Sunday, 24 April 2016

आम आदमी की ख़ास कहानी : 7 क्वचिदम् कुमाता भवति

आम आदमी की ख़ास कहानी : 7

क्वचिदम् कुमाता भवति

अपने एक निकट सम्बन्धी के बारे में बता रही हूँ, इतने निकट कि यदि उन्होंने यह पढ़ लिया तो परिवार में उधम मच सकता है कि अच्छा, मैं इनके बारे ऐसे विचार रखती हूँ? लोग गलत होते हैं पर उन्हें अपनी गलती का आभास नहीं होता क्योंकि वे वैसा करते हैं जो उनका मन चाहता है, वैसा नहीं जो करना चाहिए, जैसा करना चाहिए. यानि ये इस किस्म के लोग होते हैं जिनकी हाँ में हाँ मिलाई जाए तो ये खुश रहते हैं, ज़रा उनकी आलोचना की नहीं कि ये रिश्ते तक तोड़ने को तैयार हो जाते हैं. ये किसी की खुशामद नहीं करते, पर इन्हें खुशामदी लोग पसंद हैं. ये समझते हैं कि ये हर हाल में सही ही हैं और कोई उन्हें गलत न कहे. अब सुनिए, ऐसी ही एक लड़की का कथा-पुराण.

एक लड़की ने प्रेम-विवाह किया. चूँकि लड़का-लड़की दोनों आईटी इंडस्ट्री से जुड़े थे, अतः शादी के बाद अमेरिका में नौकरी मिली तो वहाँ चले गए. लड़के के घरवाले इस विवाह से खुश नहीं थे. उनका एकलौता बेटा था, शायद कुछ और सोच कर रखा हो, लड़की बहुत महत्वाकांक्षी थी, दोनों का लाखों का पैकेज था. लड़का उसके मुकाबले एकदम सीधा संत समान था.

लड़की ने अमेरिका पहुँचते ही अपने माँ-बाप-भाई-बहन को टिकट भेजा और महीना भर अपने पास रखा. लड़की ने अपने पैसे खर्च करके अपने मायके वालों को टिकट भेज अमेरिका में घुमाया. उसके बाद लड़के ने अपने घरवालों को. अच्छी नौकरी वाली बहुत सी लडकियाँ जब कमाती हैं तो शायद पहले ही पति से तय कर लेती हैं कि वे अपनी तनख्वाह अपने माता-पिता के घर पर खर्च करेंगी। चलो, जो भी हो, जैसे भी दो लोग खुश रहें। दोनों फिलहाल खुश थे लेकिन स्वार्थी लोगों के लिए ख़ुशी कितनी देर की?

लड़की एक साल के भीतर गर्भवती हुई, लड़के की माँ डिलिवरी के लिए अमेरिका गई और एक महीना रह कर आ गई. लड़की ने बेटे को जन्म दिया. लड़की की माँ को बस अमेरिका घूमने से मतलब था, बेटी के बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने से नहीं। अमेरिका में नौकर की समस्या। लड़के ने लड़की से कहा, 'बेटे के थोड़ा बड़ा होने तक तुम नौकरी छोड़ दो, क्योंकि बाद में भी नौकरी मिल ही जानी है.' लड़की ने कहा, 'नहीं, नौकरी तुम छोडो। मैं नौकरी नहीं छोड़ूँगी। बेटा तुम्हारा भी है, तुम भी ज़िम्मेदारी उठाओ।' अब बच्चे को पालना भी ज़रूरी था. लड़के ने नौकरी छोड़ दी और बेबी सिटिंग करने लगा. तब उसे ख्याल आया कि क्यों ना बेटे को भारत ननिहाल या ददिहाल भेज दिया जाए. लड़की ने कहा, 'मेरी माँ नहीं सँभाल पाएगी, अपने घर भेज दो.' लड़का बेटे को अपने घर अपनी माँ की निगरानी में छोड़ने चला गया. दादी ने पोते को ख़ुशी से अपना लिया। अब कुछ दिन यहाँ रुकना ही था. तो उसे अपने देश में एक अच्छी नौकरी का ऑफर मिला। कंप्यूटर वालों को नौकरियों की क्या कमी? उसने यहाँ ज्वाइन कर लिया। लड़की वहाँ अकेली खुश. दुखी होने का टाइम ही कहाँ?

एक दिन लड़के की माँ मुझसे मिलने आई और बोली, 'हम तो ऐसे फँस गए, आखिर क्या करें? न इधर के रहे, न उधर के रहे. ऐसी लड़की के साथ कैसे निभे जो अपना बच्चा तक सँभालने को राजी नहीं?'

चूँकि मैं फैसले तुरत-फुरत करती हूँ इसलिए मैंने उनसे सीधा ही कह दिया, 'बेटे को तलाक दिलवा कर उसकी दूसरी शादी कर दो.'

शायद वह पहले ही ऐसा सोचे बैठी थीं, और शायद उनके घर में भी ऐसी बात पहले हो चुकी थी, इसलिए उन्हें मेरी बात अच्छी लगी. उन्होनें मुझे गले से लगाया और विदा ली.

ये दोनों मेरे अच्छे परिचित थे, इसलिए मैं दोनों की ही भलाई में. पर पता नहीं कैसे, मेरे मुँह से कभी-कभी भविष्यवाणी हो जाती है जो सच निकलती है. वह लड़का शादी से पहले किसी काम से हमारे घर आया था, तो मैंने अपने बेटे से कहा था, 'अभी यह लड़का नींद में है, जिस दिन इसकी आँख खुलेगी, यह इस लड़की से अलग हो जाएगा.' और वही हुआ. अलग होने का निर्णय लड़के ने लिया. असल में कुछ लड़कियों को पति एक एडिशनल कम्फर्ट की तरह चाहिए होता है, जो हर समय दुम हिलाता उनके आगे-पीछे घूमे.

फिर लड़की भारत आई, आपसी रज़ामंदी से तलाक हुआ, बेटे की कस्टडी पिता को मिली, महीने में एक बार माँ से मिलने की इजाज़त के साथ, जिसके लिए लड़की ने कोई ऐतराज़ नहीं किया।

अब मैं तो दोनों तरफ की थी, इसलिए मैंने लड़की को समझाया, 'बेटे की कस्टडी तुम लो, बेटा ज़िन्दगी में बड़ा काम आता है, तुम खुशनसीब हो कि तुम्हारे बेटा है, तुम उसे लेने की कोशिश क्यों नहीं करतीं?'

उसका तुरंत उत्तर मिला, 'अरे नहीं आंटी, मैं नौकरी करूँगी या बेटा सम्भालूँगी? मेरे लिए यह ज़्यादा कन्वीनिएंट है कि मैं महीने में एक बार बेटे से मिल लिया करूँगी।'

लानत है तुझ पर, मैंने मन ही मन उसे गाली दी.

वह तलाक के बाद एकाध बार ही बेटे से मिल पाई. एक तो हर महीने अमेरिका से यहाँ आना मुश्किल, दूसरे, धीरे-धीरे बेटे ने मिलने से इंकार कर दिया, बड़ा जो हो रहा था.

जिसके पास बच्चा रहता है, उसी से मोह होता है. अगर कोई यह सोचे कि सिर्फ इस नाम से कि फलाँ मेरा पिता है या फलाँ मेरी माता है, बच्चों के दिल में मोह जागेगा, तो ऐसा नहीं होता. बच्चे भी बड़े उस्ताद होते हैं, उन्हें अपने अंतर्ज्ञान से पता चल जाता है कि किसने हमारे लिए क्या किया? किसने हमारे लिए सही अर्थों में त्याग किया? फिर बच्चे उसी की तरफ जाते हैं.

मैंने सोचा था, कई स्त्रियाँ तन से बाँझ होती हैं, कई मन से. ऐसी कुमाता को क्या कहेंगे? वाकई, हर बच्चे की माता कुमाता नहीं होती. कुछ अपने बच्चों के लिए अपना सारा जीवन दाँव पर लगा देती हैं. नौकरी तो चीज़ क्या? कुमाता हर रोज़ हर घर में देखने को नहीं मिलती, कभी-कभार ही कोई माता कुमाता होती है.


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