Sunday, 5 June 2016

जीना है मुझे अब सिर्फ़ अपने लिए Kavita 255

जीना है मुझे अब सिर्फ़ अपने लिए

आसपास पसरी हुई हैं चुप्पियाँ
मुझे चाहिए ढेर सारा शोर
जो सोए हुए फूल-पत्तों को जगा दे
बंजर में आग लगा दे
मुर्दों में हलचल मचा दे।
और मैं लिखूँ कहानी का नया उपसंहार।

बेजान शब्दों को कविताओं में बदल दूँ
रोक दूँ उल्टी दिशा में बह रही हवाओं का रुख
हर आहट कुछ अजीब ढंग से चौंका देती है
रातों की नींद बदल जाती है चिन्ता और चिन्तन में
सपने पास आने से घबराते हैं
बैसाखियाँ छूट जाती हैं हाथों से।

छठी इन्द्रिय का जाग जाना अच्छा नहीं होता
हर चीज़ अपनी कुरूपता में नज़र आती है।
मंद मौत की तरह जीता है आदमी
जो दिखता नहीं है, वह होता तो है
जो होता है, वह दिखता क्यों नहीं?
अजीब सा ऊहापोह है।

फूँक मारूँ इस बुझती हुई चिंगारी में
हवा लाऊँ रुकती हुई साँसों के लिए
सजूं संवरू अपने ही चैतन्य के लिए
शोर भरूँ सन्नाटे में
चहकूँ, नाचूँ, मदमस्त हो जाऊँ
जीना है मुझे अब सिर्फ़ अपने लिए।

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