Monday, 11 April 2016

लागा चुनरी में दाग़ : 13 स्वदेश दीपक

लागा चुनरी में दाग़ : 13

स्वदेश दीपक
अन्याय देवशिशु के साथ

सन 1986 में या उसके बाद अम्बाला के लेखक स्वदेश दीपक ने पत्रिका 'गंगा' और 'कहानियाँ' में एक अपील छपवाई थी कि उनकी कहानी 'बाल भगवान' चुरा कर उस पर फिल्म निर्देशक उत्पलेन्दु चक्रवर्ती ने 'देवशिशु' नाम से फिल्म बनाई है. हक की लड़ाई लड़ने के लिए लेखक ने अदालत का दरवाज़ा भी खटकाया था तथा लेखकों / पाठकों से आर्थिक सहायता करने की भी अपील की थी.

किसी लेखक या अन्य व्यक्ति के साथ अन्याय होने पर नैतिक सम्बल की बात तो समझ में आती है, लेकिन किसी संपन्न लेखक द्वारा इस तरह अपीलें छपवा कर आर्थिक मदद माँगना मुझे भीख मॉँगने से कम नहीं लगता। क्या ये लोगों को भावात्मक रूप से बरगलाना नहीं है? इन्होने अपील में ऐसा कोई वायदा नहीं किया कि केस जीतने पर इन्हें जो धन-लाभ होगा, ये उसे ज़रूरतमंद लोगों में बाँट देंगे. भीख माँगने के ये नायाब तरीके निन्दनीय और बहिष्कार योग्य हैं.

वैसे ये लेखक एक नाटक 'कोर्ट मार्शल' लिख कर अत्यन्त मशहूर हो चुके थे, जिसके, सुना था, 2000 शो हुए हैं, इनकी कहानियों की प्रशंसा निर्मल वर्मा कर चुके थे. इन्होने उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक, संस्मरण, सब मिला कर 17 पुस्तकें लिखी हैं. इसलिए इनकी अरदास पर संवेदनात्मक रवैया होना स्वाभाविक था. यह तो कोई पंजाब या हरियाणा का चहेता ही उठ कर पूछ सकता है कि बिरादर, पंजाब और हरियाणा के पारिवारिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की छवि खराब करने में क्यों लगे हुए हो? वाह, वाह, पाठकों के कथोपकथन का क्या अंदाज़ है? यह लेखक जिस जाति, जिस प्रदेश के पात्र प्रस्तुत करते हैं, उस तबके के लाड-प्यार की शैली का बयान ऐसे करते हैं, अपनेपन के लट्ठमार तरीकों का खुलासा ऐसे करते हैं, उनका अंदाज़े बयाँ ऐसा कि सौफिस्टिकेटेड पाठक को उस पूरे प्रदेश से ही एलर्जी हो जाए. चाहे कोई कहे कि यथार्थ का चित्रण करते हैं, पर मुझ जैसे पाठक को एलर्जी हुई. खैर, बात यहाँ 'बाल भगवान' की है.

किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर कसके उसकी सचाई को परखना चाहिए. तब मुझे यह ज़रूरी लगा था कि सबसे पहले फिल्म 'देवशिशु' देखी जाए. प्रामाणिकता को जाँचने के लिए 'बाल भगवान' और 'देवशिशु' से रूबरू होना ज़रूरी था. मैंने उस समय वीडिओ पर फिल्म 'देवशिशु' देखी. नैतिक सम्बल की बात मैंने कही थी लेकिन फिल्म देखने के बाद नैतिक सम्बल की बात भी ख़त्म हो गई.

'बाल भगवान' कहानी में मेंटली रिटार्डेड (असामान्य बुद्धि का) बच्चा है. माता-पिता एक अन्य व्यक्ति के सुझाने पर बालक को भगवान दर्शाने का पूरा प्रपंच रचते हैं और उसके ज़रिये जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके पैसा कमाते हैं. दीपक की कहानी में लालची माता-पिता का चरित्र उभरता है. इसी लालच के कारण कुछ साल बाद बच्चे की मृत्यु भी हो जाती है.

'देवशिशु' की कहानी एकदम अलग है. इस फिल्म में एक तीन मुँह वाला बच्चा है, जिसके पैदा होने पर माता-पिता डर जाते हैं, उन्हें बताया जाता है कि बच्चा अशुभ है तथा त्याग देना चाहिए. वे बच्चे को एक जादूगर को सौंप देते हैं, जो बच्चे को भगवान बता कर पैसा कमाता है. इस कहानी में माता-पिता लालची या निर्दयी नहीं, बल्कि भयभीत और अज्ञानी हैं. कई सालों के बाद बच्चे का पिता उस जादूगर को एक तमाशे में देखता है और अपने बच्चे को पहचान लेता है. वह अपना बच्चा माँगता है लेकिन जादूगर उसे मार कर भगा देता है. कहानी एक भावुक मोड़ पर ख़त्म होती है जब निर्धन पिता घर आ कर बच्चे की माँ के साथ ज़बरदस्ती सम्भोग करना चाहता है (करता नहीं) और कहता है कि उसे एक और ऐसा ही बच्चा चाहिए, जो उनके लिए कमाई का साधन बन सके, क्योंकि इस दुनिया में सही तरीके से पैसा नहीं कमाया जा सकता, राक्षस ही भगवान कहला कर पैसा कमा सकता है. फिल्म का पिता एक असहाय, विक्षिप्त-समान दीखता है, माँ भी अपने बच्चे के बारे में जान कर बदहवास हो जाती है, जबकि कहानी में पिता का चरित्र एक दुराचारी, लम्पट व्यक्ति का है. फिल्म में माता-पिता हालात के मारे हुए हैं पर निर्दयी व क्रूर नहीं, जबकि कहानी में माता-पिता का स्वार्थ, क्रूरता, निर्दयीपन ही प्रमुख है. फिल्म में दर्शक की हमदर्दी देवशिशु के माता-पिता के साथ होती है, जबकि कहानी में हमदर्दी का पात्र अविकसित बुद्धि का बालक होता है.

यहाँ तक इस बात को और अधिक विस्तार से मैंने तब अपनी पत्रिका 'वैचारिकी संकलन' में छापा था, जो मेरी पुस्तक 'प्रसंगवश' में भी संकलित है, जिसमें उत्पलेन्दु चक्रवर्ती की कहानी 'देवशिशु' के कहानी के रूप में पत्रिका, पुस्तक में छपने, फिल्म बनने की तारीखों के साथ दोनों कहानियों के विस्तृत विवरण हैं. यहाँ इतने विस्तार से देना मुझे मुश्किल लग रहा है. बहरहाल, बात तो समझ में आ ही गई है.

यह लड़ाई कई वर्ष चली. उत्पलेन्दु ने फिल्म के शुरू में यह पंक्ति जोड़ी..... Acknowledgement to Swadesh Deepak, Ambala. पैसे का ज़िक्र कौन करता है कि मिला या नहीं? मिला तो कितना मिला?

इसके बाद मुझे पता चला कि स्वदेश दीपक कई वर्ष मानसिक रोग से ग्रस्त रहे, उनके द्वारा कई बार आत्महत्या की कोशिशें की गईं, जिसके बाद उन्हें Bipolar disorder बीमारी का शिकार पाया गया. इस बीमारी के बारे में मैंने गूगल पर सर्च किया तो लिखा पाया, Bipolar disorder, also known as manic-depressive illness, is a brain disorder that causes unusual shifts in mood, energy, activity levels, and the ability to carry out day-to-day tasks. वे लम्बे अर्से तक दवाइयों पर रहे. उसी हालत में उन्होंने अपने उन दुर्भागयपूर्ण वर्षों की दास्तान लिखी जो 'कथादेश' पत्रिका में छपी थी तथा जो इनके संस्मरण के रूप में बाद में 'मैंने मांडू नहीं देखा' शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुई. 2 जून, 2006 को सामान्य दिनचर्या के लिए वे सुबह की सैर को घर से निकले थे, लेकिन वापस घर नहीं लौटे. स्वदेश दीपक 2006 से लापता हैं. लाख ढूँढने पर भी उनकी कहीं कोई खोज-खबर नहीं मिली. उनका जन्मवर्ष एक जगह 1939 लिखा है, एक अन्य जगह 1942.

अपने नाटक 'कोर्ट मार्शल' के कारण वे नाटक प्रेमियों में ज़्यादा लोकप्रिय थे. उनके कोई प्रशंसक / प्रेमी पाठक-दर्शक उनके नाम से उनका फेसबुक और पेज अभी भी चलाते हैं.

आज सोचती हूँ, अपनी कहानी 'बाल भगवान' के मानसिक रूप से असामान्य बुद्धि का (Mentally Retarted मेंटली रिटार्टेड ) बालक के रूप में कहीं उन्होंने खुद की ही तो कल्पना नहीं की थी?


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