Wednesday, 6 April 2016

लागा चुनरी के दाग : 4 डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल

लागा चुनरी के दाग : 4 

डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल
यादों के झरोखे से

न न, इनकी चुनरी में दाग नहीं। ये मेरी चुनरी में दाग ढूँढने आए थे. मैं मुंबई में नौकरी में थी, केंद्र सरकार के एक कार्यालय में राजपत्रित अधिकारी के पद पर। सुप्रसिद्ध नाटककार, कथाकार डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल रेलवे की हिन्दी सलाहकार समिति की बैठक में भाग लेने आए हुए थे। वहाँ उनसे दो-तीन बार मुलाक़ात हुई। मेरी ज़िन्दगी के कुछ पुराने सन्दर्भों पर बात करते रहे। कहने लगे, 'मणिका, तुमने अच्छा नहीं किया। कोई तुम्हारे श्राप से ग्रस्त है, उसे अपने श्राप से मुक्त करो।'

मैं उत्तर में हँस दी थी और कहा था, 'इसका मतलब डॉ. लाल, मुझे किसी की दुआएँ लग रही हैं, जो मैं फलफूल रही हूँ?'

मैंने सोचा था, न जाने, कौन सा सूत्र खोज रहे हैं? लेकिन वे मुझे आश्चर्यचकित करते हुए बोले, 'मैं तुम्हारा इंटरव्यू लेना चाहता हूँ। तुम पर एक कहानी लिखना चाहता हूँ।'

मैं फिर हँस दी और बोली, 'डॉ. लाल, मैं तो अपनी कहानियाँ खुद ही लिख लेती हूँ।' मन में सोचा, मेरे साधारण जीवन में से इन्होने कौन सी असाधारण बात ढूँढ ली जो कहानी लिखना चाहते हैं? फिर मुझसे मेरे जीवन की कुछ घटनाएँ पूछते रहे, कुछ घटनाओं की पुष्टि करते रहे और साथ-साथ उन्हें नोट करते गए। मैंने बताने लायक बातें बताईं। आखिर इतनी समझ तो मुझ में थी कि कहानियाँ तो मुझे भी लिखनी हैं तो मैं अपने प्लॉट इन्हें क्यों दूं?

एक शाम वे मेरे घर आए। मुश्किल से पाँच मिनट घर में बैठे होंगे। उनकी परखती नज़रों ने मेरे घर में क्या देखा, मैं नहीं जान पाई। बोले, 'मणिका, तुम बहुत समर्थ हो, बहुत सबल ....'

'कैसे?'

'तुम्हारा घर देख कर लगता है। तुम तो ज़रा भी 'बेचारी' नहीं लगतीं। तुम स्वयं में पूर्ण हो, तुम्हें किसी की ज़रुरत नहीं है।'

अब मैं अपने मन के घाव क्या खोलती कि कोई भी स्वयं में पूर्ण नहीं होता। हरेक को किसी न किसी की ज़रुरत होती है।

वे बोले, 'तुमने मेरी कहानी बदल दी। मैं जिस तरह की कहानी तुम पर लिखना चाहता था, तुमसे मिलने, बात करने के बाद तो उसका रूप ही बदल गया।'

'मतलब?'

'मतलब कि तुम बहुत समर्थ हो, मणिका, अपने आप में पूर्ण, मुझे रह-रह कर लग रहा है .....'
'और आप एक लिजलिजी स्त्री की कहानी लिखना चाहते थे, यही ना?' मैंने मानो शिकायत की हो।
'लिजलिजी तो नहीं लेकिन कठोर और निर्दयी औरत की तस्वीर मेरे दिमाग में थी। पर तुम उस छवि से एकदम भिन्न हो।'

मुझे महसूस हुआ, लोगों के आगे अपने दुखड़े रोने से लोगों की हमदर्दी मिलती है, लेकिन मैं इस कला में माहिर नहीं। मुझे कोई अपनी हमदर्दी ज़ाया करने योग्य नहीं समझता।

'लेकिन कहानी लिखूँगा ज़रूर, दिल्ली पहुँचते ही,' कह कर डॉ. लाल विदा हो गए थे।

उसके कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु का समाचार अखबार में पढ़ा। पता नहीं, उन्होंने मेरे बारे में कुछ लिखा या नहीं? हो सकता है, कोई आधी-अधूरी लिखी कहानी उनके कागज़ों में दबी पड़ी हो। हाँ, उन्हें दिए अपने तथाकथित इंटरव्यू के बाद मैंने दस लघु कवितायेँ लिखी थीं, जो यत्र-तत्र छप चुकी हैं। उन्ही में से तीन यहाँ प्रस्तुत है ....

1. लोग आए थे मुझसे कहने
कि तुम शापग्रस्त हो
महफ़िलों में लगाते हो ठहाके
पर भीतर से त्रस्त हो.
तुम कितने भाग्यशाली हो
कि लोग तुम पर तरस खाते हैं
तुम्हारे भीतर पहुँच जाते हैं.

2. हँसी के फव्वारे
हमने सड़कों पर छोड़े थे
भीड़ को पता नहीं चला
कहीं एक छोटी सी चिड़िया
चोंच खोले
पंख फड़फड़ा रही है।
बदहवास भीड़
हँसी के सहारे लटक
गुमराह हो गई
छोटी-सी चिड़िया
भीड़ के छँटने की प्रतीक्षा में
हमेशा के लिए सो गई।

3. वे दोस्ती का लबादा ओढ़ कर
हवा में एकता के झंडे लहराते रहे.
उन्होंने एक-एक कर ईंटें निकालीं
और बाज़ार में उछाल दीं.
वे नहीं जानते
कि ज़मीन उसी जगह है
जिस पर मनचाही मंज़िलें
खड़ी की जा सकती हैं
बिना किसी झंडे के।

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