Sunday, 17 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 4 यह है निर्दयी नगरिया, तू देख बबुआ

आम आदमी की ख़ास कहानी : 4
यह है निर्दयी नगरिया, तू देख बबुआ

वे मेरी सम्मानित सम्बन्धी थीं. उस समय उनकी आयु 92 वर्ष थी. एक बार उनके बेटा-बहु हमसे मिलने आए तो हमने उनकी माँ का हालचाल पूछा। बेटा बोला, 'जिए ही जा रही हैं. जिए ही जा रही हैं, आदमी थकता नहीं इतना जीते-जीते?'

बहु ने ठहाका लगाया। हम क्या कहते? हम भी मुस्कुरा कर रह गए. मुझे उन वृद्धा सम्बन्धी पर तरस आया, मैंने कहा, 'जीना, मरना क्या अपने बस में है? यह जीवन दोबारा नहीं मिलता। अच्छा है, जितना जी लें.'

'उन्हें जीने से कौन रोक रहा है? हमारे चाहे मर जाएँगी क्या वो?' बहु तमक कर बोली।

'ऐसे न बोलो। बस स्वस्थ रहें, मैं यही दुआ करती हूँ.' मैंने कहा.

'स्वस्थ? अजी, बहुत तगड़ी हैं वो. सारे घर में फुर्ती से इधर-उधर घूमती रहती हैं. सुबह छह बजे उठ जाती हैं, अपनी चाय बनाती हैं. अब हमारे बस का तो है नहीं इतनी जल्दी उठना,' बहु बोली।

'निर्लज्ज,' मैंने उस बहु को मन में गाली दी.

बहु मेरे बेटे-बहु से बोली, 'भई, जब एक ही बेटा हो तो करना तो उसे ही पड़ता है, चाहे हँस के करो, चाहे रो के करो.'

उसके ऐसा कहने से मैं डर गई. यह तो मेरे बेटा-बहु को बिगाड़ के रख देगी। मेरे बेटा-बहु तो ठीक ही हैं. 'पर,' मेरे अंतर्मन से कोई बोला, 'तुम ही आज कौन सी 92 की हो, अभी तुम घर में हर तरह से सहयोग कर रही हो, कौन जाने, कल क्या हो?' ऐसी बातों से कौन नहीं डर जाएगा? कल का क्या पता? हम गारंटी से किसी के बारे में कुछ नहीं कह सकते।

वे विदा हुए, हमें अपने घर आने का निमंत्रण दे कर. हम कहाँ जाने वाले थे? उनका घर दूसरे शहर की तरह दूर था. वैसे भी मैं टूटे-फूटे परिवारों में, गलत संस्कार के लोगों के बीच जाने से कतराती हूँ, उनके बुरे सितारे मुझ पर असर न करें, इस डर से. साथ ही, मन दुखी भी होता है. लेकिन एक दिन जाना ही पड़ा. हमारे घर में कोई आयोजन था, दोपहर को सम्बन्धियों के भोजन की व्यवस्था थी. मैंने उन्हें फोन किया तो बोले, 'नहीं नहीं, आप कभी हमारे घर नहीं आईं, तो बुलाने के बहाने ही आइए.'

मैं और बेटा उनके घर गए. बातें, हँसी-मज़ाक, ठहाके। ज़िद करके उन्होंने खाना खिलाया। कहीं 'वो' नहीं दिख रही थीं. मैंने उनके बारे में पूछा तो वे मुझे उनके कमरे में ले गए. वे अपनी चारपाई पर लेटी हुई थीं. मुझे देखते ही उठ बैठीं। मैं उनके पास बैठ गई. उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरा, 'आ मोहिनी, तुझे सालों बाद देखा।'

जो लोग मेरे बचपन और माँ-पिता के घर की यादों से जुड़े हैं, वे सब मुझे 'मोहिनी' नाम से पुकारते हैं.

'ठीक हो?' मैंने पूछा।

'हाँ, ठीक ही हूँ. मेरे बेटा-बहु बहुत अच्छे हैं, देखो ना, घर में ही रह रही हूँ, कम से कम मुझे घर से बाहर तो नहीं निकाला,' वे बोलीं।

उफ़ ! उनके इस कथन से मैं तड़प उठी. 'यह घर तो आपका ही है, आपका ही बनवाया हुआ,' मैंने उन्हें तसल्ली दी, और आगे कहा, 'आइए, आप भी हमारे साथ ड्राइंग रूम में बैठिए। बॉबी, इनका हाथ पकड़ लो,' मैंने अपने बेटे से कहा तो उनका बेटा बेशर्मी से बोला, 'हाथ पकड़ने की ज़रूरत नहीं है, यह कोई अपाहिज थोड़े ही हैं, चल सकती हैं, सारे घर में दौड़ती फिरती हैं,'

मैं उन बेशर्मों को कैसे समझाती कि हाथ पकड़ने की ज़रूरत सिर्फ अपाहिजों को ही नहीं होती. इसे टच थेरेपी (Touch Therapy) कहते हैं, जिससे अपनापन मिलता है, अपनों का भरोसा मिलता है. पर कोई अपनापन देना चाहे, तब ना.

मैं उन्हें हाथ पकड़ कर ड्राइंग रूम में लाई, वे मुझसे फुसफुसा कर बोलीं, 'मोहिनी, तुझसे बोल कर आज मेरे मुँह की हवा निकली है, वरना मैं तो किसी से बोलने को तरस गई थी.'

'हमारे घर भी तो इतनी दूर-दूर हैं, वरना मैं तो रोज़ आपसे बोलने आ जाती,' मैंने भी फुसफुसा कर कहा, 'किसी की परवाह मत करो, आराम से जिओ, सोचो, सब मर गए हैं, आप अकेली हैं.'

'अरे मोहिंनी, मर तो मैं चुकी हूँ, सालों पहले, बस, अब तो बस यह शरीर छोड़ना बाकी है,' उन्होंने कहा.

'हमारे घर में दस दिन बाद पार्टी है, सब रिश्तेदारों और कुछ मित्रों को दोपहर के खाने पर बुलाया है. आपको ज़रूर आना है, आपका आशीर्वाद चाहिए। देखो, इन्हें ज़रूर लाना,' मैंने उनके बेटे से कहा और विदा ली.

अगले दिन दोपहर उनके बेटे का फोन आया, वे गुज़र गईं, रात को सोते में ही शायद दम तोड़ दिया। मैं हैरान-परेशान, क्या वे सिर्फ मुँह की हवा निकलने का इंतज़ार कर रही थीं? क्या वे किसी से अपने मन की आखिरी बात कहना चाहती थीं?

हम उसी समय उनके घर गए. तीसरे दिन उनके चाओथे/उठाले में भी गए तो मैंने उनके बेटे से कहा, 'क्या मैं अपना फंक्शन स्थगित कर दूँ, क्योंकि तुम लोग तो आओगे नहीं?'

वह बोला, 'अरे नहीं, हम इन बातों को नहीं मानते। हम ज़रूर आएँगे।'

तो यह दुनिया है. जब किसी के जीते-जी ही किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा तो मर जाने के बाद क्या फर्क पड़ता?
डर लगता है ना कि हम जब उस उम्र में पहुँचेंगे तो हमारा क्या हाल होगा? चाहे हमने अपनी संतान को कितने ही अच्छे संस्कार दिए हों लेकिन घर से जुड़ने वाले अन्य रिश्ते भी अपने संस्कार बाँटते हैं, बाहर दोस्तों से भी व्यक्ति सीखता है. कहाँ-कहाँ से बचा कर रखेंगे अपनी संतान को? किसी डिब्बे में बंद करके तो रख नहीं सकते।

संस्कारों की बात भी छोड़ दें तो यह सच है कि घर के बड़े-बुजुर्गों के लम्बी उम्र तक जीने से नई पीढ़ी सच में ऊब जाती है. बूढ़ों की कोई उपयोगिता तो रह नहीं जाती, सिवाय आशीर्वाद देने के. बल्कि वे नई पीढ़ी के गतिशील जीवन में बाधा होते हैं, उनके रोज़ के दुःख-दर्द को लेकर बच्चे बैठे रहें या अपना जीवन जीएँ? बच्चों और जवानों के अपने जीवन में करने के लिए इतना कुछ होता है कि उन्हें यह सोचने की भी फुर्सत नहीं होती कि कभी हम भी उस उम्र को पहुँचेंगे।

जैसे दुनिया चलती आई है, ऐसे ही चलती रहेगी।

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