Wednesday, 13 April 2016

लागा चुनरी में दाग़ : 15 राजेंद्र यादव

लागा चुनरी में दाग़ : 15

राजेंद्र यादव
यारों का यार, बड़ा दिलदार

राजेंद्र यादव जी के बारे क्या है ऐसा, जो लिखने से रह गया? क्या है ऐसा, जिसे कोई नहीं जानता? हरि अनत, हरि कथा अनंता। राजेंद्र यादव का जीवन व्यक्तिगत और साहित्यिक कथा-कहानियों से भरा पड़ा है. उनके बारे में लिखूँ तो क्या लिखूँ?

राजेंद्र यादव को भीड़ में रहने का बहुत शौक था. हर वक़्त उनके चारों तरफ भीड़ रहती थी, लेकिन मैं कभी उस भीड़ में शामिल नहीं हुई. मैं बल्कि यह सोचती थी, अभी भी यही सोचती हूँ कि जो व्यक्ति, खासतौर से लेखक हर समय लोगों से घिरा रहता है, वह चिन्तन-मनन-लेखन कब करता होगा? क्या वे खुद से भागते थे जो हर समय भीड़ में रहते थे? 

वे दिल्ली में उसी कॉलोनी में रहते थे, जहाँ मैं रहती थी. उन्होंने बहुत चाहा कि मैं भी उनकी भीड़ का हिस्सा बनूँ, इसलिए नहीं कि वे मुझे या मेरी लेखनी को पसंद करते थे, बल्कि शायद इसलिए कि उनके इर्द-गिर्द जो भी लोग थे, वे उन्हें कम लगते थे, उनके चौखटे में हर कोई फिट हो सकता था. लेकिन तब तक मैं अपने एकांतवास में प्रवेश कर चुकी थी और यह मेरे बस का नहीं था. मुझे लोगों से एक तरह से एलर्जी हो गई थी. पर मैं यह बात किसी को बता नहीं पाती थी और लिहाजवश मिलती भी रहती थी, जितना कम हो सके उतना कम.

एक बार उन्होंने मुझे ब्रेकफास्ट के लिए अपने घर बुलाया. अब इतना बड़ा लेखक बुलाए तो जाना तो था ही, लेकिन मुझे उनसे कोई बात ही नहीं करनी आती थी. उनके नौकर यानि सहायक, जो उनके परिवार की तरह ही था और हर समय उनके साथ रहता था, उसने कुछ बनाया, मैंने खाया और मैं वापस अपने घर.

यूँ मैं भी उन्हें निमंत्रित कर चुकी थी. मनु के जन्म की ख़ुशी में मैंने डिफ़ेन्स क्लब, धौला कुआँ में कॉकटेल डिनर रखा था. सगे सम्बन्धी आमंत्रित थे और कतिपय लेखक मित्र. राजेंद्र यादव भी आमंत्रित थे. वे आए थे किसी लेखिका के साथ. बोले, 'मणिका, तुम इन्हें बुलाना चाहती थी ना? इसलिए मैं इन्हें साथ ले आया.' मैंने कहा, 'हाँ, अच्छा किया, आप इन्हें ले आए.'

मैंने एक बार और उन्हें खाने पर बुलाया था. उन्होंने कहा था, 'मेरे ही मोहल्ले में रह रही हो और मुझे कभी तुमने घर नहीं बुलाया.' तो मैंने उन्हें लंच पर इन्वाइट किया था. अब राजेन्द्र यादव जी तो ठहरे शहंशाह. वे अपने लाव-लश्कर के साथ हर जगह जाते थे. मेरे घर आए तो उनके साथ छह-सात लोग थे, एकाध को मैं व्यक्तिगत रूप से पहले मिल चुकी थी, एकाध का नाम भर सुना था, कई एकदम अपरिचित थे. अब यादव जी तो यादव जी.

उन्हें स्त्री-पुरुष संबंधों में बहुत रुचि थी, पर शायद टूटे हुए सम्बन्धों में. उन्हें शायद यह लगता था कि जो लड़कियाँ अकेली रहती हैं, वे निश्चित रूप से अनेक प्रेम सम्बन्धों के बीच से गुज़रती होंगी. बहुत साल पहले प्रेस क्लब में न जाने कौन सी गोष्ठी थी, वहाँ मिले तो कहने लगे, 'मणिका, तुम अपनी आत्मकथा लिखो. मैं जानता हूँ कि तुम्हारी आत्मकथा बहुत रोचक होगी.' इसके बाद भी बहुत बार यह बात कही. एक बार बोले, 'यार, तुमने जीवन में इतने लड़कों से दोस्तियाँ की होंगी. सबके बारे में खुल कर लिखो.' मैंने इसके जवाब में एक बार कह दिया था, 'जी, मैं कौन सी इतनी महान हो गई हूँ कि अपनी आत्मकथा लिखूँ?' मेरे मन में कहीं कचोटता था कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के बनने और टूटने के दर्द के अलावा भी दर्द होते हैं जो वे नहीं समझ सकते थे. समझते तो कभी तो मेरे बच्चे के बारे में भी मुझसे पूछा होता. खैर.

अगस्त, 1986 में उन्होंने 'हंस' पत्रिका का शुभारम्भ किया. उसी माह मैंने भी अपनी पत्रिका 'वैचारिकी संकलन' की शुरुआत की थी, मुंबई में. 1996 में वै. सं. के दस वर्ष पूरे होने पर मैंने दिल्ली के गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में एक आयोजन किया, जिसमें मंच राजेंद्र यादव जी ने ही सम्भाला था.

सच बोलने में कोई बुराई नहीं कि मैं उनकी जीवन शैली को कभी पसंद नहीं कर पाई, हालाँकि उनके लेखन से मेरी पहचान मेरे बचपन में ही हो गई थी, जिससे मैं अत्यन्त प्रभावित भी थी. मन्नू जी मुझे हमेशा महान लगती रहीं. राजेंद्र यादव लेखक ज़रूर महान हैं, इसमें दो राय नहीं. 

28 अक्टूबर, 2013 को 84 वर्ष की आयु में ह्रदय गति रुक जाने से उनका निधन हो गया. जो आदमी किताबों में जीवित रहता है, वह लोगों के दिलों में भी जीवित रहता है, वह कभी नहीं मरता.


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