Thursday, 5 May 2016

Gazal 48

ग़ज़ल 48

यह ग़ज़ल कहने में कुछ ऐसी अदा है
ऐसे कानों में पड़ी आवाज़ जैसे तुम यहीं हो.

हर तरफ पसरी हुई है बेसबब सी खामोशी
सुन रही हूँ पर तुम्हें दिन-रात जैसे तुम यहीं हो.

एक महका सा ख्याल, एक बहकी सी महक
तुमने कुछ मुझसे कहा ऐसे कि जैसे तुम यहीं हो.

युग हुए इस बात को जब शाख से टूटी थी मैं
पर जड़ें ऐसे सुरक्षित हैं कि जैसे तुम यहीं हो.

सब बिना आँधी के झर-झर झर गया हैरान हूँ
पर मुझे है याद सब कुछ याद जैसे तुम यहीं हो.

मैं लिखूँगी फूल-पत्तों पर तुम्हारा नाम ऐसे
मैं रचूँगी प्रेम की गीता कि जैसे तुम यहीं हो.

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