Tuesday, 17 May 2016

वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे

वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे
(बिना किसी उत्सव के)

गाँधी मुझे शुरू से प्रिय थे लेकिन धीरे-धीरे उनके प्रति मेरे मन में आदर और घृणा का मिश्रित भाव पनपने लगा। सामान्य ब्यक्ति की भाँति उनमें भी वासनात्मक दोष थे। जो उन्होंने ब्रह्मचर्य के प्रयोग किए और जो आचरण अपनी पोती मनु के साथ किया, उन सबके कारण मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी। वे आज के ज़माने में होते तो इन कारणों के ज़ाहिर होने से निश्चित रूप से सलाखों के पीछे होते। लेकिन इस सब के बावजूद वे मुझे प्रिय हैं। इसका कारण शायद यह है कि आज़ादी मिलने और उसके तुरंत पश्चात् उनकी हत्या होने के बाद उनकी जो नायक-छवि बनी, वह मानस मन पर अपनी छाप छोड़ने में सक्षम थी।
मैं यहाँ बात उनकी बुराई की नहीं, बल्कि अच्छाई की बात कर रही हूँ। वे व्यसन के खिलाफ थे और देश के हित में थे।.
गाँधी जी के पत्रों से गाँधी जी के उच्च विचारों का पता चलता है. उन्होंने अपने बेटे हरिलाल के अनुचित व्यवहार के बारे में उसे लिखा था, 'तुमको पता होना चाहिए कि तुम्हारी समस्या मेरे लिए हमारे देश की स्वतन्त्रता से भी अधिक मुश्किल हो गई है.'
हरिलाल गाँधी पढ़ाई के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे ताकि वे की तरह बैरिस्टर बन सकें। लेकिन महात्मा गाँधी ने इसका विरोध किया था और कहा था कि पश्चिमी शिक्षा ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष में मददगार नहीं हो सकती।
एक अन्य पत्र में उन्होंने पुत्र को लिखा, 'कृपया मुझे पूर्ण सचाई बताओ कि क्या तुम्हारी अभी भी शराब और व्यसन में रुचि है? मेरी कामना है कि किसी भी तरह से शराब का सहारा लेने की बजाय अच्छा है, तुम मर जाओ.'
आज से लगभग 80-90 वर्ष पूर्व उन्होंने महिलाओं की आज़ादी की बात भी की थी और इस तरह मानो स्त्री-विमर्श की शुरुआत कर दी थी
विजय लक्ष्मी पंडित को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा है, 'महिलाओं ने हमसे कहीं अधिक काम किया है. अभी भी कुछ करना बाकी है. मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि वे अभी और आगे जाएँगी।'
मुझे पता है कि गाँधी के नाम पर भड़कने वालों की कमी नहीं. हर पाठक को इजाज़त है कि इस पोस्ट पर अपने विचारों का वमन करे.


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