Sunday, 24 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 6 चोरी और सीनाज़ोरी

आम आदमी की ख़ास कहानी : 6
चोरी और सीनाज़ोरी

मेरी दुकान में चोरी करने वाले एक कर्मचारी की कहानी सुना रही हूँ. यह चोर भी सच में बड़ा अजब-गज़ब था. हेकड़ी देखिए, 'मैं तो जी चोर हूँ, हाँ, मैंने आपकी दुकान में चोरियाँ की हैं, जो करना है, कर लीजिए.' अब सुनिए कथा शुरू से.

मेरा एक कर्मचारी मेरे नाम एक चिट्ठी छोड़ गया कि अगले दिन से वह काम पर नहीं आएगा। उस चिट्ठी में उसने मेरी भरपूर तारीफें कीं और लिखा कि मैं उसे फोन न करूँ क्योंकि वह अपनी सिम नष्ट कर रहा है। मैंने तुरंत उसका फोन मिलाया पर मिला नहीं। मैंने सोचा, ठीक है, चला गया सो चला गया।

दो-चार दिन के बाद कुछ भयंकर चोरियाँ सामने आईं। मैंने उसका आवेदन पत्र देखा तो उसने एक दूसरा मोबाइल नम्बर भी दिया हुआ था। मैंने उस पर सदेश भेजा, 'भाई, तुम इतना चोरों की तरह क्यों गए? अब जो चीज़ें नहीं मिल रहीं, उनके लिए क्या मैं तुम्हारी पुलिस में रिपोर्ट करूँ?'

उसका उत्तर (एसएमएस) आया, 'मैडम, मैं पहले भी दो बार जेल जा चुका हूँ। मैं एक चोर हूँ पर मैंने आपके यहाँ कोई बड़ी चोरी नहीं की, क्योंकि आप बहुत अच्छी है, वर्कर्स का बहुत ख्याल रखती हैं, खुद पूछती हैं कि एडवांस तो नहीं चाहिए। दूसरे, शोरुम में कभी आती नहीं।'

(हे राम, मैंने चोर को चाबियाँ पकड़ाई हुई थी।)

'आपने ही तो कहा था कि आपके पास समुद्र है.'

(कमबख्त, पैसों का नहीं, शोरुम में चीज़ों का)

'इसमें से कोई दो-चार बूँद ले भी लेगा तो आपको फर्क नहीं पड़ेगा।'

(तुच्छ, यह भी तो कहा था कि उससे लेने वाले का इतना भला नहीं होगा जितना उसे चोरी का पाप लगेगा। पर चोरों को पाप की क्या परवाह?)

'मैंने जो भी आवेदन पत्र में लिखा था, वह सब झूठ था, मेरा पता, परिचय, सब। यहाँ तक कि मेरा नाम भी। मेरे पास बहुत सारे मोबाइल नंबर हैं, जो मैंने दूसरों की आई डी पर लिए हुए हैं। कोई मुझे ढूंढ नहीं सकता।'

मैंने तुरंत जवाब दिया, 'भई तुम ग्रेट हो। तुम तो एक कहानी के मसाले हो। अपने बारे में यूँ ही लिखते रहो। जब तुम इतने निडर हो तो यह भी बताओ कि मेरे समुद्र में से तुमने कितनी बूँदें चुराई हैं? और फिर तुम नौकरी छोड़ कर क्यों गए?'

उसने उत्तर दिया, 'कुछ ख़ास नहीं। मैंने आपको ज्यादा नुक्सान नहीं पहुँचाया। मैं तो बस यह करता था कि आपका लिखा हुआ दाम हटा कर कस्टमर को ज्यादा बताता था और ऊपर के पैसे खुद रखता था।'

(निकृष्ट, तूने मेरी दुकान के कस्टमर बिगाड़ दिए।)

'नौकरी मैंने इसलिए छोड़ी, क्योंकि दूसरे कर्मचारियों के कारण ज्यादा खाने का मौका नहीं मिल रहा था। फिर न इतने कस्टमर आते हैं, न इतनी सेल है। मैडम, अब मैं यह सिम फ़ेंक रहा हूँ। आपके आशीर्वाद से अब मैं दूसरी नौकरी ढूंढूंगा।'

मैंने उसे आखिरी एसएमएस किया, 'मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है पर मैं तुम्हारे ये सारे एसएमएस पुलिस को दे रही हूँ। तुम्हारा बुरा नहीं चाह रही, बस यह देखने के लिए कि पुलिस तुम्हें खोज पाती है या नहीं।'

किस्सा ख़त्म हुआ लेकिन मैंने जैसा उसे लिखा था, वैसा नहीं किया। मैं ठहरी रहमदिल. वैसे भी व्यर्थ में पुलिस के चक्कर लगाने का क्या लाभ था? पुत्र कहता ही है, 'मॉम, थोड़ी बहुत चोरियाँ तो आप इनकी तनख्वाह में शामिल समझें.' समझ लीं जी. दस मैं दे रही थी, इतना ही ऊपर से कमा रहा होगा. और फिर शिकायत कैसी? और किससे? मुझे भी तो कमा कर दे ही रहा था. ओह्हो ! मैं क्या चोर को सपोर्ट कर रही हूँ? मन को समझाने के लिए मन कैसे-कैसे स्वांग रचता है, यह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है?

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