Saturday, 4 June 2016

निखिलेश त्रिवेदी : कान्हा सफ़ारी

निखिलेश त्रिवेदी : कान्हा सफ़ारी

कई बार कोई अनजान व्यक्ति अप्रत्याशित रूप से हमारी मदद करता है, हमारे काम आता है तो हम यह सोचने पर बाध्य हो जाते हैं कि दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है, यार। भले लोग अभी भी हैं यहाँ।

कान्हा सफ़ारी देखने के लिए 6 महीने पहले इंटरनेट पर बुकिंग हो जाती है। बहुत कम टिकट बचते हैं जो तुरंत आए सैलानियों को 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर मुहैया कराए जाते हैं। हमारा कान्हा जाने का कार्यक्रम एक माह पूर्व बना था। सोचा, जा रहे हैं तो कान्हा के जंगलों में शेर ज़रूर देख पाएँगे। लेकिन वहाँ पहुँच कर जो स्थिति पता चली, उससे हमें लग गया कि जैसे अमृतसर जाकर हम वाघा बॉर्डर के भीतर जाए बिना, सिर्फ बाहर से छू कर लौट आए थे, वैसे ही कान्हा आकर भी हम सफ़ारी का आनंद नहीं ले पाएँगे।

कान्हा आने से 4-5 दिन पहले फेसबुक मित्र निखिलेश त्रिवेदी ने हिरन के सींगों से बने कान्हा-गेट के चित्र के साथ पोस्ट डाली थी जिसे मैंने शेयर किया था। मैं उन्हें कमेंट के माध्यम से भी अच्छी तरह नहीं जानती थी क्योंकि वे कभी-कभार मेरी पोस्ट पर आते थे और मुझे तो शायद ही कभी उनकी पोस्ट नज़र आई हो। कहने का अभिप्राय यह कि बस, मुझे सिर्फ इतना पता था कि इस नाम का व्यक्ति मेरा फेसबुक मित्र है और संयोग से उस जगह के बारे में लिखी उनकी पोस्ट मुझे दिखी है, जहाँ हम दो दिन के बाद जा रहे थे।

जब लगा, कान्हा आना बेकार हो गया तो मैंने निखिलेश त्रिवेदी को मैसेज दिया कि 'आपने जिस सुन्दर गेट की तस्वीर दिखाई थी, कान्हा आकर भी उसे देखना हमारे नसीब में नहीं। हम यहाँ से वैसे ही वापस लौटेंगे जैसे अमृतसर से वाघा बॉर्डर देखे बिना लौटे थे।' मुझे इतना मालूम था कि वे वन विभाग से जुड़े हुए हैं। सुबह से रात हो गई पर उन्होंने मेरा मैसेज नहीं देखा। बॉबी बोला, 'मैं समझ रहा था, इनसे आपकी रेगुलर मैसेज में बात होती होगी। पर अब आप कह रही हैं कि आपने पहले कभी इनसे बात ही नहीं की। पोस्ट पर भी नहीं, तो इस तरह एकाएक अपनी समस्या लिख देना उचित नहीं है।' मैंने उनकी प्रोफ़ाइल खोल के देखी तो जाना कि वे 2013 से मित्र हैं। बहरहाल रात को नौ बजे के लगभग जवाब आया, 'मैं कुछ करता हूँ।' मैंने उन्हें अपना फोन नम्बर दिया क्योंकि अगले दो दिन ही हमारे पास शेष थे। रात दस बजे के लगभग निखिलेश जी का फोन आया कि अगली सुबह सात बजे के लिए हमारा काम हो गया है।

निखिलेश जी ने फोन पर जो बताया, वह यह कि वे उसी दिन Corbett National Park गए थे, 5 दिन के मनोरंजन टूर पर। जाते ही उन्हें अपनी भाभी की मृत्यु का समाचार मिला और वे उसी शाम को अनारक्षित ट्रेन से वापस चल दिए। ट्रेन में मुश्किल से नेटवर्क मिला तो उन्होंने मेरा मैसेज पढ़ा और जवाब दिया। उन्होंने ट्रेन से ही अपने किसी परिचित अधिकारी को कह कर काम करा दिया। मेरा काम करा देने के बाद ही उन्होंने मुझे यह सब बताया अन्यथा मैं उन्हें मना ही कर देती। सच, ऐसे भले इंसान की मैं कल्पना नहीं कर सकती थी, जिससे जान न पहचान, फिर भी उन्होंने अपनी दुखद परिस्थितियों में भी इतना सहयोग किया। उनकी तारीफ़ करूँ या इसे अपना सौभाग्य कहूँ कि मुझे हमेशा अच्छे लोग मिले।


No comments:

Post a Comment