Wednesday, 6 April 2016

लागा चुनरी में दाग : 6 छोटी उम्र की बड़ी लड़की

लागा चुनरी में दाग : 6

छोटी उम्र की बड़ी लड़की
ऐसे दोस्तों पर कौन ना मर जाए खुदा

सच है, मैं यादों की गलियों से गुज़र रही हूँ। मेरी एक मित्र है, बड़ी गहरी और अनोखी मित्र। कवियित्री, चिन्तक, दार्शनिक. उसके और मेरे बीच उम्र का अच्छा-खासा फासला है। वह मेरे और मेरे पुत्र के बीच में है यानि जितने साल वह बौबी से बड़ी है, उतने ही साल मुझसे छोटी है। हमारे बीच तू-तड़ाक का रिश्ता है। उसकी मेरी दोस्ती लगभग तीस वर्ष पुरानी है और हमने ज़िन्दगी के अनेकों उतार चढ़ाव साथ-साथ देखे हैं। अनेक बार लडाइयां भी हुईं, बड़ी भयंकर लडाइयां हुईं, लेकिन लड़-लड़ कर हम फिर मिलते रहे। लड़ाइयों के बावजूद जो दोस्तियाँ नहीं टूटतीं, उन्हें मैं अर्जित यानि कमाई हुई दोस्ती कहती हूँ, जिसकी उम्र बहुत लम्बी होती है। वरना जो एक हलके से झटके से चटक जाए, वह क्या दोस्ती? तो हमारी दोस्ती ऐसी थी कि रात-दिन का साथ। पूरी रात बातें करते बीत जाती थी। कहाँ से आती थीं इतनी सारी बातें? पता नहीं पर सिलसिला ख़त्म ही नहीं होता था। एक विचित्र सा दुर्योग था हमारे बीच, उसे मेरी उम्र के लड़के पसंद आते थे और मुझे उसकी उम्र के। हम हँसा करते थे कि उस में पिता-ग्रंथि है, मुझ में पुत्र-ग्रंथि। उसका प्रेम अपने से लगभग 35 वर्ष बड़े व्यक्ति से हुआ, जिससे उसने शादी भी की। आज उस के पति जीवित नहीं हैं

बीच में मैं अपने 13-14 वर्ष के अज्ञातवास में रही। (संभवतः) 2006 में वह एक दिन अचानक मेरे ई डी एम मॉल वाले शोरूम में मेरे सामने खड़ी थी। 'अरे मणिका, तू यहाँ?' वह अपने पति की साइड की किसी महिला के साथ थी। सफ़ेद लिबास में थी। उसके पति का निधन हो चुका था। मैं शोक मनाने भी नहीं गई थी क्योंकि मैं उन दिनों स्वयं अपने मन के अँधेरों से जूझ रही थी इसलिए एकांतवास में थी। मैंने उस से बस इतना कहा, 'सॉरी यार, मैं नहीं आ सकी। क्या करती? मैं अपने में ही नहीं हूँ।'

'कोई बात नहीं। चल, अब अपना फोन नंबर दे।' फोन नंबर लिए-दिए गए। लेकिन उसके बाद न उसने मुझे फोन किया, न मैंने उसे।

2012 से मैं एक मानसिक उलझन से गुज़र रही थी। मुझे किसी से बात करने की ज़रुरत महसूस हो रही थी, किसी ऐसे से जिसकी सेंसिबिलिटी मेरी सेंसिबिलिटी से मेल खाती हो। मुझे अपनी पुरानी प्रिय सहेली का ख्याल आया और 2013 में मैंने उसे फोन किया। तो 'तू मेरे घर आ।' 'नहीं, तू पहले आ।' 'नहीं तू पहले।' मेरे घर से उसके घर की दूरी 25 कि मी है। मैंने कहा, 'मैं पहली बार बौबी के साथ आऊँगी। घर ढूंढना पडेगा न।' तो एक रविवार को मैं बेटे के साथ उसके घर गई। 'ओह हो, बौबी, तू इतना बड़ा हो गया ! '

उसका घर बेहद खूबसूरत। उसके तीन बेडरूम के घर की भव्य साज सज्जा थी, घर में एक सुन्दर छोटा सा बगीचा भी, बगीचे में फव्वारा, फव्वारे में मछलियाँ। बगीचे में लगी छतरी के नीचे रखी कुर्सियों पर हम बैठे। बस, फिर बातें ही बातें। उस का बात करने का अंदाज़ होता है एकदम दार्शनिक और मेरी बातों में होती हैं कहानियाँ। मैंने उसके अकेलेपन को महसूस किया और पूछा कि आगे के लिए क्या सोचा है? वह बोली, 'उन की यादों से बाहर नहीं निकल पाई हूँ।' उसके बाद मेरी और उस की बातों का मुख्य मुद्दा यह कि हम सन्यासी हैं। बहुत कम उम्र में हमसे जीवन के राग छूट गए।

वह मुझ पर रश्क करे और मैं उस पर।

'मणिका, यू आर लकी, यू हैव गॉट अ सन, यू हैव गॉट अ फैमिली।'

'ओह डियर, मुझे पुराने दिन याद आ रहे हैं जब मैं अकेली ऐसे ही ठाठ-बाट से रहा करती थी।'

पूरे ठाठ-बाट हों, अकेले रहने का मूड हो, फिर अकेलेपन में अफ़सोस हो कि हाय, यहाँ सब कुछ है, बस एक 'वो' नहीं है, यह सोच कर मन में करूण रस की उत्पत्ति हो, आँखों में आंसू हों, आंसुओं की धारों में चीखें हों, दीवारों से सिर फूटें, और फिर कविता-कहानी का जन्म हो। वाह वाह ! पूर्ण समर्थ स्त्री अकेली रहती है तो मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे ऐसी महिलाएं बहुत आकर्षित करती हैं जिन्हें पुरुष की ज़रुरत तो होती है पर वे किसी भी ऐरे-गैरे के साथ समझौता करके रहने की बजाय अकेली रहना बेहतर समझती हैं, जिनके लिए विवाह बुनियादी तौर पर ज़रूरी नहीं है, दुनियादारी नहीं है, जिन्हें इज्ज़त के लिए सिर के ऊपर किसी के आश्रय की छत की ज़रुरत नहीं है, जो पुरुष द्वारा पाली जाने की बजाय अपनी पसंद के पुरुष को पालने की हिम्मत रखती हैं। सच में यह स्थिति वाह वाह है !

बौबी ने उससे कहा, 'दी, हम इसी रास्ते से आपके घर के आगे से होकर आगरा जाते हैं।'

'ठीक है, अगली बार मुझे भी साथ ले लेना। मैं अपनी गाड़ी में .... अब बौबी, तुम ऐसा करो कि मम्मी को यहाँ छोड़ जाओ, हमें बहुत सारी बातें करनी हैं, पिछले 15 सालों की कहानियाँ कहनी-सुननी हैं।'

लेकिन वैसा संभव नहीं हुआ। 'फिर किसी और दिन मम्मी खुद आ जाएंगी,' बौबी ने कहा। उसके घर से निकल कर कार में बैठते ही बौबी बोला, 'उफ़, कितना बोलती हैं, दी? और आप भी मॉम। कमाल है, आप दोनों अपने को सन्यासिन कह रही थीं. सन्यासी लोग इतना नहीं बोलते।'

'हम सन्यासी इन अर्थों में हैं बेटा कि देखो, हमें बहुत भूख लगी है, हमारे सामने अच्छे-अच्छे व्यंजन रखे हुए हैं, फिर भी हम नहीं खाते, हमें कोई लालच नहीं।'

'ओह्हो तो खालो न, किसने मना किया है? वॉट अ बिग डील।'

'हमारी अंतरात्मा रोकती है। हम संयमी हैं। इस प्रकार हम अपने भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचयन करते हैं।'

'जब यह चुनाव आपका अपना ही है, फिर यह अफ़सोस किसलिए?'

'अफ़सोस इसलिए कि अफ़सोस से हमारे अन्दर साहित्य का जन्म होता है।'

'क्या बात है, मॉम, क्या बात है। चित भी अपनी, पट भी अपनी?'

उसके बाद से मेरे और उस के बीच फिर से पुरानी मित्रता नए सिरे से शुरू हुई। हम घंटों फोन पर लगे रहते। हमारी रूचि के कुछ कॉमन विषय हैं। मुख्य विषय है ज्योतिष शास्त्र। उसका कहना है, 'मणिका, तू जो इतने साल अज्ञातवास में रही, इसका कारण उस समय तेरी शनि की महादशा थी। और उसके बाद जो तूने त्वरित गति से दो महीने में 100 कवितायेँ लिख मारीं, उस समय तेरी बुध की महादशा थी।' मैंने उसे कहा, 'तू ही एक दिन आजा।' बोली, 'नहीं, मेरी शनि की महादशा चल रही है। शनि परिवार में जाने से रोकता है। आना तो तुझे ही पडेगा।'

हमारी रूचि का दूसरा मुख्य विषय होता है, बार-बार जिए-मरे रिश्तों की पड़ताल करना यानि बाल की खाल निकालना यानि एक ही चीज़ को बार-बार उधेड़ना और फिर बुनना। इससे हम में ज़िन्दगी को समझने की एक सूक्ष्म दृष्टि पैदा होती है।

तीसरा विषय है, अपना-अपना लिखा हुआ सुनाना, उस लिखने के पीछे की रचना प्रक्रिया बताना, उस पर मंतव्य देना और साथ ही यह भी खोजना कि वह रचना-विशेष किस पर लिखी और क्यों लिखी गई?

सच, सहेलियां कितनी ज़रूरी होती हैं। हमारा एक-दूसरे के घर रात-रात भर जाग कर बातें करने का सिलसिला जल्दी ही शुरू होना चाहिए, मैं सोचा करती.


उसके बाद बस एक ही दिन हम मिले, या यूँ कहिए कि मिल पाए. जीवन की आपाधापी में कहाँ है अब इतना समय? दोस्तियों के लिए भी एक उम्र होती है. बहुत उल्लास भरा था वह दिन और थकावट भरा भी. स्पाइस मॉल, नॉएडा में पहले उसकी शौपिंग हुई, फिर वह बोली, 'चलो कहीं ऐसी जगह बैठा जाए जहाँ शोर न हो.'



मैं : फ़ूड कोर्ट इस समय खाली होता है,

पर नहीं, वहां भीड़ थी और शोरशराबा भी.

मैं : कौस्टा कॉफी में बैठते हैं.

वह : पर यहाँ खाने को कुछ नमकीन तो है ही नहीं। मुझे भूख लगी है.

मैं : चल, फिर पिजा हट में बैठते हैं.

पिजा हट खाली पड़ा था, कभी यह सीट, कभी वह सीट.

मैं : यहाँ इतनी गर्मी क्यों है?

वह : उठो, हल्दीराम में बैठेंगे।

मैं : आखिर आ गए न अपनी औकात पर? अब हमारी इतनी औकात तो हो गई है कि हम किसी बढ़िया रेस्टॉरेंट में बैठ सकें.

वह : फिर कभी.

मैं : तुम्हारा वह लेख, जो तुमने मुझे मेल किया था और जो तुमने अगले एक सेमीनार में पढ़ना है. बहुत बढ़िया है. मेरे लिए तुम्हारा यह रूप नया है कि तुमने बौद्ध धर्म ग्रहण किया हुआ है. आखिरी पोर्शन भी बढ़िया है, अनौपचारिक…. बीच में उद्धृत किसी के कविता-अंश बहुत ही प्रभावशाली हैं, 'क्या करना दुःख उसके लिए जिसका कोई उपाय नहीं। क्या करना दुःख उसके लिए जिसका कोई उपाय है.' बहुत खूब. 'यह उतना ही खाली है, जितना जीवन।' यह भाव मैं अपनी कविता में इस्तेमाल करूँगी, अपनी तरह से क्योंकि जीवन के खालीपन का अहसास मुझे बेहद हो रहा है.

वह : मणिका, तुम हमेशा गलत दरवाज़ा क्यों खटखटाती हो?

मैं : आर यू श्योर कि तुमने सही दरवाज़ा खटखटाया था?

वह : वेरी श्योर, और मैं आजतक उसी दरवाज़े के भीतर हूँ.

मैं : लेकिन तुम्हारा यह एक अन्य लेख….  मन की गहराई में दबा दर्द जैसे छन कर आया है. बहुत गहन भावाभिव्यक्ति है. दर्द बड़ी सूक्ष्मता से संवेदित हुआ है.

वह : मणिका, तुमने खुद कहा था कि प्यार का दर्द भी प्यार ही होता है, प्यार का विरह भी प्यार ही होता है, प्यार में लड़ाई-झगड़ा भी प्यार ही होता है….

मैं : हाँ, किसी ने किसी से कहा था, उसने मुझसे कहा, मैंने तुमसे कहा…

बातों-बातों में मटर कुलचा और भल्ला पापड़ी चाट खा लिए गए थे.

वह : अब और क्या खाना है? रसमलाई?

मैं : नहीं, कुल्फी फलूदा।

वह : गुड आइडिया। तू बैठ, मैं लेकर आती हूँ. 

हल्दीराम में यही दुःख है, खुद पर्ची कटाओ, खुद खाना उठा कर लाओ. खाना बढ़िया है, पर बैठ कर खाने का सुख नहीं है.

मैं : यार, अब तक तो हमारी हैसियत इतनी हो जानी चाहिए कि हमें खुद न सर्व करना पड़े.

वह : राइट यू आर. देअर इज ऑलवेज़ अ नेक्स्ट टाइम।

मैं : यहाँ ऊपर एक नया रेस्तराँ खुला है, केवल लंच एंड डिनर होता है, बुफे विद अनलिमिटेड स्नैक्स, लगभग 1000 रु. पर-हेड. एक दिन वहां लंच करेंगे, मेरी तरफ से ट्रीट। एटलीस्ट, दिस मच आई कैन अफ़्फोर्ड।

वह : डन. अब बता, तेरी कहानी का क्या हुआ?

मैं : बीच में अटकी पड़ी है. स्टैगनेंट पौइंट आ गया.

वह : तो?

मैं : तो कुछ नहीं, सितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी इश्क के इम्तेहाँ और भी हैं….

वह : किसी ने अपनी सच्ची आत्मकथा लिखी होगी क्या? क्या कोई लिख सकता है?

मैं : मैं तो नहीं। शायद तू भी नहीं।

वह : मेरी तेरी बात नहीं ….

मैं : पर मात्र घटनाओं का, तथ्यों का बयान ही तो आत्मकथा नहीं होता। उन तथ्यों के पीछे से जो सत्य उभर कर सामने आता है, यानि जीवन में हम जो अनुभव करते हैं, उन अनुभवों का निचोड़ …. 

वह : तेरा मतलब है, आत्मकथा में पूरी कहानी सुनाने की ज़रुरत नहीं है?

मैं : नहीं, ओनली मॉरल ऑफ  स्टोरी इज सफ़िशिएन्ट।

वह : क्या बात है? चल अब घूमते हुए बात करते हैं. बैठे-बैठे थक गए.… मणिका, तू यह फेसबुक छोड़ दे. इसमें वक्त की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं।

मैं : बाहर देख, कितनी तेज़ बारिश हो रही है. तुझे दूर जाना है.

और हम अपनी-अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ गए.

वह उम्र मे छोटी थी पर दिमाग में, समझ में बड़ी. उसका अपनापा मुझे लम्बे अर्से तक मिला। एक अन्य घटना सुना इस कथा को अब समाप्त करती हूँ.

अनेक मित्र ऐसे हैं, जिनका स्नेह मुझे मिला और जिनके स्नेह की छाँह तले मैंने अपने जीवन के गर्दिश भरे दिन गुज़ारे। आज वो सब, पता नहीं, कहाँ हैं. आज मुझे इस बात का भी गर्व है कि मेरा कोई दुश्मन नहीं है। मुझे नापसंद करने वाले कुछ दिलजले ज़रूर हो सकते हैं। पर जी, मेरे मित्रों का जवाब नहीं था। सिर्फ एक किस्सा सुनाना चाहती हूँ जो मेरी इस बात की गवाही देगा। इस किस्से में मेरी यह सखी भी है.
मैं अपने पुत्र का जन्मदिन अवश्य मनाती थी। वह चाहे हमेशा हॉस्टल में रहा, पढ़ा, लेकिन उसका जन्मदिन गर्मी की छुट्टियों में पड़ने के कारण उस दिन वह मेरे पास होता था। सारे मित्रों को मालूम रहता था और उस दिन आने के लिए पहले से ही पूछताछ शुरू हो जाती थी। तो हुआ यह कि एक बार मैंने जन्मदिन पर किसी को भी न बुलाने का फैसला किया। क्यों किया, आज याद नहीं, शायद उदासी रही होगी।

उस वर्ष उस दिन अपने आप एक मित्र आए, 'कहाँ है बॉबी?' एक सहेली आई केक लेकर। एक अन्य मित्र आए हाथ में कुछ पकडे हुए। फिर एक और। फिर एक और। फिर एक और।
'तुमने इस बार मनाया क्यों नहीं?'
'बस ऐसे ही।'
'अब ऐसा करो कि जल्दी से मटर-चावल बना लो। हमें कुछ तो खिलाओगी?'
मैं हैरान। बॉबी खुश। मित्र-मित्राणि आपसी गप्पों में मग्न।
अंत में जब केक काटा जा रहा था, तब इस प्रिय सखी का आगमन हुआ, छोटी उम्र की बड़ी लड़की का. आक्रोश में तनी हुई, 'अच्छा, सब को बुलाया, मुझे ही नहीं बुलाया?'
'किसी को नहीं बुलाया यार, सब अपने आप आए है।'
'झूठ। केक भी है, समोसे और गुलाबजामुन भी हैं, पुलाव भी है। मणिका, तूने मुझे भूलने की हिम्मत कैसे की?'
'कोई समझाओ इसे। मैंने सिर्फ पुलाव बनाया है। बाकी चीज़ें ये सब लोग लाए हैं। एक तू ही है जो खाली हाथ आई है।'
उसने पर्स से लिफाफा निकाला और बॉबी को पकड़ाते हुए बोली, 'खबरदार, जो मम्मी को दिया तो।'
तो ऐसे दोस्तों पर कौन ना मर जाए खुदा, पत्थर भी मारते है फूलों में लपेट कर।

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