Saturday, 18 June 2016

गाँधी जी के तीन बन्दर

गाँधी जी के तीन बन्दर

गाँधी जी के तीन बन्दर यूँ तो सही सन्देश देते हैं कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो लेकिन देखा जाए तो, तीसरी बात ही हमारे बस में है यानि बुरा मत बोलो। बुरा मत देखो और बुरा मत सुनो से हम अपना बचाव कैसे कर सकते हैं? अगर हमारी आँखों के सामने कुछ बुरा घट रहा है या बुराई हमारे कानों पर दस्तक दे रही है तो हम आँखें और कान कैसे बन्द कर सकते हैं? हम उस बुरे को देखने और सुनने के लिए विवश हैं, या यूँ कहें कि अभिषप्त हैं। इसका दूसरा पहलु यह है कि बुरे को देख-सुन कर आँखें और कान बन्द करने की बजाय हम चौकन्ने रहें और उस बुराई को ख़त्म करने के बारे में विचार करें, प्रयास करें। पता नहीं, गाँधी जी ने यह क्यों नहीं सोचा?

क्या आप जानते है कि गाँधी जी के ये तीन बंदर कहाँ से आए थे। ये मूलत: चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के थे और आठवीं शताब्दी में ये चीन से जापान में आए। उस समय जापान में शिंटो संप्रदाय का बोलबाला था। शिंटो संप्रदाय में बंदरों को काफी सम्मान दिया जाता है। गांधीजी के ने ये तीन बंदर जापानी संस्कृति से लिए थे. वर्ष 1617 में जापान के निक्को स्थि‍त तोगोशु की बनाई गई इस समाधि पर ये तीनों बंदर उत्कीर्ण हैं। ये बंदर जिन सिद्धांतों की ओर इशारा करते हैं, वे बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न बोलो को दर्शाते हैं। शायद इसीलिए इस विचारधारा को बंदरों का प्रतीक दे दिया गया। यह यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल है।

जापान में एक को मिजारू, जिसने दोनों हाथों से आंखें बंद कर रखी हैं, जो बुरा नहीं देखता, दूसरे को किकाजारू, जिसने दोनों हाथों से कान बंद कर रखे हैं, जो बुरा नहीं सुनता और तीसरे को इवाजारू, जिसने दोनों हाथों से मुंह बंद कर रखा है, जो बुरा नहीं कहता, नाम दिए गए हैं. वहाँ पर इन्हें 'बुद्धिमान बंदर' माना जाता है।

गाँधी जी के तीन बन्दर यूँ तो सही सन्देश देते हैं कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो लेकिन देखा जाए तो, तीसरी बात ही हमारे बस में है यानि बुरा मत बोलो। बुरा मत देखो और बुरा मत सुनो से हम अपना बचाव कैसे कर सकते हैं? अगर हमारी आँखों के सामने कुछ बुरा घट रहा है या बुराई हमारे कानों पर दस्तक दे रही है तो हम आँखें और कान कैसे बन्द कर सकते हैं? हम उस बुरे को देखने और सुनने के लिए विवश हैं, या यूँ कहें कि अभिषप्त हैं। इसका दूसरा पहलु यह है कि बुरे को देख-सुन कर आँखें और कान बन्द करने की बजाय हम चौकन्ने रहें और उस बुराई को ख़त्म करने के बारे में विचार करें, प्रयास करें। पता नहीं, गाँधी जी ने यह क्यों नहीं सोचा?


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