Sunday, 3 April 2016

लागा चुनरी में दाग़ : 1 मुखौटों की संस्कृति

लागा चुनरी में दाग़ : 1

मुखौटों की संस्कृति
झूठ का बोलबाला

कई बार सोचती हूँ, लेखकों का व्यक्तिगत जीवन साफ़-सुथरा क्यों नहीं होता? मान लिया, व्यक्तिगत जीवन में हुए संयोग-दुर्योग उनकी जीवन शैली में असंतुलन ला देते हैं लेकिन विचारों में तो आदर्श हो, चरित्र में तो उच्चता हो. मैं भी लेखक हूँ, मेरा जीवन भी काफ़ी ऊबड़-खाबड़ रहा है, मैं भी 'लागा चुनरी में दाग़, छुपाऊँ कैसे' वाले दौर से गुज़री हूँ, लेकिन मैंने अपने विचारों को हमेशा शुद्ध रखा है, अपने चरित्र को हमेशा सम्भाले रखा है, जो भी चारित्रिक दोष होते हैं, जैसे स्वार्थ, झूठ, छल-फरेब, धोखा, निकृष्टता आदि आदि, ये सब मैंने कभी किसी के साथ नहीं किया. खैर, अपने मुँह मियाँ मिट्ठू क्या बनना? मेरा आकलन दूसरे करेंगे जैसे कि इस समय मैं किसी का आकलन करने जा रही हूँ.
एक कवि थे. एक दूसरे के व्यक्तिगत जीवन की बातें जान लेना यदि मित्रता की निशानी है या निकटता का परिचायक है, तो हम मित्र थे और निकट भी. बात बहुत पुरानी है. उस समय इनका अपनी पत्नी से अलगाव का बेमज़ा युद्ध चल रहा था. उस समय इनका एक छोटा सा बेटा था, वह पत्नी के पास था. पता नहीं, कानूनी तलाक हुआ था या नहीं, पर पत्नी बेटे को साथ लेकर इनसे अलग हो कर अपने नेटिव प्लेस चली गई थी. शायद किसी कॉलेज में लेक्चरर थी. इसके बाद सालों मुझे इनकी कोई ख़ास खबर नहीं मिली, सिवाय कुछ छुटपुट आमने-सामने पड़ने के.
उस समय मैं भीड़ में शामिल होने की काफ़ी अभ्यस्त थी. साहित्यिक मित्रों के साथ मिलना, गोष्ठियों में जाना, घर में गोष्ठियाँ करना, पार्टियाँ करना यानि हर घड़ी सबके साथ कन्धे से कन्धा मिला कर सक्रिय रहना, जैसे साहित्य मेरे बिना नहीं चलेगा और मैं साहित्य के बिना. उन दिनों वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद अपनी पत्नी चम्पा वैद, जो स्वयं कवियित्री थीं, के साथ मेरे घर के खाने-पीने में शरीक होने वाले नियमित सदस्य थे. (आजकल नहीं मालूम, वे कहाँ हैं?) वे हम लोगों से बहुत वरिष्ठ थे पर मित्र तो मित्र होते हैं. मैंने उनके सारे उपन्यास पढ़े थे. उनके प्रथम उपन्यास 'उसका बचपन' का मैंने इसी नाम से नाट्य रूपान्तर किया था, जिसका एक संवाद 'भैड़े-भैड़े यार भैड़ी फत्तो के' मुझे विचित्र रूप से पसंद था, आज भी है, और मैं आज भी उसका प्रयोग जब-तब कर दिया करती हूँ. किस्सा यह कि वे पत्नी सहित मेरे घर में हुए सम्मेलनों' में नियमित रूप से सम्मिलित होते थे. मैं उस समय पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार में रहती थी और वे दिल्ली के दूसरे कोने में यानि दक्षिणी दिल्ली के वसंत कुञ्ज में. ये बातें निश्चित रूप से 1992 के बाद की हैं, क्योंकि उसके बाद ही मैं लगभग 10 साल मुंबई और गयाना (South America में एक Caribbean देश) में गुज़ारने के बाद अपने देश लौटी थी. खैर. एक बार वैद साहब ने कहा, 'मणिका, हम बहुत बार तुम्हारे घर आए हैं. अब तुम्हारी बारी है. अब तुम हमारे घर आओ.' हालाँकि उनके निमंत्रण पर कई बार मुझे उन पति-पत्नी के साथ 'त्रिवेणी' में लंच करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. उन्होंने अपने घर वसंत कुञ्ज में डिनर का आयोजन किया और कुछ अन्य लेखकों को भी आमंत्रित किया. मैंने इतनी दूर रात को अकेले आने में असमर्थता दिखाई तो वे बोले, 'बॉबी के साथ आ जाओ.' तो मैं बेटे के साथ उनके वसंत कुञ्ज निवास पर पहली बार गई.
अब लौटते हैं उसी किरदार की तरफ़, जिसकी चर्चा से मैंने इस लेख की शुरुआत की और जिसके व्याज से यह लिख रही हूँ. तो साहब, मैं जब वहाँ पहुँची, तो पहले से ही कुछ लोग उपस्थित थे, जिनमें वे कवि महोदय भी थे. वे मुझे उतने तपाक से नहीं मिले, जितने तपाक से मैंने उनका अभिवादन किया, 'यार, बड़े दिनों के बाद दिखाई दिए हो. अब ज़िन्दगी कैसी चल रही है? बेटा कैसा है? काफ़ी बड़ा हो गया होगा.' उनका हल्का सा इशारा-जैसा-कुछ मैं समझती, कि वैद जी पूछ बैठे., 'इसका बेटा? क्या इसका कोई बेटा भी है?' मैंने तुरंत सम्भाला, 'सॉरी, मैंने इन्हें कोई और समझा.' बात आई-गई हुई और शान्तिपूर्वक पार्टी चली, पर मैंने मन ही मन खुद को कोसा, 'मणिका, तुम भी निहायत मूर्ख हो. किसी से इतने साल बाद मिल रही हो, क्या उसका जीवन वहीँ ठहरा हुआ होगा, जहाँ तक बहता हुआ तुमने देखा था?'
भोजन करते समय प्लेट पकडे हुए कवि मेरे पास आए, बोले, 'मणिका, मैंने उसे छोड़ने के बाद अभी 4-5 साल पहले दूसरी शादी कर ली है, मेरी वाइफ, देखो, वह बैठी है, मेरे साथ यहाँ आई है. उसे मेरे बेटे के बारे में कुछ नहीं पता. मैं डर रहा था, कहीं तुम कुछ और न बोल दो. यह बहुत पोजेसिव है, मेरा जीना हराम कर देगी.'
'तुमसे उम्र में काफी छोटी लग रही है?' मैंने कहा, या पूछा.
'हाँ, पंद्रह साल छोटी है. इसका नाम ...... है. यह भी कॉलेज में पढ़ाती है.' साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उनकी यह पत्नी झगड़ालू किस्म की थी, उन पर बहुत शक करती थी, वे इससे बहुत दब कर रहते थे.
"मिलवाओगे नहीं?'
'अभी नहीं, फिर कभी.'
मेरे खयाल से, वह कवि मित्र अपनी नई बीवी, जो उस समय तक इतनी नई भी नहीं रही थी, को पुराने जानकारों से मिलवाने में परहेज़ करते थे. शायद उन्होंने अपने जीवन के और भी राज़ उससे छुपाए हों, जिनके खुल जाने का उन्हें डर हो.
इस घटना के बाद मैं फिर कभी उनसे नहीं मिली. फेसबुक पर उनका नाम टहलता हुआ देखा तो उन्हें मित्रता निवेदन भेजा लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया. अभी पिछले वर्ष इनका देहांत हो गया.इनकी नई पत्नी का नाम मैं भूल चुकी थी. मैंने इनकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो पाया कि इनकी नई पत्नी मेरी फेसबुक मित्र थी, जो शायद ही कभी मेरी पोस्ट पर आई हो (जिसे मैंने अब unfriend कर दिया है.)
इनकी timeline पर इनके प्रशंसकों की त्राहि त्राहि मची थी, लेखक अच्छा था, चाहे उसने जीवन छल-फरेब का जिया हो. यह भी हो सकता है कि मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी नई पत्नी को सचाई बता दी हो. अपनी आत्मा की शुद्धि हर कोई करना चाहता है. पापों का बोझ लेकर कोई नहीं मरना चाहता. पर मेरे लिए यह घोर आश्चर्य का विषय रहा कि बन्दे ने इतनी बड़ी सचाई इस नई पत्नी से छुपाए कैसे रखी?
मैं कई बार यह सोच कर हैरान होती हूँ कि लेखक अपने जीवन के ज़रिये समाज में कोई आदर्श क्यों नहीं प्रस्तुत करते? यौवन भर ये ज़िन्दगी के मज़े लेते हैं, कभी इससे छल, कभी उससे छल, कभी इससे प्यार, कभी उससे प्यार. इनकी पिपासा ख़त्म नहीं होती. अपनी सगी बीवी को बच्चों समेत छोड़ देते हैं. पहले के लेखकों की न छोड़ी जाने वाली बीवियाँ उनकी ज़्यादतियाँ सहन करती रहती थीं. अपने हाथों उनकी प्रेमिकाओं की सेज सजाती थीं. उनसे पिटती थीं (ताकि वे किसी महान लेखक के लेखन में अपने योगदान की सराहना सुन सकें?) बूढ़े होने तक ये साहित्य के नाम पर अनुभवों में जुटे रहते हैं. अंत में बूढ़ा अशक्त तो सभी को होना है. इनके ऐसी हालत में पहुँचने पर मैंने इनकी तथाकथित सती-सावित्री बीवियों को इन्हें टॉर्चर करते देखा है कि मर साले, तू इसी लायक है.
ये लेखक अपने छोड़े हुए बच्चों के लिए कुछ खर्चा-पानी नहीं देते. इनके छोड़े हुए बेटे समझदार उम्र पर पहुँचने पर इनसे घृणा करते हैं, इनके जीते जी इनकी शक्ल देखना नहीं चाहते. इनकी मृत्यु पर इन्हें आग तक नहीं देने आते. आते भी हैं तो बहुत मनाए जाने के बाद. उसके बाद भी शमशान घाट पर तमाशे होते पाए गए हैं क्योंकि तभी कोई अन्य बीवी नमूदार हो जाती है जो अपने बेटे को अग्नि देने का अधिकार दिलाना चाहती है.
निवेदन है कि सारे लेखक इन सचाइयों को अपने ऊपर न लें. अनेक कीचड में कमल भी होंगे. बहुत से नए लेखक अच्छें चरित्रवान पैदा हो रहे हैं. पर वे ऐसे दुश्चरित्र लेखकों की महानता के गुण गाना छोड़ें, उनके चरण दबाना छोड़े और अपनी राह खुद बनाएँ।
छी छी. तो ये हैं लेखक? लेखकों को इतना घृणित, अप्रशंसनीय, अ-अनुकरणीय जीवन जीते देख कर मुझे आम आदमी इनके मुकाबले बहुत बेहतर लगा. एक आम आदमी की कहानी कल सुनाऊँगी।

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