Wednesday, 20 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 5 ज्वाला से ज्वालामुखी तक

आम आदमी की ख़ास कहानी : 5
ज्वाला से ज्वालामुखी तक

इंसान ज्वालामुखी ऐसे ही नहीं बनते। बड़े जिगर वाले होते हैं वे, जो ज्वालामुखी बनने के लिए खुद को प्रस्तुत करते हैं.

बात तीस-पैंतीस वर्ष पहले की है. मेरा पुत्र शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में पढ़ रहा था. एक बार मैं बॉबी से मिलने शिमला गई तो ज्वाला (नकली नाम) मुझे वहाँ मिली. उसके दो बेटे भी उसी स्कूल में पढ़ रहे थे, बड़ा बॉबी से एक साल सीनियर था, छोटा एक साल जूनियर. जब पता चला कि वह दिल्ली में रहती है तो अच्छा लगा और आपस में बातचीत शुरू हुई. बातों में जब यह पता चला कि वह दिल्ली में उसी कॉलोनी में रहती है जिसमें मैं, तो और ज़्यादा अच्छा लगा. बातें आगे बढ़ीं, कुछ अपनापन बढ़ा. और जब यह पता चला कि मेरी तरह वह भी अकेली रहती है तो हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. यह तो सोने पर सुहागा था. उसने कहा, मैंने भी सोचा, अब हम पक्की सहेलियाँ हैं. चलो, अपनी दोस्ती का उत्सव तो मना लें. उत्सव मनाने के लिए दिल्ली लौटने तक सब्र किसे था? वहीँ किसी अच्छे रेस्तराँ में डिनर किया. बिल डच सिस्टम से चुकाया यानि उसने अपने पैसे दिए, मैंने अपने. और रात की बस लेकर हम शिमला से साथ लौटे। दिल्ली लौटने तक हम 'आप' से ' 'तुम' और 'तुम' से 'तू' पर आ चुके थे.

उसका रंग गोरा और सुनहरापन लिए था, शरीर इस कदर नपा-तुला, एक-एक चीज़ सही अनुपात में, बातों का लुभावना अंदाज़, रूप ऐसा जैसे तस्वीर में देखी देवियों वाला, कि लाख ढूँढने पर भी कोई दोष न मिले. रास्ते में चलती तो लोग ठहर जाते। (इसी के लिए मैंने एक बार एक पोस्ट में लिखा था कि कुछ रूप-सौंदर्य ऐसे होते हैं जिन्हें देख कर मन में वासना नहीं, भक्ति-भाव उपजता है.) तो ऐसी रूपवती थी वह.

हम दोनों का हर समय साथ रहने का सिलसिला शुरू हो चुका था. दिन भर हम दोनों अपने-अपने काम पर रहतीं. रात कभी मेरे घर गुज़रती, कभी उसके घर.

एक शाम मैं ऑफिस से सीधे उसके घर पहुँच गई. वह भी तभी लौटी थी. मेरा ध्यान अचानक इस बात की ओर गया कि उसने लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी. एक और दिन उसने लाल रंग का सलवार-सूट पहना था. तभी उसने साड़ी उतार कर एक ओर फेंकी और लाल साटन का नाइट गाउन पहन लिया. मैंने हँस कर कहा, 'ज्वाला, तुझे लाल रंग बहुत पसंद है.'

उसने हँसी में लपेट कर एक वाक्य मेरी ओर उछाल दिया, 'जानेमन, अब कपड़ों में ही रंग रह गए हैं, ज़िन्दगी के रंग तो फीके पड़ गए.'

वह पहचानी जाती थी, अपने इसी खूबसूरत अंदाज़ से. उसके बोलने का लहज़ा ही ऐसा था, एकदम मस्त, जो उसके व्यक्तित्व में रच-बस गया था.

उसने रसोई में जा गैस पर चाय का पानी चढ़ा दिया. फिर पीठ पर लहराते अपने खुले लम्बे बालों को जूड़े की शक्ल में लपेट लिया. अब उसका शोख चेहरा गरिमापूर्ण सम्भ्रान्त चेहरे में बदल गया था. कमरे से बाहर निकल वॉश बेसिन पर जा उसने चेहरा साबुन से धो लिया. अब उसके लिपस्टिक-विहीन चेहरे से सात्विकता झलक रही थी. पल-पल बदलते उसके रूप को मन ही मन सराहती मैं मंत्रमुग्ध हो गई थी. तभी कॉफ़ी का प्याला थमाते हुए उसने कहा था, 'सुन, तेरे चेहरे पर इतने काले धब्बे क्यों हैं? फेशियल नहीं कराती क्या?'

मैंने कभी अपने बाह्य रूप की ओर ध्यान नहीं दिया था. ऑफ़िस के अलावा समय या तो रोने में गुज़रता था या सोने में. कभी पढ़ने में भी. 'फेशियल.... कभी-कभी करा लेती हूँ,' मैंने जवाब दिया.

'अब तू नियम से फेशियल कराएगी,' उसने कहा, 'ज़रा सज-बन कर रहा कर. इतनी भी काली नहीं है तू, जितना अपने को बना कर रखा हुआ है. यूँ ही उलटे-सीधे कपड़े पहनती है और ऑफिस चल देती है. अब तू ढंग से रहेगी. मैं तुझे सजना सिखाऊंगी। और हाँ, रोेएगी तो बिलकुल नहीं।'

मैं उसके स्वर्ण की भाँति दमकते संगमरमरी रंग में खो गई, मैं उसके निष्कलंक सौंदर्य पर इतनी मुग्ध थी, कुछ उसकी बातें कानों में रस घोल रही थीं, मैं संवारूँगी तुझे, सारे ग़म दे दे मुझे, मैं मन ही मन उस पर न्यौछावर हो गई.

जैसा कि उसने बताया था, उसका विवाह बहुत छोटी उम्र में हो गया था. विवाह के एक वर्ष बाद एक बेटे को जन्म दिया। उसके जन्म के डेढ़ वर्ष बाद सात महीने की गर्भवती थी, कि पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई. पति की मृत्यु के दो महीने बाद उसने दूसरे पुत्र को जन्म दिया. पति अपने पीछे जमा-जमाया बिज़नेस और पर्याप्त धन-राशि छोड़ गए थे. उसने पति का बिज़नेस सम्भाला। नियति ने उसके साथ क्रूर मज़ाक किया था. धन-धन्य तो भरपूर दिया था पर पति का साथ छीन लिया था.

तभी उसके जीवन में एक चमत्कार हुआ. एक क्वारा लड़का, जो उससे उम्र में छोटा था, उसके रूप पर इस कदर मुग्ध हुआ कि अपने माता-पिता से ज़िद की कि वह शादी करेगा तो उसी से, अन्यथा किसी से नहीं. अमीर खानदान का इकलौता बेटा दो दुधमुँहे बच्चों वाली विधवा से शादी करना चाहता है, माँ-बाप मानें भी तो कैसे? बस एक बार उससे मिल लीजिए, बेटे की ज़िद पर माँ-बाप लड़की के परिवार से संपर्क करके इस लड़की से मिले, जिसे मैंने यहाँ ज्वाला नाम दिया है, तो त्राहि त्राहि कर उठे, 'ओह, इतनी प्यारी, इतनी कम उम्र की लड़की, देवियों वाला रूप, इसके दुर्भाग्य में इसका क्या कसूर? हम तैयार हैं.' और उसकी दूसरी शादी हो गई. वह गृहस्थिनों की तरह एक संयुक्त परिवार में रहने लगी.

दूसरी शादी के एक साल बाद उसने फिर एक बेटे को जन्म दिया और यहीं से शुरू हुआ उसकी बदनसीबी का सिलसिला. अब संयुक्त परिवार तो संयुक्त परिवार होता है, सास, ससुर, देवर, ननद, जितने लोग, उतनी बातें. बदनसीबी शुरू हुई इस बात से कि 'यह अपने बेटों को ज़्यादा प्यार करती है, हमारे को कम.' ज्वाला ने बताया था कि उस समय उसे उनसे कहने के लिए यह तर्क नहीं सूझा कि 'ये तीनों बच्चे आपके लिए अलग-अलग होंगे, एक आपका, दो मेरे, लेकिन मेरे लिए तो तीनों ही बेटे मेरे हैं. मैं एक को कम और दूसरे को ज़्यादा प्यार कैसे करूंगी?' उस समय उसके पहले दो बेटों की उम्र मात्र पाँच वर्ष और साढ़े तीन वर्ष थी.

उसने पति और ससुराल वालों के कहने पर अपने इतने छोटे बच्चों को शिमला के इस स्कूल में भर्ती कर दिया, जिसमें मेरा बेटा दस वर्ष की आयु में गया था. (जब हम दोनों मिले तो हमारे बच्चे दस-ग्यारह वर्ष के थे.) मेरा मन इस बात से बहुत दुखी हुआ था कि पाँच वर्ष के बच्चे को हॉस्टल में डाल दिया जाए. लेकिन इसके बावजूद उसकी दूसरी शादी टिक न सकी. उन्होंने तीसरा बेटा अपने पास रख लिया और आपसी रज़ामंदी से विवाह विच्छेद कर दिया. ज्वाला ने ज़िद-ज़बरदस्ती नहीं की क्योंकि उसका कहना था कि जो रिश्ता दिलों में टूट गया, उस रिश्ते के घिसटते रहने में कोई तुक नहीं थी. यह हमारा बेटा, यह तुम्हारा बेटा, यह सवाल बाद में भी उठ सकता था.

एक बात अच्छी हुई, जिसके लिए ज्वाला के दूसरे पति की जी भर कर तारीफ़ मैंने की थी. ज्वाला के दूसरे पति ने शादी के समय इसकी पहली शादी से उत्पन्न दोनों बेटों को कानूनन अडॉप्ट किया था. यह बात उन्होंने निभाई कि बेटों के प्रति वे सारा दायित्व निभाएँगे, समय-समय पर उनसे हॉस्टल जाकर मिलेंगे, उन्हें किसी बात का पता नहीं चलने देंगे.

(मैंने ज्वाला से कहा था कि जब बच्चों को गोद लिए पिता से भी ज्वाला का तलाक हो चुका है तो बच्चों को उनके असली पिता के बारे में क्यों न बताया जाए? मेरी सलाह पर ज्वाला ने स्कूली शिक्षा पूरी होने पर बच्चों को असलियत से परिचित कराया. बच्चे यह सच्चाई मानने को तैयार नहीं थे कि उनके पिता, जो उन्हें इतना प्यार करते थे, उनकी हर इंच्छा पूरी करते थे, उनके सगे पिता नहीं थे. और जो उनके सगे पिता थे, उन्हें उन्होंने कभी देखा तक नहीं था, उनकी कोई स्मृति उनके पास नहीं थी. उन्हें धक्का तो ज़रूर लगा लेकिन भगवान जब जीवन में हादसे देता है तो उन्हें सहने की शक्ति भी देता है.)

इस हादसे से गुज़र कर ज्वाला फिर पुराने ढर्रे पर थी. उसने अपने पहले पति का बिज़नेस सम्भाल लिया था. बिज़नेस भी ऐसा जो कभी किसी महिला को करते नहीं सुना था, मोटर पार्ट्स का, जो ज्वाला ने पूरी तरह सीखा, समझा और सफलता पूर्वक चलाया.

'यार, यह पति बड़ी बकवास चीज़ होता है,' एक शाम, जब हम ऐसे ही साथ थे, तब उसने कहा था.

'छोड़ ना, कहाँ यह पति-पुराण ले बैठी?' मैंने कहा.

वह आगे बोली, 'भीड़-भाड़, चिल्लपौं की आदत अब ख़त्म हो गई है. कितनी अच्छी ज़िन्दगी है, न कहीं जाने के लिए किसी से आज्ञा लेनी, न किसी के लौटने की प्रतीक्षा. मन आए खिचड़ी बनाओ, मन आए, बाज़ार में खाओ. कितनी अच्छी ज़िन्दगी है. है ना?'

मैं क्या कहती? खिचड़ी बनाते और बाज़ार में खाते मेरा मन ऊब चुका था. घर में ढेर सारे लोग हों तो कितने भिन्न-भिन्न प्रकार के खाने बनें, अकेले के लिए क्या बनाओ? उसका कहना था, विवाह आवश्यक होते हुए भी आदर्श स्थिति नहीं है. अचानक उसके चेहरे की चमक बुझ गई, उसकी आँखें खाली हो गईं और एक असहायता उसके सौंदर्य को फीका कर गई. ऐसे में उसे अपने पुराने दिन यूँ याद आए, 'कभी हम भी पतिव्रता थे. पति के पैर दबाते थे, ससुराल वालों की सेवा में जुटे रहते थे, बच्चों के रोने-धोने से घिरे रहते थे. आखिर वह भी तो ज़िन्दगी थी, उसमें भी तो हम खुश थे. यह तो जो हम आज हैं, सब परिस्थितिओं की बदौलत.'

उसका बहुवचन में बात करना टूटी हुई स्त्रियों की स्थिति का सामान्यीकरण करना था. इस सामान्यीकरण ने मुझे उसके और नज़दीक पहुँचा दिया था. वातावरण में एकाएक छा गई चुप्पी से मुझे महसूस हुआ था, हम किसी गूढ़ विषय पर आकर अटक गए हैं. अपने अतीत की बातें दोहरा-दोहरा कर हम अपने वर्तमान को भी दुखद बना लेते हैं. मैं सोच ही रही थी कि फिर उसका ठहाका हवा में उछला था, 'अब हम रोने-धोने में विश्वास नहीं करते. हम का मतलब, मैं और तू.'

'फिर किसमें विश्वास करते हैं?' मैंने पूछा था.

''इश्क करने में. अब हम हज़ारों इश्क करेंगे. हमें ज़िन्दगी जीने की पूरी छूट मिली है. अब हम ज़िन्दगी को पूरी तरह जिएँगे,' वह बोली थी.

भयंकर. मैंने सिर्फ सोचा था, बोला था यह, 'मैं तो सोचती थी, एक चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है और तुम हज़ारों की बात कर रही हो.'

'पगली, चाहने वाला एक तो कभी मिलता ही नहीं और हज़ारों बड़ी आसानी से मिल जाते हैं.' उसने कहा था और मैं उदास हो गई थी.

जब हम इतनी-इतनी देर तक बातें करते थे, तो एक-दूसरे के घर सोना स्वमेव निश्चित हो जाता था. मैंने उदास स्वर में कहा था, 'अब सोएँ? बारह बज चुके हैं. लाइट बंद कर दो.'

वह मेरे पास खिसक आई थी और बोली थी, 'तुम तो वाकई बहुत उदास हो गई हो. लगता है, तुम्हें तुम्हारा 'वह' याद आ रहा है.'

मुझे 'वह' याद नहीं आ रहा था. अभी तक मैं उस की 'हज़ारों' की बात पर टिकी हुई थी. एक तरह से उखड़ गई थी. इधर उसकी छनछनाती हँसी से शब्द झर रहे थे, 'बावली, तूने बताया था, तेरे उस निर्लज्ज ने दूसरी शादी कर ली है. इसलिए अब तू उसके बारे में मत सोचा कर. यहाँ तू उसे याद कर रही है, वहाँ वह अपनी बीवी के साथ सोया होगा.'

उसकी बातें इतनी दिलकश थीं कि मैं अधिक देर तक उदास नहीं रह पाई थी. रात बहुत बीत चुकी थी. सुबह काम पर जाना था, इसलिए हमें सोना पड़ा था.

एक दिन ज्वाला ने गम्भीर होकर पूछा, 'तुम्हारे फ़िगर की किसी ने तारीफ़ की?'

'लोगों की आँखों में कभी-कभी ऐसा भाव ज़रूर नज़र आया है, लेकिन तारीफ़ तो कोई तब करेगा, जब मैं करने दूँगी,' मैंने गर्वोन्नत होकर कहा था.

'यानि कि तुम हौआ हो?' उसने मेरा मज़ाक उड़ाते हुए और अपने प्रशंसकों की गिनती गिनाते हुए चंचलता से कहा, 'अपना तो भई यह उसूल है कि दो-चार प्रशंसक अपने इर्द-गिर्द ज़रूर होने चाहिए.'

वर्षों से स्थिर मेरे ह्रदय-सागर में उसने जैसे एक कंकरी फेंकी थी और शांत जल में छोटी-छोटी लहरियाँ उठने लगी थीं. मैं स्वयं को काफ़ी मूर्ख नज़र आ रही थी. वह कितनी समझदार है. हँसना जानती है, जीना जानती है. यह तो सरासर नादानी है कि दुःख को अपने से चिपटाए रखो. उसकी बातों में मुझे अपने लिए खुशियों के द्वार खुलते हुए जान पड़े थे.

उस दिन हम दोनों मेरे घर में थी. मैंने उससे पूछा, 'सिर्फ बातों से पेट भरना है क्या? चलूँ, कुछ खाना-वाना बना लूँ.'

वह बोली, 'हाँ यार, भूख तो लगी है. चल, आज खिचड़ी से थोड़ा ऊपर उठते हैं. मटर-चावल बना ले, वह कहते हैं ना जिसे, पुलाव.'

घर में मटर नहीं थी. खिचड़ी बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी थी. ब्रेड-अण्डों से काम चला लिया था. और उसकी बातों की लोरियों में नींद कब आ गई थी, पता नहीं चला था.

यहीं से शुरू हुआ था हमारी जिंदादिलियों का सिलसिला. पार्टियाँ और महफ़िलें. मुझे अचानक एक दिन अहसास हुआ कि जीवन में एकाएक रौनक आ गई है. इसमें बुरा भी क्या है? फिर जो भीड़ है, सब उसकी है. मैं सिर्फ उसके साथ हूँ, उसके जीने के ढंग में बाधा न बनते हुए, अपने जीने के ढंग को ज्यों का त्यों बनाए हुए. पर कितनी हैरानी की बात थी कि इतने बड़े पुरुष-वर्ग में से किसी की आँखों में भावनाओं का वह सागर लहराता नज़र नहीं आता था, जिसकी मुझे  तलाश थी. 'छोड़ यार, सब टाइम वेस्ट है,' मैंने उससे कहा था.

'नो जानेमन, यह टाइम वेस्ट नहीं, यह टाइम पास है,' वह मुझे समझाते हुए बोली थी, 'तू खुद सोच, कभी-कभी हम कितने अकेले हो जाते हैं? समय बिताना चाहें तो कोई साथ नहीं मिलता. रोना चाहें तो किसका कंधा है सिर रख कर रोने के लिए? मरना चाहें तो किसे हमारी ज़रूरत है जो आगे बढ़ कर हमें रोक लगा, मरने न देगा? यहाँ तक कि हँसना भी चाहें तो कौन निष्कपट ह्रदय से हँसेगा हमारे साथ?'

उसकी बातें सच प्रतीत होते हुए भी मुझे बड़ी उलझन में डाल जाती थीं. हमें क्या ज़रूरत है रोने के लिए किसी कंधे की? हँसने के लिए किसी के साथ की? हम अकेले ही क्यों नहीं....

'अकेले तो हम हैं ही,' वह कहती, 'परन्तु दो-चार पल के लिए यदि कोई साथ मिलता है तो उसे क्यों खोएँ? अब हम खुशियों को क्षणों में एकत्र करेंगे. क्षण-क्षण जोड़ कर अपने लिए पूर्णता का सृजन करेंगे.'

उसकी आवाज़ दार्शनिक हो उठी थी. मुझसे कोई उत्तर देते न बना था. मेरा सारा ज्ञान उसके तर्कों के सम्मुख चौपट हो गया था. मैं चुप सुनती रही जब उसने कहा, 'लोग बड़े आराम से जी रहे हैं. लोगों को हमारी परवाह है कि हम कैसे जिएँगे? अकेले हम कैसे जी पाएँगे? लोगों के पास मन है, क्या हमारे पास मन नहीं है? लोगों के पास शरीर है, क्या हमारे पास शरीर नहीं है? क्या हमारे मन और शरीर की अपनी-अपनी माँगें नहीं हैं? अगर हम अकेले हैं तो क्या यह अकेलापन हमारा चुना हुआ है?'

मेरे दिमाग में खट से कुछ बजा और मैंने जैसे सच को स्वीकार करते हुए कहा, 'हाँ, यह मेरा अकेलापन मेरा चुना हुआ है.'

'नहीं माई डिअर, तुम्हारा अकेलापन तुम्हारा चुना हुआ नहीं है, बल्कि तुम इसे चुनने के लिए विवश हुईं,' उसने मुझे टोक कर कहा, 'कोई आत्महत्या करता है तो क्या वह ख़ुशी से आत्महत्या करता है? नहीं, वह आत्महत्या करने के लिए विवश होता है, विवश किया जाता है.'

'पता नहीं तेरे दिमाग में इतनी बातें कहाँ से आती हैं?' मेरी जिज्ञासा का समाधान उसने इन शब्दों में किया था, 'तेरी तरह पोथियाँ नहीं पढ़ीं मैंने, मणिका डार्लिंग, ज़िन्दगी को पढ़ा है.'

एक दिन तो गज़ब ही हो गया. मैं रात को उसी के घर थी. उसने मेरे सामने एक फोटो रखा और बोली, 'इसे ज़रा देख तो.' वह मेरे लिए एक 'लड़का' ढूँढ लाई थी, एकदम अरेंज मैरिज माफिक. बहुत पैसे वाला. उसके अन्य गुण क्या थे, यह बताने के लिए वह बोलना शुरू हुई कि मैंने उसे डाँट दिया, 'पागल हुई है क्या? इससे तू ही तीसरी शादी कर.'

'ना मेरी बच्ची,' क्या-क्या अदाएँ थीं उसकी? रिश्ता लाई थी, इसलिए मेरी माँ बन गई, 'तू एक बार उससे मिल तो ले, 'हाँ' कर दे, बहुत पैसे वाला है, तुझ पर पैसा पानी की तरह बहा देगा.'

'फिट्टे मुँह तेरा. बस, अब हमारी दोस्ती ख़त्म.' मुझे उस पर इतना गुस्सा आया कि मैंने उस दिन उससे दोस्ती ख़त्म करने का फैसला कर लिया था. वह 'सुन तो ज़रा, सुन तो ज़रा' कहती रह गई और मैं आधी रात को उसके घर से उठ कर अपने घर आ गई.

संयोग कुछ ऐसा बना कि मैं कुछ दिन बाद ही मुंबई ट्रांसफर पर चली गई, फिर वहाँ से गयाना. दस साल बाद जब दिल्ली लौटी तो पता ही नहीं चला कि ज्वाला कहाँ है?

कुछ समय पहले अचानक वह टकरा गई, एक मॉल में शॉपिंग करते हुए. मैं पुत्र और परिवार के साथ थी, वह भी अपने बड़े पुत्र और परिवार के साथ थी. उसने बताया, उसके दूसरे पति से उत्पन्न पुत्र की तेज़ बाइक चलाने के कारण सोलह वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई थी. उसके पहले पति से उत्पन्न बड़ा पुत्र यहीं दिल्ली में वेल सेटल्ड है. छोटा पुत्र विदेश में है, बहुत अच्छी जॉब में. उसकी भी शादी हो गई है. ज्वाला छह महीने यहाँ रहती है, बड़े पुत्र के साथ और छह महीने वहाँ रहती है, छोटे पुत्र के साथ. संतुष्ट है कि बिना बाप के बच्चे उम्मीद से ज़्यादा ऊँचे उठे हैं.

जैसे इतनी कटी है, बाकी भी कट जाएगी, जानेमन, चिन्ता क्या?

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