Wednesday, 6 April 2016

लागा चुनरी में दाग : 5 रजनी पणिकर

लागा चुनरी में दाग : 5

रजनी पणिकर
महिलाओं की मसीहा

सुप्रसिद्ध लेखिका रजनी पणिकर जी रेडियो में उच्च पदाधिकारी थीं। उन्होंने मुझ छोटी सी को बड़े अवसर दिए।

सबसे पहले मैंने उन्हें एक इंटरव्यू बोर्ड में देखा था. तब मैं उन्हें पहचानती नहीं थी. आकाशवाणी, दिल्ली के परिवार नियोजन विभाग में स्क्रिप्ट राइटर पद के लिए मेरा इंटरव्यू था. चार साक्षात्कार कर्ताओं में एक रजनी पणिकर भी थीं. उन्होंने मुझसे पूछा, 'यदि आपको लूप पर कोई स्क्रिप्ट लिखने के लिए दी जाए तो आप क्या लिखेंगी?' पहले तो मैं सकपकाई. फिर मैंने परिवार नियोजन पर इंटरव्यू के लिए तैयार की गई एक स्क्रिप्ट की रूपरेखा उन्हें बता दी. एक दूसरे अधिकारी ने मुझसे पूछा, 'आप जानती हैं, कॉन्ट्रासेप्टिव किसे कहते हैं?' अनजाने मैं मुस्कुरा दी और बोली, 'जी, मैं बाकायदा विवाहित हूँ और ऐसी चीज़ों के बारे में अच्छी तरह जानती हूँ.' बहरहाल मेरा चुनाव नहीं हुआ. एक दूसरी महिला उम्मीदवार, विमल इस्सर (लेखक देवेन्द्र इस्सर की पत्नी) चुन ली गई थीं.

उन दिनों मेरा नौकरी करना निहायत ज़रूरी था. मैं नहीं जानती थी कि इंटरव्यू बोर्ड में बैठी महिला कोई बड़ी लेखिका रजनी पणिकर हैं. बाद में किसी ने बताया, 'अरे, तुम रजनी जी को नहीं जानतीं? फर्स्ट फ्लोर पर पहले ही कमरे में बैठती हैं. कभी जाकर उनसे मिल लो. बड़ी दयालु हैं. कोई न कोई रास्ता तुम्हें सुझा देंगी.' और मैं फटेहाल एक दिन मिसेज़ पणिकर के कमरे में जा पहुँची। उन्होंने बहुत आदर से मुझे बैठाया. लम्बी भुखमरी से मेरा आत्मविश्वास इतना डगमगा गया था कि मैं किसी से भी बात करने में संकोच का अनुभव करती थी. किसी से नौकरी के लिए कहते ही रोना फूट पड़ता था. रजनी जी ने मेरे चेहरे पर उपजी दीनता को भाँप लिया था और मुझे कुछ बोलने का अवसर दिए बिना स्वयं बोली थीं, 'मुझे अफ़सोस है कि वह नौकरी तुम्हें नहीं मिली. मैं तुन्हें तुम्हारे नाम से उसी दिन पहचान गई थी. मैंने तुम्हारी एक कहानी पढ़ी थी, शायद तुम्हारी पहली कहानी थी. मैं तुम्हारी मदद ज़रूर करना चाहूँगी।' मेरा अहोभाग्य, मैं धन्य हुई, इतनी बड़ी लेखिका ने मुझे इतना मान दिया, मुझ कल की आई, अदना-सी लेखिका, लेखन की शुरुआत करती, हीनभावना से ग्रस्त, पनीली आँखें, आवाज़ में थरथराहट, फटेहाल, ग़रीबी और बदहाली का इश्तेहार जैसे। बस बस, वह सब याद करके लिखूँगी तो फिर रो पडूँगी जैसे तब रोया करती थी.

वे बड़े से बड़े अधिकारी के सामने मेरा परिचय लेखिका के रूप में देती थीं, मैं शर्म से पानी-पानी होती रहती थी क्योंकि तब तक मैंने कुछ ख़ास नहीं लिखा था। वे नए लेखकों को बहुत सम्मान देती थी। उन्होंने मुझे रेडियो में अपने विभाग में कॉन्ट्रैक्ट पर स्क्रिप्ट राइटर के पद पर रख लिया। फिर जल्दी ही एक स्थायी नौकरी के लिए UPSC में इंटरव्यू में पास होने की मुझसे तैयारी करवाई. मैं जो दिल्ली विश्वविद्यालय से MA M PHIL करके Ph D करते हुए नौकरी के लिए यहाँ-वहाँ टक्करें मार रही थी, नौकरी की मेरी तलाश पूरी हुई. उसके बाद वे तो मेरे जीवन में नहीं रहीं, उनका देहावसान हो गया था, लेकिन उन्होंने जो मेरे जीवन की जड़ें मज़बूत कीं, मेरा आत्मबल बढ़ाया, वह अगले दो और UPSC इंटरव्यू में मुझे सफलता दिला कर उच्च से उच्च्तर पद पर ले गया. हर इंटरव्यू में मेरा लेखक होना, मेरे द्वारा लिखी गई पुस्तकें मेरा सम्बल बनीं. इसीलिए कहती हूँ, साहित्य मेरे लिए बहुत बड़ी शरणस्थली रहा है.

रजनी पणिकर का रुतबा-रुआब ऐसा था कि वे किसी का फॉर्म अटेस्ट कर दें तो बन्दे को नौकरी में सेलेक्शन के लिए अवश्य कंसीडर किया जाता था। मुझ पर उनके बहुत अहसान रहे। मेरी ज़िन्दगी को कई बडे ज़बरदस्त मोड़ उन्हीं के कारण मिले। एक तरह से उन्होंने मुझे नरक से निकाल कर स्वर्ग की राह दिखाई. कोई मसीहा आता है आपके जीवन में, आपको चलना सिखाता है, इतना कि आप खुद एक दिन फर्राटे से दौड़ने के काबिल हो जाते हैं. तो ये थीं, रजनी पणिकर, सही मायनों में फेमिनिस्ट।

उच्च पदस्थ पति और एक पुत्र के साथ उनका छोटा परिवार, सुखी परिवार था. भारी-भरकम व्यक्तित्व की मालकिन वे एक ज़िन्दादिल महिला थीं और ज़िन्दगी को खूबसूरती से जीना जानती थीं. उनका विचार था कि ज़िन्दगी फिर से शुरू की जा सकती है, कहीं से भी शुरू की जा सकती है. अपनी इसी विचारधारा का पोषण उन्होंने अपने उपन्यास 'महानगर की मीता' में किया है. नई पीढ़ी के प्रति उनका भावात्मक लगाव था. उन्होंने नई पीढ़ी की मानसिकता का सही चित्रण अपने उपन्यास 'सोनाली दी' में किया है. मैंने उनकी मृत्यु उपरान्त उन पर एक लेख लिखा था जो मेरी पुस्तक 'प्रसंगवश' में संकलित है। उस लेख में उनके विचारों तथा उनकी जीवन-शैली से जुड़े कुछ अन्य प्रसंग हैं. उस लेख को यहाँ टाइप करना मेरे बस की बात नहीं.

उनका कहना था कि मेरी कवितायेँ तेज़-तर्रार होती हैं परन्तु वे पसंद करती थीं। वे महिला लेखिका संघ की सर्वेसर्वा थीं। एक बार लेखिका संघ का कोई बहुत बड़ा कार्यक्रम था जिसमें काफी बड़ी गैदरिंग थी। मेरी शुरूआती दौर की कविताओं से परिचित संघ की कुछेक महिलाओं ने कहा कि मणिका मोहिनी बताएं कि मंच से कौन सी कविता पढ़ेंगी। मैंने बता दी। वे सब एकमत कि ये कविता मंच से नहीं पढ़ी जा सकतीं। रजनी पणिकर जी ने पूछा, 'क्यों?' वे बोलीं, 'रजनी जी, हम सब के पति भी औडिएन्स में बैठे हैं और मणिका की सारी कवितायेँ पति के खिलाफ हैं।' रजनी जी ने कहा, 'तो क्या हुआ? मणिका का पति भी तो औडिएन्स में है। मणिका यही कवितायेँ पढ़ेगी।' और हाल में युवा हुई, हाल ही में विवाह हुई मणिका मोहिनी ने उस समय जो कवितायेँ पढ़ीं, वो ये थीं. और यह सिर्फ और सिर्फ रजनी पणिकर जी के कारण संभव हो पाया.

1. पति रोज़ पकड़ में आए
रोज़ छूट जाए।

2. महत्वाकांक्षी महिलाओं के लिए
पति
एक अर्थहीन संयोग।

3. पति नाम का जानव
संस्कारवश जंगली है
पत्नी जिस समय उसे 
पालतू समझ रही होती है
उस समय वह
छुप कर
कुलांचे भर रहा होता है।

4. सुबह से शाम
रोज़ तीन काम।
तोते की तरह रटे हुए समान
झूठे वायदे करना।
बिल्ली की तरह
बेमतलब इधर-उधर की गश्त लगाना
देर से घर आना।
कुत्ते की तरह
पूरे गले का उपयोग।
ऐसे तिहरे जानवर को
भोग सके तो भोग।

5. बुद्धिमान पति ....
जिसकी पत्नी
दूसरों की हो-हो कर भी
उसके पास लौट आती है।

6. मूर्ख पति ....
जिसकी पत्नी
उसकी हो कर भी
दूसरों के पास लौट-लौट जाती है।

(विशेष टिप्पणी : जितने भी पति इन कविताओं को पढ़ रहे हैं, वे कृपया नाराज़ न हों।)

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