Friday, 15 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 2 और वह सचमुच मर गया.

आम आदमी की ख़ास कहानी : 2
और वह सचमुच मर गया.

(यह सत्य कथा मैंने 2014 में दो पोस्ट में दी थी, जिसमें सारे मैसेज कॉपी पेस्ट किए थे. अब पुनः सम्पादित कर एक बार में यहाँ दे रही हूँ. पुराने मित्रों ने पढ़ा होगा. नए मित्रों के लिए प्रस्तुत है.)

मुझसे फेसबुक पर बहुत लोग निकटता महसूस करते हैं और अपनी समस्याएँ डिस्कस करते हैं. अपनी कितनी गुप्त बातें भी बता देते हैं. मेरी रचनाओं से, मेरी पोस्ट से लोगों को लगता है कि मैं प्रेम के मसले सुलझाने में पारंगत हूँ. (यह बात उन्हें नहीं पता कि मैं अपने ही मसले नहीं सुलझा पाती।) तो कई बार ऐसा होता है कि दूर बैठे भी किसी के साथ हमारी हृदयतन्त्री मिल जाती है और हम अपना दुःख-सुख बाँट लेते हैं.

एक 28 वर्षीय पुरुष, जो अच्छी कमाई वाले एक सम्भ्रान्त पेशे में थे, ने मुझे लिखा, 'यदि आपने मेरी समस्या का समाधान नहीं किया तो मैं आत्महत्या कर लूँगा।' मैंने समस्या बताने के लिए कहा. पूरा दिन मैसेज करके उन्होंने बताया कि वे अविवाहित हैं और अपने से नौ वर्ष बड़ी एक विवाहित महिला से उनका प्रेम सम्बन्ध है तथा शारीरिक सम्बन्ध भी है. उस महिला के दो या तीन (?) बड़े बच्चे हैं. बड़ी बेटी पंद्रह वर्ष की है. वह महिला भी उनसे उतना ही प्रेम करती है, उसके पति का व्यवहार उसके साथ ठीक नहीं है.

मैंने कहा, 'जब आप दोनों ही एक-दूसरे से इतना प्रेम करते हैं तो समस्या कहाँ है? यूँ ही चलाते रहिए।'

वे बोले, 'नहीं, अब मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होता कि वे एक गैर मर्द के साथ रहें.'

'गैर मर्द? मैं समझी नहीं,' मैंने पूछा।

'उनका पति. न जाने रात में वह उनके साथ क्या करता होगा। सोच कर ही मेरा खून खौल उठता है। मेरे लिए अब यह बात बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है कि वे प्यार मुझसे करतीहैं और रहती किसी और के साथ हैं. मैं मर जाऊँगा, मणिका जी, आप कुछ कीजिए।'

मैं कहना चाहती थी कि गैर मर्द तो आप हैं, लेकिन उस समय यह कहना उन मित्र का दिल तोड़ना होता। मैंने पूछा, 'आप मुझसे क्या सहयोग चाहते हैं?'

'आप मुझे बताएँ कि मैं उनके आदमी को रास्ते से कैसे हटाऊँ? मैं उनके बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। मैं ज़हर खा लूँगा।'

प्यार वाकई जुनूनी होता है.

'क्या आप उस औरत से शादी कर सकते हैं?' मैंने पूछा।

'ज़रूर कर सकता हूँ, करना चाहता हूँ पर कैसे करूँ?'

'क्या आप उसके बच्चों को, जो आपसे बारह-पंद्रह साल छोटे हैं, अपने बच्चों की तरह अडॉप्ट करेंगे? उनके पिता बनेंगे?' मैंने पूछा।

'हाँ, ज़रूर बनूँगा, लेकिन बच्चे शायद माँ के साथ आना पसंद न करें क्योंकि वे अपने पिता से ज़्यादा प्यार करते हैं.'

यहाँ मुझे लगा कि बच्चों के लिए उनके मन में पूर्ण स्वीकार नहीं है.

'फिर भी, आप अपनी बताएँ कि बच्चों को अपनाने में आपको कोई ऐतराज़ तो नहीं?' मैंने फिर पूछा।

'नहीं, मुझे कोई ऐतराज़ नहीं।'

'आपके घरवालो को ....… '

'मुझे किसी की कोई परवाह नहीं।'

'तो ऐसा कीजिए, उन महिला से कहिए कि आप उनसे शादी करना चाहते हैं, वे अपने पति से तलाक लेने की तैयारी करें,' मैंने उन्हें सुझाव दिया।

'मैं अभी उनसे यह पूछता हूँ, और आपसे रात को फिर बात करता हूँ,' उन्होंने कहा.

मैंने सोचा, फोन पर पूछ रहे होंगे या उनसे मिलने चले गए होंगे। शायद नज़दीक रहती हों.

रात को उनका मैसेज आया, 'मणिका जी, वे अपने पति से तलाक लेने के लिए तैयार नहीं हैं. मैंने बहुत कहा, उनके आगे रोया, गिड़गिड़ाया कि मैं उनके बिना जी नहीं सकता लेकिन वे नहीं मानीं। कहने लगीं, इतने बड़े बच्चे हैं, ये सब बातें शोभा नहीं देतीं, उनका पति जैसा भी है, वह उसी के साथ गुज़ारा कर लेंगी।'

'अब आप सोचिए कि आपको क्या करना है? यूँ ही अधर में लटके रहना है या आगे बढ़ना है? यह सोच कर अपने दिल को समझाइए कि आपने प्यार तो सच्चा किया लेकिन पात्र सही नहीं चुना,' मैंने कहा.

'पता नहीं, मैं मर जाना चाहता हूँ. एकदम से उन्हें नहीं छोड़ पाऊँगा।'

'एक झटके से तोड़ दीजिए, कष्ट एक ही बार होगा। रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ेंगे तो कष्ट रोज़ होगा,' मैंने कहा और मैसेज बॉक्स बंद कर के सो गई.

सुबह उठी तो आधी रात को आया हुआ उन मित्र का मैसेज देखा, लिखा था, 'आपसे बात करके बहुत तसल्ली मिली। मैं रोज़ उनके साथ भागने के ख्वाब देखता था, सोचता था, जब कहूँगा, वे मेरे साथ भाग चलेंगी, सब कुछ छोड़-छाड़ कर. उन्हें तलाक दिलवा कर शादी करने की बात कभी सोची ही नहीं थी. आपने सुझाया तो अच्छा हुआ, उनका जवाब पता चल गया. अब अपने को समेटूँगा। फिलहाल, बड़ा हल्का महसूस कर रहा हूँ. आपका शुक्रिया।'

मुझे हैरानी हुई, लो, यह तो जैसे कोई समस्या ही नहीं थी, इतना चटपट इसका समाधान भी निकल आया. कई बार एक छोटी सी चिंगारी ही रोशनी दे जाती है. लेकिन यह भी मानना पड़ेगा दोस्तों कि लड़के भी पागलपन की हद तक प्यार करते हैं.

इन मैसेज के आदान-प्रदान के दो महीने बाद मैंने उन मित्र की फेसबुक प्रोफाइल खोली, यह देखने के लिए कि देखूँ, वह क्या लिख रहे हैं और उनसे पूछूँ कि उनकी समस्या का कोई हल निकला या नहीं, तो देखती गई, उनकी लिखी कोई पोस्ट नहीं थी, सब टैग्ड पोस्ट थीं. पिछले महीने में एक मित्र ने उन्हें टैग करके उनकी फोटो के साथ यह पोस्ट डाली थी कि ये अब हमारे बीच नहीं रहे. कमेंट्स में लोगों ने पूछा कि क्या हुआ था तो मित्र ने लिखा कि एक दिन पहले लोकल अखबार में उनकी मृत्यु की खबर छपी थी. अप्राकृतिक मृत्यु रही होगी, मैंने सोचा, तभी तो अखबार में खबर छपी. मैंने उस अखबार का एक माह पुराना अंक नेट पर सर्च किया तो उनकी फोटो के साथ उनकी आत्महत्या की खबर छपी देखी। वे अपने माता-पिता की एकलौती संतान थे.

उसने सच कहा था कि वह मर जाएगा और वह सचमुच मर गया. उसे बदनाम करना मेरा उद्देश्य नहीं, बस, सच्चे भावुक लोगों से मेरा यही कहना है कि प्रेम बेशक अंधा कहा गया है लेकिन सच्चे लोग आँख खोल कर ही प्रेम-पात्र का चुनाव करें। सबको अपने बारे में पता होता है कि कौन भावनाओं में जुड़ कर कितना टूट सकता है. अतः खुदगर्ज़ और निकृष्ट लोगों की पहचान करें, जिन्हें दूसरे की भावनाओं से खेलने में कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें अपने से दूर रखें। मृत्यु किसी समस्या का हल नहीं है. प्रेम के सिवा और भी ज़िम्मेदारियाँ हैं, जिनके लिए आपको ज़िंदा रहना है.

प्रेम में मर तो जाएँ पर पहले ऐसा साथी तो मिले जिसके लिए मरा जा सके.

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