्ली के गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में एक आयोजन किया, जिसमें मंच राजेंद्र यादव जी ने ही सम्भाला था.

सच बोलने में कोई बुराई नहीं कि मैं उनकी जीवन शैली को कभी पसंद नहीं कर पाई, हालाँकि उनके लेखन से मेरी पहचान मेरे बचपन में ही हो गई थी, जिससे मैं अत्यन्त प्रभावित भी थी. मन्नू जी मुझे हमेशा महान लगती रहीं. राजेंद्र यादव लेखक ज़रूर महान हैं, इसमें दो राय नहीं. 

28 अक्टूबर, 2013 को 84 वर्ष की आयु में ह्रदय गति रुक जाने से उनका निधन हो गया. जो आदमी किताबों में जीवित रहता है, वह लोगों के दिलों में भी जीवित रहता है, वह कभी नहीं मरता.


Tuesday, 12 April 2016

मिश्रित हिन्दी

मिश्रित हिन्दी
हमारे देश में बोली जाने वाली अन्य भाषाओँ के प्रभाव हिन्दी भाषा पर पड़े, इसलिए हिन्दी में उच्चारण और व्याकरण की विभिन्नता दृष्टिगत होती है. यह सच है कि उर्दू भाषा जैसी नफासत और तहज़ीब हिन्दी में नहीं है. यदि हिन्दी भाषी अपने बोलने में उर्दू भाषा का पुट ले आए तो हिन्दी अधिक सभ्य लगेगी। जहाँ उर्दू के मिश्रण से हिन्दी समृद्ध हुई, वहीँ हिन्दी में पंजाबी भाषा के प्रभाव से गड़बड़ हुई है, कि 'आप आइए, आप जाइए' हो गया 'आप आओ, आप जाओ'. 'आप' के साथ 'तुम' में लगने वाली क्रिया का प्रयोग 'आप' की गरिमा को घटा देता है. ऐसे ही दक्षिण तथा पश्चिम भारत की भाषाओं के प्रभाव से हिन्दी भाषा का लिंग गड़बड़ा जाता है, जिसके कारण ज़्यादातर पुल्लिंग शब्द स्त्रीलिंग हो जाते हैं। अंग्रेजी भाषा के शब्द ज़रूर हिन्दी में समाहित हुए हैं लेकिन अंग्रेजी के कारण हिन्दी के व्याकरण पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा है. हिन्दी मूलतः उत्तर प्रदेश से उपजी और खड़ी बोली के नाम से जानी गई, इसी कारण इस खड़ी बोली में खरापन और स्पष्टता है. अब यदि अपने ही देश की अन्य भाषाओँ के कारण हिन्दी में उच्चारण और लिंग सम्बन्धी विकार पैदा हो गए हैं तो उसके लिए कुछ किया नहीं जा सकता, सिवाय इसे विवशता मान कर स्वीकारने के.

यह सही है कि उर्दू हमारे लिए पढ़ने और लिखने की भाषा नहीं है लेकिन बोलने में उर्दू मिश्रित हिन्दी होती है यानि जिसे हिन्दुस्तानी भाषा कह सकते हैं। भारत के आज़ाद होने से पूर्व लोग उर्दू ही लिखते-पढ़ते थे. पहले के कुछ लोग आज भी देखे जा सकते हैं जो उर्दू लिपि ही जानते थे, हिन्दी देवनागरी लिपि नहीं। उस समय उर्दू और अंग्रेजी, यही दो भाषाएँ चलती थीं। मैंने बचपन में घर के बुजुर्गों को इन्हीं दो भाषाओँ में काम करते देखा-सुना था जो आज़ादी मिलने के बाद भी तुरन्त हिन्दी से परिचित नहीं हुए। उचित भी था, अंग्रेज़-शासित देश तथा उससे पहले मुग़ल साम्राज्य के होते यह स्वाभाविक भी था। इसीलिए इस देश का नाम भी हिन्दुस्तान और इंडिया (India) था, भारत नाम बाद में आया। देश की आज़ादी के बाद देश की कोई एक भाषा तो होनी ही थी, जिसे अपनी भाषा कहा जा सके, तो वह हिन्दी हुई, जो आज़ादी के बाद प्रचलन में आई और उर्दू ने दूसरी भाषा का दर्जा हासिल किया। देश के दो हिस्से होने के बाद पाकिस्तान बने दूसरे हिस्से की भाषा उर्दू है. मुझे मालूम नहीं कि वहाँ हिन्दी भाषा को, देवनागरी लिपि को कोई दर्जा दिया गया है या नहीं। लेकिन हमारे देश भारत में चाहे हम उर्दू लिपि को पढ़ना-लिखना नहीं जानते, चाहे हिन्दी भाषा मुख्य धारा में है, फिर भी उर्दू का सम्मान है. हमारी भाषा हिन्दी आज भी उर्दू के अनेक शब्दों से मिश्रित भाषा है. लेकिन हम पूर्ण रूप से अपनी भाषा के प्रति ही समर्पित हो सकते हैं.

भाषा का सरलीकरण

भाषा का सरलीकरण
आजकल भाषा का सरलीकरण हो रहा है. यूँ यह सच है कि समय के साथ-साथ भाषा बदलती रहती है. इस बदलाव का कारण भाषा की शब्द-सम्पदा में वृद्धि तो है ही, इसके व्याकरण में भी परिवर्तन के लक्षण मिलते हैं. उदाहरण के तौर पर निम्नलिखित प्रयोग देखें.....

1. आजकल आप देखेंगे कि अँ और अं में कोई फर्क नहीं किया जाता जबकि दोनों की शब्द-ध्वनि में तो अंतर है ही, अर्थ में भी अंतर है. अँ में अनुस्वार की ध्वनि है, जबकि अं में हृस्व न की. 'वह हँस ( इसका अर्थ Laugh) रहा है' को 'वह हंस ( इसका अर्थ Swan) रहा है' लिखा जा रहा है, जैसे हँसी (Laughter) तो ख़त्म हो गई, सब हंस (Swan) होते जा रहे हैं. अँ का प्रयोग एकदम ख़त्म हो रहा है. जाएँगे को जाएंगे, जाऊँ को जाऊं, साँस को सांस. मैं इस गलत प्रयोग के प्रति सचेत हूँ इसलिए लगभग हमेशा इस मामले में गलती नहीं करती।

2. 'वह' का प्रयोग लगभग ख़त्म हो रहा है, 99% लोग इसे 'वो' लिखते हैं. 'वह' का बहुवचन 'वे' होता है, लेकिन उसे भी 'वो' लिखा जाता है. 'वो' उर्दू शब्द है, और एकवचन है. क्या सही न होगा कि हम 'वह' एवं 'वे' के लिए इसी शब्द का प्रयोग करें? अंग्रेजी में That की जगह Those तो नहीं कहेंगे ना?

3. 'यह' का प्रयोग भी समाप्तप्राय है इसके स्थान पर 'ये' का प्रयोग होता जबकि 'यह' एकवचन है और 'ये' बहुवचन। क्या आप अंग्रेजी में This की जगह These का प्रयोग करते हैं? नहीं ना? तो अपनी भाषा के साथ यह अन्याय क्यों?