Saturday, 16 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 3 जब मैंने पत्नी के हक में फैसला दिया

आम आदमी की ख़ास कहानी : 3
जब मैंने पत्नी के हक में फैसला दिया

यह कहानी सच्चे किरदारों की सपाट कहानी है.

कई बार बाहरी तत्व हमारी ख़ुशी में बाधा नहीं होते। हमारा अपना मन ही हमें भँवरजाल में उलझाए रखता है.

इधर वर्षों बाद उन मिस्टर एन्ड मिसेज़ से मुलाकात हुई। मिसेज़ पहले की तरह ही गोरी-चिट्टी और खाते-पीते घर के डीलडौल वाली थीं। मिस्टर एकदम बुढ़ा  गए थे। उनके स्वास्थ्य में इतना अधिक परिवर्तन था कि यदि अकेले दिखते तो मैं उन्हें पहचान न पाती। आखिर बीसेक साल बाद देख रही थी। भला हो उनकी मिसेज़ का, जो वे पहचाने गए। मुझसे रहा न गया और मैंने पूछ ही लिया, 'ओये, तू इतना कैसे ढल गया कि पहचान में ही नहीं आ रहां? भाभी जी को देखो, पहले की तरह चमक रही हैं।'

हम एक जैसी उम्र के थे और एक ही मोहल्ले में साथ-साथ पले-बढे थे.

'दो-दो को संभाल रहा हूँ। मज़ाक है क्या?'

हैं? यह उन्होंने क्या कह दिया? वह भी इतने खुल्लम-खुल्ला? क्या पत्नी को बता दिया है अपनी उस दूसरी के बारे में?

'ये तो ऐसे ही कुछ भी बोलते रहते हैं,' मिसेज़ ने स्पष्टीकरण दिया।

लगभग चालीस वर्ष पूर्व उन दोनों का विवाह हुआ था। पहले दिन से मिस्टर को मिसेज़ पसंद नहीं आईं। कारण बताया, 'मोटी है।'
विवाह के समय दोनों की आयु उन्नीस-बीस वर्ष रही होगी। उस समय वे कॉलेज में पढ़ रहे थे। एक तरह से बाल विवाह था। माता-पिता की इच्छा के आगे कुछ कह नहीं पाए। अमीर व्यापारी पिता थे। करोड़ों की चल-अचल सम्पत्ति। इकलौती संतान यह पुत्र। माता पिता के मन में ढेरों चाव। बस, विवाह होना था, हो गया।

उनके विवाह के एक साल के भीतर पिता के अचानक असमय निधन के बाद उन्हें बिज़नेस सम्भालना पड़ा। पढ़ाई बीच में रुक गई, एक तरह से ख़त्म ही हो गई। संयोग कहिए कि अपने कार्यक्षेत्र के नज़दीक रहने वाली एक लड़की से उनका जो परिचय हुआ, वह प्रेम और उसके बाद मंदिर में चोरी-छुपे फेरों तक पहुँच गया। उन्होंने ही मुझे उस लड़की के बारे में बताया। मुख्य बात कि 'पतली है, एकदम छरहरी।' और उनकी ज़िन्दगी आराम से चलने लगी। घर में पत्नी के साथ भी ठीक से रहने लगे। दूसरी होने से पत्नी के साथ शायद ज़्यादा ठीक से रहा जाता है कि कहीं दूसरी का भेद न खुल जाए।

बीस वर्ष मैं उस अवैध सम्बन्ध की साक्षी रही। मैं क्या, हमारे हमउम्र बहुत से मित्रों को पता था लेकिन उनकी पत्नी को कानोकान खबर नहीं थी। पत्नी के साथ भी घूमना-फिरना, सैर-सपाटे, फ़िल्म-तमाशे, बदस्तूर जारी थे। कार्यक्षेत्र में सब यह समझते थे कि वह दूसरी उनकी पत्नी है। वह बाकायदा माँग में सिन्दूर, बिन्दी, चूड़ी, करवा चौथ, सारे तीज-त्यौहार नियम से करती थी. वहाँ अलग मकान, अलग गृहस्थी बसी हुई थी। दोनों से एक-एक बेटा कुछ महीनों के अंतराल पर हुआ। दोनों बेटे अलग-अलग बढ़िया स्कूलों में। दोनों तरफ ठाटबाट। सच में आदर्श ज़िन्दगी थी। पहली को कुछ पता नहीं। दूसरी को कोई समस्या-शिकायत नहीं।

हम मित्र प्रायः यह बात किया करते, 'यार, यह तो बड़ा नसीब वाला निकला। एक घरवाली और दूसरी बाहरवाली, दोनों के साथ बढ़िया तालमेल बैठाया हुआ है. इसके तो मज़े हैं यार.'

क्या यह पैसे का खेल था? या वे मिस्टर समझदारी से चल रहे थे?


एक दिन मिस्टर मेरे पास आए और बोले, 'मोहिनी, मैं बहुत परेशान हूँ। मुझे पता है, तू बहुत अक्लमंद है, तू ही मेरी समस्या हल कर सकती है।'

'बता, क्या हुआ?' मैंने पूछा।

'यार, मैं थक गया हूँ दोहरी ज़िन्दगी जीते-जीते। एक ही फ़िल्म दो-दो बार देखनी पड़ती है। एक ही होटल में आज इसके साथ खाना खाओ, कल उसके साथ। आज इसे शॉपिंग कराओ, कल उसे. मैं तो सच मर गया.'

'तो? यह सब तुम्हारा ही चुना हुआ है,' मैंने कहा.

'बस, अब एक तरफ होना चाहता हूँ. उसके भाई भी कई बार कह चुके हैं कि पत्नी से तलाक लो और हमारी बहन से कानूनन शादी करो. आखिर उसके सारे रिश्तेदारों में पता है कि हम पति-पत्नी हैं. मैं उसकी साइड के हर फंक्शन में उसके साथ जाता हूँ.'

'यानि तुम यह कहना चाहते हो कि तुम पत्नी को छोड़ कर उसे चुन रहे हो?' मैंने पूछा।

'नहीं, मेरा वह मतलब नहीं। मैं असल में कन्फ्यूज्ड हूँ. समझ नहीं पा रहा, किसे चुनूँ? अब मुझे वाइफ से भी कोई शिकायत नहीं है. घर में सब ठीक चल रहा है, इज़्ज़त बनी हुई है. मुझे दूसरी भी बेहद पसंद है. असल में मैं दोनों के साथ रहना चाहता हूँ पर थक गया हूँ. मैं खुद को फँसा हुआ महसूस करता हूँ. मेरे जीवन से सुकून ख़त्म हो गया है. मैं क्या करूँ? तू ही बता, मोहिनी, मैं क्या करूँ?'

'तेरी समस्या का हल मुश्किल है. जिसे भी छोड़ेगा, उसे ही दुःख होगा।'

'एक बात और साफ़ कर दूँ कि मैं किसी का दिल नहीं दुखाना चाहता। मैं दोनों के प्रति वफादार हूँ.'

क्या बात है वफादारी की? वाह वाह. सबके पास अपने हिसाब से वफादारी की परिभाषा है. मैंने सोचा। कहा यह, 'यूँ तो दोनों ठीक हैं, किसी को भी चुन सकते हो. पर पत्नी का पलड़ा एक वजह से ज़्यादा भारी है.'

'किस वजह से?'

'इस वजह से क्योंकि वह तेरी ब्याहता पत्नी है. दूसरे, यदि तूने उस दूसरी औरत की खातिर पत्नी को छोड़ना होता तो क्या इतने सालों में छोड़ नहीं चुका होता? अब शादी के बीस साल बाद क्यों सब उलट-पुलट करना? और मैं क्या कह सकती हूँ? आगे तू जान.'

बस, उसके बाद मेरा उन लोगों से मिलना नहीं हुआ. उसकी कहानी एक तरह से मेरे दिमाग से ही निकल गई. इतने साल बाद अब मिलना हुआ तथा उसका यूँ खुलेआम कहना कि 'दो-दो को संभाल रहा हूँ,' मेरी जिज्ञासा को जगा गया कि आखिर अब वह दूसरी कहाँ है?

मिस्टर ने मिसेज़ को इधर-उधर करके संक्षेप में मुझे जानकारी दी कि वे उस समय तुरंत तो कोई निर्णय नहीं कर पाए थे, हाँ, बाद में उस दूसरी के भाइयों ने पाँच करोड़ में समझौता किया और अपनी बहन को भी शायद दुनियादारी सिखाई। उसका बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त कर अमेरिका में सेटल है, माँ भी, जो अब सास बन चुकी है, उसके साथ अमेरिका में है. मिस्टर की पत्नी से पैदा हुआ बेटा मर्चेंट नेवी में है, विवाह हो चुका है, बेटा अपनी पत्नी के साथ ज़्यादातर शिप पर रहता है. मिस्टर का राज़ अभी तक मिसेज़ को नहीं पता, यह कितने बड़े सुकून की बात है.

अंत भला तो सब भला.

No comments:

Post a Comment