Thursday, 14 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 1 ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया

आम आदमी की ख़ास कहानी : 1
ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया

(लेखकों की संस्मरण-श्रृंखला को मैंने नाम दिया है, 'लागा चुनरी में दाग़'. अब कुछ अ-लेखकों के संस्मरण पढ़िए। इस श्रृंखला को मैंने नाम दिया है, 'आम आदमी की ख़ास कहानी'. जब-जब जो मन में आएगा, उसकी कहानी आपके सामने पेश करूँगी, लेखक की भी और -लेखक की भी.)

आज सुनिए एक आम आदमी के 'सच' और सचाई की कथा. कई साल से एक बात मन में कुलबुला रही थी. समझ नहीं पा रही थी, उसे आप सब के साथ कैसे बाँटूँ? जब से मैंने कैदियों द्वारा जेल में रह कर लिखी गई पुस्तकों के बारे में कई पोस्ट यहाँ फेसबुक पर डाली, तब से मुझे कई फेसबुक मित्रों ने संपर्क किया, जो या जिनके परिचित मिलती-जुलती परिस्थितियों से गुज़र चुके हैं. एक फेसबुक मित्र की कहानी ने मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। यह कहानी उन्होंने मुझे शायद 2013 में पूर्व सुनाई थी. उसके बाद वे कहाँ गायब हो गए, नहीं जानती. उनकी कहानी कुछ यूँ है..... 

वे पत्नी और छोटे बेटे के साथ एक छोटे शहर में रहते थे. सरकारी नौकरी थी. कुछ झंझट नहीं था. ज़िन्दगी आराम की होनी चाहिए थी लेकिन ज़िंदगियों को भी तो चैन नहीं होता कि आराम से बीत जाएँ. पत्नी अकसर मायके जाया करती थी. पति के सामने यह रहस्य कई वर्ष बाद खुला कि मायके की तरफ के किसी पुरुष के साथ पत्नी के अवैध सम्बन्ध थे. उस समय उनका बेटा चार वर्ष का था. उनके पूछने पर पत्नी ने स्वीकार किया कि वह किसी अन्य पुरुष के साथ अधिक खुश है और उसी के साथ जीवन जीना चाहती है. यह जानने के बाद वे तीन-चार दिन आत्म-मंथन की स्थिति में रहे. उनके मन के भीतर घोर संघर्ष था. वे बहुत अपमानित और नीचे गिरा हुआ महसूस कर रहे थे. आखिर उनमें क्या कमी थी? वे पत्नी के प्रति ईमानदार थे, उससे प्रेम करते थे, उसका पूरा ख्याल रखते थे. अच्छी सरकारी नौकरी थी. पत्नी को ससुरालियों का भी कोई झंझट नहीं था. तो क्या सिर्फ शरीर-सुख के लिए..... वे जैसे-जैसे सोचते, उनका क्रोध बढ़ता जाता. वे बाहर से शांत नज़र आते लेकिन उनके भीतर ज्वालामुखी भभक रहा था. उन्हें महसूस होता, पत्नी शायद उन्हें मूर्ख समझ रही है, शायद सोच रही है कि उन्होंने उसके अवैध सम्बन्ध को स्वीकृति दे दी है. लेकिन वे भीतर ही भीतर दहक रहे थे. अजीब सी ग्लानि और हीनभाव से ग्रसित होते जा रहे थे. उन्हें अपना जीवन व्यर्थ लग रहा था. क्यों न वे मर जाएँ? उन्होंने सोचा था. पर कैसे मरें? वे तो जीते जी मर गए थे. पत्नी की दी हुई इस चोट को आखिर कितना सहें? पत्नी को पहले उनसे अलग होना चाहिए था, बाद में यह सब करती. उनकी छत्रछाया के नीचे रह कर उनसे धोखा क्यों किया?

तीन-चार दिन अकेले घुटते रहने के बाद एक शाम उनके सब्र का अंत हो गया. उस दिन ऑफिस से आकर वे फ्रेश हुए, उन्होंने चाय-नाश्ता किया, थोड़ी देर आराम किया और फिर खाना बनाती हुई पत्नी के पास रसोई में चले गए. उन्होंने पत्नी से सीधा सवाल किया, 'तो तुम उसके साथ रहना चाहती हो?' पत्नी शायद उनके मूड को नहीं समझी और सहज बोली, 'हाँ.' उन्होंने वहीँ रसोई में पत्नी को ज़मीन पर गिराया और उसकी चुन्नी उसके गले में तब तक कसते रहे, जब तक उसका छटपटाना बंद नहीं हो गया. यानि उन्होंने अपनी पत्नी की गला घोट कर हत्या कर दी. उनका चार वर्ष का बेटा वहीँ रसोई में अपनी आँखों के सामने यह काण्ड देखता रहा. पता नहीं, कितना क्या समझ पाया था?

उसके बाद वे पुत्र को अपने साथ कमरे में ले आए और सो गए. सुबह-सुबह उनके पुत्र ने उन्हें जगाया कि 'भूख लगी है.'  उन्होंने उसे खाने के लिए कुछ बिस्कुट दिए और बच्चे को गोद में उठाया, घर का ताला बंद किया और ट्रेन या शायद बस (ध्यान नहीं, क्या बताया था) से नज़दीक के किसी दूसरे शहर में रहने वाले अपने माँ-बाप के घर पहुँच गए. वहाँ उन्होंने कुछ नहीं बताया, बच्चे को माँ के पास छोड़ा, कहा, 'मुझे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है.' और बस लेकर किसी अन्य शहर चले गए. उस शहर में पंद्रह दिन रहने के बाद उन्होंने डरते-डरते अपनी माँ को फोन किया तो माँ ने बताया कि उनके चार साल के बेटे ने दादा-दादी को बता दिया था कि पापा ने माँ को मार दिया है. उनकी माँ ने उन्हें यह भी बताया कि उनके घर से तीन-चार दिन बाद बदबू आने के कारण पुलिस ने ताला तोड़ कर लाश बरामद की और उन्हें ढूँढते हुए उनके पिता के घर आई थी. उनके माँ-बाप ने उन्हें सुझाया कि जल्दी आकर पुलिस के आगे सरेंडर कर दें.

उन्होंने अगले दिन अपने शहर पहुँच कर सरेंडर कर दिया लेकिन पुलिस के आगे एवं कोर्ट में इस बात से इंकार किया की हत्या उन्होंने की है. उनके अनुसार, उनके वकील ने उन्हें समझाया था, 'जब तक केस डिसाइड नहीं हो जाता तुम मंदिर में भगवान के आगे भी कबूल नहीं करोगे कि हत्या तुमने की है.' वे छह महीने जेल में अंडरट्रायल रहे. उनके साथ यह चमत्कार हुआ कि पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट में डॉक्टर्स द्वारा इसे स्वाभाविक मौत बताया गया, जिसका, उन्हें खुद नहीं मालूम कि ऐसा कैसे हुआ? मैंने पूछा था, शायद उन्होंने डॉक्टर्स को रिश्वत खिलाई हो. लेकिन उन्होंने इंकार किया. उन्होंने कहा कि शुरू में जेल जाते समय उनके वकील के जेल में तीस हज़ार रुपये बतौर रिश्वत दिए थे, ताकि उनकी पिटाई न हो. जेल से बाहर आने के बाद छह वर्ष तक मुकदमा चला जिसमे वे निर्दोष करार दे कर बरी कर दिए गए. वे एक सरकारी नौकरी में थे, जिसमे जेल की छह माह की अवधि में सस्पेंड रहे और बाद में रीइंस्टेट कर लिए गए.

बाद में उन्होंने अखबारी विज्ञापन के ज़रिये अनेक अड़चनों के बाद दूसरा विवाह किया। उस दूसरी महिला के पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हुई थी. उन्होंने हर जगह सच बता कर ही अपने रिश्ते के लिए बात की. आज वे एक सुखी गृहस्थ हैं और एक और बेटे के पिता, जो आज पाँच वर्ष का है. उनकी इस दूसरी पत्नी के साथ उनका रिश्ता ठीक चल रहा है. आज उनका पहला पुत्र लगभग 20 वर्ष का होगा, शायद इंजीनियरिंग जैसा कुछ पढ़ रहा है (मैं भूल गई, क्या बताया था)

उनका कहना था, उन्होंने कोर्ट के सिवा कहीं झूठ नहीं बोला। मुझ अनजान तक के सम्मुख अपना सच कबूला। वे कोर्ट में गुनाह-मुक्त ठहराए गए, फिर से पत्नी और घर का सुख मिला, सरकारी नौकरी बरकरार रही. कुछ दिन तक वे कार्यालय में सहकर्मियों के स्नेह और विश्वास से वंचित रहे, लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक हो गया.

एक बार फिर मेरा मन हुआ कि मैं चमत्कारों पर विश्वास करूँ। यह बात दूसरी है कि इस कहानी के सच्चे नायक के सच बोलने की सराहना करने के बाजजूद मैं खुद ही नहीं समझ पाई कि उनके उस कृत्य की सराहना कैसे करूँ जिसके लिए उन्हें कोई मलाल नहीं था. मैंने सारी कथा सुनने के बाद उनसे पूछा था, 'एक बात सच-सच बताएँ, क्या आपके मन में कोई अपराधबोध या ग्लानि या पछतावा है?' उन्होंने कहा था, 'नहीं, कोई अपराधबोध नहीं, कोई पछतावा नहीं। जरा सा भी नहीं।'

उनकी हिन्दी लेखनी और कथन-शैली अत्यंत सुन्दर, सुगढ़ एवं समृद्ध है, कि मुझ जैसा हिन्दी वाला प्रभावित हुए बिना न रह सका. 'वे चाहें तो अपनी कहानियाँ खुद लिख सकते हैं,' मैंने उनसे कहा था. उनके अनुसार, 'दसवीं पास की थी, तब कई कवितायें और कुछ कहानियाँ लिखी थीं। फिर धीरे-धीरे कम होता गया। विवाह के बाद तो मेरे हाथ से किताबें छीन ली जातीं थीं, इस कारण पी एच डी भी पूरी नहीं कर सका।'

मैंने इस सम्बन्ध में फेसबुक पर या अन्यत्र लिखने के बारे में उनसे पूछा तो उनका कहना था, 'फेसबुक पर क्या प्रतिक्रिया रहती है, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लोग अपनी जगह बैठ कर सोचते हैं. जाहिर है, कुछ लोग इन्सानियत जताते हुए गुज़र जाने वाले के प्रति सहानुभूति जतायेंगे। मेंरी जगह आकर सोचने की ज़हमत नहीं उठायेंगे। मुझे उस दिन फर्क पड़ेगा जब कोई मेरे हालात से गुज़रा हुआ व्यक्ति यह कहेगा कि यह आपने गलत किया।'

उनकी ज़र्रानवाज़ी है कि उन्होंने मुझसे कहा, 'दीदी, आप संशय में न रहें। मुझे यकीन है आप पर और आप यकीन करें मुझ पर। आप बेफिक्र होकर पोस्ट या कहानी, कुछ भी लिखें। पूरी सृजनात्मक स्वतंत्रता लें। जरूरी बदलाव भी चाहें तो कर सकती हैं. अब कथानक आपका है। अब यह कहानी आपकी हुई, आप इसे जिस मर्ज़ी दृष्टिकोण से लिखें। पाठक इसके बारे में जो मर्ज़ी सोचें, मुझे फर्क नहीं पड़ता।'

मैंने उनसे कहा, 'अपनी इतनी निजी बातें किसी को बताते हुए आपको भय नहीं लगता?' उनका कहना था. 'दीदी, सबको कहाँ? मैं तो केवल सुपात्रों से ही इस बारे में बात करता हूँ। आप मुझे अनजान नहीं लगीं! कुछ है जो हमें जोड़ता है. पता नहीं क्या है। आज का दिन चमत्कारों के नाम।'

हाँ, यह भी एक चमत्कार ही था जो उन्होंने मुझे यह सब बताने योग्य समझा.

मैंने उनसे पूछा, 'आपने मुझ पर कैसे विश्वास किया कि आप मुझे अपने जीवन का इतना निजी पक्ष बता सकते हैं और मैं आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी? मैं पहली बार में ही आपको कैसे विश्वसनीय लगी?'

उनका कहना था, 'कुछ तो शब्दातीत भी होता ही है, दीदी. किसी का चेहरा, किसी की पोस्ट, किसी की आँखें..... कुछ है ऐसा जिसे शब्दों में बताना असंभव है. वह क्या कहते हैं..... इन्ट्यूशन जैसा कुछ. मुझे लगा, आपको बताया जा सकता है.'

मैं धन्य हुई भाई कि आपने मुझे इस योग्य समझा. आप जहाँ कहीं भी हों, सुख से रहें. खुश रहें.

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