Sunday, 31 July 2016

ऐसे टाला मैंने विपत्ति को

ऐसे टाला मैंने विपत्ति को

मित्रों, आज मैंने सोचा, ज़रा खुद को ही सर्च करूँ. गूगल पर Manika Mohini टाइप करके सर्च किया तो भड़ास डॉट कॉम पर छपा अपना यह लेख देखा, जो 2013 में फेसबुक पर दिया था, लेकिन एक मित्र के इस सुझाव पर तुरंत हटा लिया था कि इस लेख से लोग तुम्हें ही बुरा कहेंगे. इस तुरंत जितनी देर में ही भड़ास ने इसे ले लिया. यह मेरे ब्लॉग में भी नहीं है. अब ब्लॉग में भी दे रही हूँ. मैंने इसे कोई शीर्षक नहीं दिया था, शीर्षक भड़ास ने दिया. आपके साथ शेयर कर रही हूँ. जब गूगल पर पब्लिक पढ़ रही है, तो आप मित्र क्यों नहीं पढ़ सकतेसकारात्मक रूप में लीजिएगा.


उस कामातुर मेहमान की मैंने यूं की मेहमानवाज़ी

Category विविध. Created on 04 December 2013  01.53
Written by मणिका मोहिनी 

Manika Mohini : मित्रों, रोज़ रेप की घटनाएं सुनने में आ रही हैं. इस सन्दर्भ में अपने निजी जीवन से जुडी एक घटना आप लोगों के साथ बांटना चाहती हूँ कि मैंने कैसे असामान्य परिस्थिति उत्पन्न होने पर प्रत्युत्पन्नमति से विपत्ति को टाला। हालांकि यह उदाहरण वर्तमान रेप के मामलों में बच कर निकलने में सहायक नहीं हो सकता लेकिन मेरी बात से शायद लड़कियों में कुछ जागरूकता या हौसला-अफजाई हो सके. मैंने एक लेखक के तौर पर अपना अनुभव बांटने के लिए अपने जीवन से जुडी इस घटना को अनावृत करने की हिम्मत जुटाई है. आशा है, आप इसे सकारात्मक रूप में लेंगे।
मैं शुरू से एकदम बिंदास किस्म की थी, जो जी में आए, करना, किसी से नहीं डरना, 'कोई हमारा क्या बिगाड़ लेगा', 'लड़कों की ऐसी की तैसी' टाइप। एक बार किसी कारणवश एक जान-पहचान का लड़का मेरे घर रात को ठहर गया कि उसका घर दूर होने से उसे रात में कोई वाहन नहीं मिल पाएगा, वह सुबह होते ही चला जाएगा। उस समय मेरा दो कमरे का घर था, जिसमें मैं और मेरा किशोर पुत्र रहते थे. मैंने उस मेहमान को बेड रूम में सो जाने के लिए कहा और मैं बालकनी में एक चारपाई पर बेटे के साथ सो गई. बालकनी की कुण्डी मैंने अपनी तरफ से लगा ली. आधी रात के बाद मैंने देखा कि वह मेहमान मेरी बालकनी का दरवाज़ा खटखट कर रहा है और बोल रहा है कि 'खोलो, खोलो, आओ ना.'

बालकनी के दरवाज़े में शीशा लगा हुआ था, इसलिए दोनों तरफ देखा जा सकता था. मैंने उसे कमरे में जाकर सो जाने के लिए कहा लेकिन वह दरवाज़ा खड़खड़ाता रहा और बोलता रहा, 'खोलो, आओ.' मैं पहले तो बहुत डर गई और समझ नहीं पाई कि क्या करूँ। आवाज़ सुन कर मेरा बच्चा बेटा कुनमुनाया लेकिन करवट बदल कर सो गया. अचानक मेरा दिमाग चला और मैंने उस मेहमान को बहुत कोमल आवाज़ में बड़े प्यार से कहा, 'ठीक है, तुम कमरे में जाकर बैठो, मैं आती हूँ.' उसे यकीन हो गया, वह चला गया. मैंने बालकनी का दरवाज़ा खोला और कमरे के दरवाज़े पर पहुंची। वह आराम से पलंग पर बैठा हुआ था, उसे पूरा यकीन था कि मेरे पास और कोई चारा नहीं है, मैं ज़रूर आऊंगी।

मैंने कमरे के बाहर खड़े होकर साहस जुटाया और कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया। मैंने सोचा, सुबह तक के लिए परेशानी ख़त्म हुई लेकिन उसके दिमाग पर फितूर सवार था. उसने अंदर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया। वह एक सरकारी आवासगृह था. मुझे डर लगा कि आसपास के लोगों ने सुन लिया तो बड़ी बदनामी होगी। मैं पहली मंज़िल का वह फ़्लैट बंद करके नीचे आई और उस आवासगृह के चौकीदार को लेकर वापस आई. चौकीदार ने कमरे का दरवाज़ा खोल कर उसे पीटना शुरू किया। तब तक हल्ला-गुल्ला सुन कर मेरा छोटा-सा बेटा भी जाग गया था.

मैंने बेटे से कहा, 'डंडा ला.' उसे डंडा नहीं मिला, उसने रसोई से झाड़ू लाकर मेरे हाथ में दे दी और मैंने भी उस मेहमान की मेहमाननवाज़ी की. चौकीदार ने उसी समय उसे मेरे घर और आवासगृह से बाहर निकाला। इस प्रकार अपनी प्रत्युत्पन्नमति के कारण मैंने एक अनचाही सिचुएशन से निजात पाई. लेकिन मैंने उसे इतने पर ही नहीं छोड़ा, अगले दिन अपनी सहेलियों और दोस्तों के साथ मिल कर साहित्य और नाटक के सर्कल में उसकी नाकाबंदी की कि वह कहीं भी दिखा तो उसकी खैर नहीं। मित्रों, यह पुलिस-कोर्ट-कचहरी की चेतना तो अब कुछ वर्षों से जागी है. मैंने अपने से जुड़े बहुत सारे मामले खुद निबटाए हैं.

मुझे मालूम है, अब बहुत से लोग मुझे समझाएंगे कि मुझे उसे अपने घर में शरण ही नहीं देनी चाहिए थी. पर-उपदेश घनेरे। बंधुओं, हममें मुश्किलों से निबटने की हिम्मत है, इस भवसागर में डूबने थोड़े ही आए हैं. फिलहाल इतना ही.
क्रिएटिव राइटर मणिका मोहिनी के फेसबुक वॉल से.

Cancer Celebration (कैंसर उत्सव)

Cancer Celebration (कैंसर उत्सव)

मैं सोचती हूँ, जो भी लोग कर्मशील है, अपने ध्येय के प्रति जागरूक एवं जुझारू हैं, वे अत्यंत जिजीविषा से भरे होते हैं. उन्हें लगता है कि वे जीवन में कुछ ख़ास करने के लिए आए है, जिसे पूरा करने के लिए उन्हें ज़िंदा रहना ही है. यही जीवन जीने की अदम्य लालसा उनके दुःख-दर्द को भी उत्सवी बना देती है.
मेरे परिवार में कैंसर से कई मौतें हो चुकी थीं, इसलिए 2007 में जब एक दिन ड्राइव करते हुए मेरा दायाँ हाथ स्टीयरिंग व्हील पर ही टिका रह गया, उठा ही नहीं तो मुझे तुरंत लगा कि हो न हो, इसकी वजह कैसर ही है. मैं अकेली धर्मशिला अस्पताल गई और डॉक्टर से कहा कि मेरी बाज़ू काट दो. मैं सोचती थी, अंग-भंग के बाद मुझे और तकलीफों से नहीं गुज़रना पड़ेगा। डॉक्टर ने कॉम्प्लिमेंट दिया, 'आप बहुत बहादुर है,' लेकिन फिर भी सारे टेस्ट करने को बोला।
अगले दिन बेटा रिपोर्ट लेने गया, टेस्ट पॉजिटिव थे, बेटे ने बताया कि रिपोर्ट देख कर वहीँ उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े. उसके अगले दिन ऑप्रेशन हुआ. बाज़ू नहीं कटा.
उसके बाद आठ बड़ी स्ट्रोंग कीमो लगीं, कीमो के दौरान मुँह में छाले, उल्टियाँ, सारा दिन बेहोशी. सिर पर हाथ लगाती तो बालों के गुच्छे हाथ में आ जाते. पार्लर से बाल काटने वाला घर बुलाया गया और पूरे सिर पर उस्तरा फिरवा दिया गया. सिर गंजा हो गया. लेकिन ज़रा सी हिम्मत होते ही खुद ड्राइव करके काम पर जाती थी, बेटे के मना करने के बावजूद।
उसके बाद पचास रेडियो थेरेपी, जल कर शरीर काला पड़ गया था. अभी भी हाथों पर जहाँ-तहाँ कालिख चिपटी हुई है. इतनी सुइयाँ घुपीं कि मैंने डॉक्टर से कहा कि कैंसर से मेरी मौत हो या न हो, इन इंजेक्शंस से ज़रूर हो जाएगी।
आखिरकार मैं ठीक हुई, 10 महीने बाद, डॉकटर के इस विश्वास के साथ कि "मौत तो सबकी होनी है लेकिन आपकी मौत कैंसर से नहीं होगी।"
काम पर जाना मैंने कभी नहीं छोड़ा. कई महीनों तक चलते हुए ऐसा लगता था, जैसे दो पतली लकड़ियों पर कोई कपड़ा झूल रहा हो. डॉक्टर ने बताया था कि कैंसर के बाद शरीर की हड्डियां कमज़ोर पड़ जाती हैं, इतनी कि गिरने का बहुत डर रहता है. और एक बार गिरे तो हिप बोन (Hip bone) या नी बोन (Knee bone) टूटना अवश्यम्भावी है. इसलिए बहुत एहतियात बरतनी पड़ती थी. उस समय से जो बेटे ने हाथ पकड़ कर चलना शुरू किया, आज तक नहीं छोड़ा. अपने काम के अलावा मैं कहीं अकेले नहीं जाती. हर समय बेटा या परिवार साथ होता है. इसलिए बरसों से कहीं अकेले जाने की आदत ही छूट गई.
ठीक होने के बाद घर में पूजा हुई, जश्न हुआ, एक बहुत बड़ी दावत हुई. रिश्तेदारों ने तोहफ़ों के साथ दुआएँ दी.
अब मैं इतनी चुस्त दुरुस्त हूँ, कि कोई कह ही नहीं सकता कि मुझे कभी यह शाही रोग कैंसर हुआ था.
बेटे की शुक्रगुज़ार हूँ कि वह मेरी पूरी बीमारी के दौरान 10 महीने मेरे पास घर पर ही रहा. बरखा ने भी पूरी सेवा की. तो…... दुःख आते जाते रहते हैं, हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।

Wednesday, 27 July 2016

भूमिका द्विवेदी का साक्षात्कार

भूमिका द्विवेदी का साक्षात्कार

अब साक्षात्कार लेने वालों ने पूछा तो बताना ही था। हाँ, किस तरह बताया जाए, यह अलग बात है। कह सकती थी कि इस बारे में कृपया अभी न पूछें। अभी मैं सदमे से उबर जाऊँ, उनका अंतिम क्रियाक्रम पूर्ण हो जाए, तब इस पर बात करेंगे। आर्थिक तंगी की बात करती है, खुद कमा नहीं सकती थी? लोगों से सहयोग (भीख) की अपेक्षा करने की बजाय खुद नौकरी करती। पढ़ी-लिखी है, उम्र भी 30 के आसपास होगी। कहीं नौकरी करके आर्थिक तंगी को दूर कर सकती थी।
यह साक्षात्कार 'जागरण' अखबार में छप चुका है। अख़बार ने इसे शीर्षक भी सोच-समझ कर दिया होगा। नीलाभ की शख्सियत एक लेखक, अनुवादक, पत्रकार की रही है, अतः उनकी युवा लेखिका पत्नी द्वारा दिया गया वक्तव्य महत्वपूर्ण है।
जी, विरासत उन्हें ही मिलेगी लेकिन पति की मृत्यु के दो दिन बाद ही पत्नी ऐसे वक्तव्य दे और मृत्यु के अगले दिन ही फेसबुक पर आ जाए तो दुखद आश्चर्य होता है। विचार का मुद्दा यह है।


Monday, 25 July 2016

भूमिका द्विवेदी की कविता

भूमिका द्विवेदी की कविता

आप चाहे तीसरी पत्नी थीं, पर आपका तो पहला पति था। पति की मृत्यु के दूसरे ही दिन कोई दर्द भरी कविता बेशक लिख ले लेकिन उस कविता को लेकर फेसबुक पर कैसे आ सकता है? क्या इसे फेसबुक का चस्का कहेंगे? जो भी हो, ऐसे लोगों पर एक धिक्कार तो बनता ही है, जो मरने वाले के उठाले तक सब्र नहीं कर सके और फेसबुक पर पतिव्रता नारी के रूप में वाहवाही लूटने आ गए कि भई, एक दिन पहले ही मरे पति का कितना सोग मना रही है। Bhumika pyari, kuchh din to ruk jaati. (Neelabh died on 23 July at 5am, cremated around 5pm same day. This poem was posted on 24 July at 11.33am.· 

अब नहीं मिलेंगे मेरी तकिया पर अधकचरे
अधरंगे बाल तुम्हारे,
अब नहीं देख सकूंगी, प्रेमी करतब
और बवाल सारे
अब नहीं सहला पाऊंगी माथा तुम्हारा
कभी बुखार से तपता
तो कभी शीतल जल जैसा
अब नहीं नहलाऊंगी तुम्हें
कुर्सी पर बिठाकर
चिढ़ाकर
दुलराकर
चन्दन वाले तुम्हारे प्रिय साबुन से..
नहीं पुकारोगे तुम अब बार बार
"मेरी जान एक गिलास ठंडा पानी दे दो,
बाथरूम तक पंहुचा दो मेरी प्यारी"
नीचे सीढ़ियों तक तुम्हारी कार आते ही मोहल्लेवाले अब नहीं बतायेंगे मुझे,
"भाभी अंकलजी आ गये,
लिवा लाईये उन्हें"
"दीदी अंकल जी फ़िर बाहर, वौशरूम, फ़्रिज के पास, दरवाज़े पर, आलमारी के पीछे गिर गये हैं, किसी को बुलाईये, इन्हीं उठाईये.." कामवाली बाईयाँ भी हरकारा नहीं देंगी इस तरह.
अब दवा खिलाने नहीं आऊंगी तुम्हें,
ना करवाऊंगी अल्ट्रासाउन्ड, ना डौपलर, ना सिटी स्कैन, ना ब्लड, न यूरिन, न, खंखार का टेस्ट तुम्हारा बार बार.
अब गिड़गिड़ाऊंगी भी नहीं कि खाना खा लो, देखो दवा का टाइम हो गया है."
अब नहीं सुनाओगे तुम मुझे मेरी पसंद की कविता,
ना गढ़ोगे शेर और जुमले मुझ पर
ना खींचोगे मेरी फोटो, ना फ़्रेम करवाओगे उनपर
न सजाओगे मुझे कहीं ले जाने के लिये.
अब तो बस
हवा में तैरेंगी खूब सारी बातें तुम्हारीतुम्हें शून्य से भी ना जानने वाले
लगायेंगे तोहमतें मुझपर
अब तो सिर्फ़ कड़वी ज़बान
कड़वे झूठ सुनकर
रोती रहूंगी
तुम्हारा प्रेम याद करके अकेले उसी कमरे में
जहां बैठते थे तुम और हम
और खूब शिक़वे
खूब ठहाके
खूब फ़िकरे
और थोड़ी सी आत्मीयता भी
सहलायेगी मेरा मन
मेरा एकदम-से अकेला हुआ मन
तुम थोड़ा और रुकते
तो मजबूत बना जाते मुझे
तुम्हें तो अपनी दिवंगत पत्नी
और यारों से मिलने की जल्दी पड़ी थी.
तुम क्यूं इतनी जल्दी
हाथ छोड़ गये मेरा.
इतनी भी क्या जल्दी थी जी......



नीलाभ अश्क : मृत्यु 22 जुलाई

नीलाभ अश्क
निरंकुश बवाल, जी का जंजाल
मृत्यु 23 जुलाई.

'लागा चुनरी में दाग' शीर्षक से मैंने हाल ही में कुछ लेखकों के संस्मरण लिखे थे, उसी श्रृंखला में यह लेख 8 अप्रैल, '16 को लिखा और पोस्ट किया था, जो नीलाभ ने भी पढ़ा था. यह लेख कुछ परिवर्तन के साथ यहाँ पुनः दे रही हूँ.

इस चुनरी में दाग़ क्या, यह तो पूरी दाग़-दगीली है. नीलाभ के बारे में कुछ लिखना, मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डालने के समान है. आ बैल, मुझे मार. मेरी हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी।

मैं नीलाभ के बारे में क्या जानती हूँ? मुझे नहीं ध्यान कि मैं नीलाभ से कभी मिली होऊं. वे जब अपने दिल्ली के किस्से बयान करते थे तो मैं हैरान होती थी कि वे दिल्ली में रहते थे. हाँ, हमारी बात फोन पर अवश्य हुई थी, वह भी पिछले एक वर्ष के दौरान ही. शायद दो-तीन वर्ष वे मेरे फेसबुक मित्र भी रहे. जो मैं उनके बारे में जानती हूँ, वह सारा जगत जानता है. मैं अकेली इस बात का श्रेय नहीं ले सकती कि मैं उनके बारे में कुछ ख़ास जानती हूँ. उनका हर आम और ख़ास चौराहे पर सजा हुआ है. न न, किसी दूसरे ने यह सत्कार्य करने की ज़हमत नहीं उठाई, उन्होंने खुद सजाया है.

मैंने इनका नाम सुना उपेंद्र नाथ अश्क के पुत्र के रूप में. उपेंद्र नाथ अश्क जी लेखन के साथ-साथ पुस्तक-प्रकाशन का काम भी करते थे. उनके प्रकाशन व्यवसाय का नाम था, नीलाभ प्रकाशन। नीलाभ उनके पुत्र का नाम है. जैसे आमतौर पर लोग अपने बच्चों के नाम पर अपने व्यवसाय का, घर का नाम रख देते हैं, वैसे ही नीलाभ प्रकाशन नाम रखा गया, यह उन्होंने मुझे इसी रूप में बताया भी था कि उन्होंने अपने बेटे के नाम पर प्रकाशन का नाम रखा है. उन्होंने मेरा एक कहानी संग्रह प्रकाशित किया था, जो उन्होंने मुझसे खुद माँगा था, नई लेखिका होने के नाते। उपेंद्र नाथ अश्क जी ही इस सिलसिले में मुझसे मिले भी थे, किसी काम से दिल्ली आए होंगे, शायद किसी गेस्ट हाउस या होटल में ठहरे थे, वहीँ मुझे मिलने के लिए बुलाया था. उन्होंने मुझे रॉयल्टी स्वरूप एक मनीऑर्डर भी भेजा था, जो बहुत ही थोड़ी राशि का था, टोकन अमाउंट की तरह. मैं उसे पाकर बहुत खुश हुई थी, इसलिए भी कि उस समय मेरे दिन बहुत कड़की में गुज़र रहे थे. तब तक मैंने नीलाभ का नाम इतना भर सुना था कि अश्क जी के बेटे का नाम नीलाभ है.

पिता का व्यवसाय, सम्पत्ति पुत्र को विरासत के रूप में मिलती है, लेकिन पिता के निर्णय, चुनाव. उनके अपने जीवन में किए गए कार्य, इन सब को पुत्र अपना नहीं कह सकता. इसलिए जब नीलाभ ने यह कहा कि उन्होंने मेरा कहानी संग्रह छापने का गुनाह किया है, तो मुझे हैरानी हुई थी. वे बाइज़्ज़त इस गुनाह से बरी हों. यह यदि गुनाह था तो इस गुनाह के हकदार उनके पिताश्री थे, वे नहीं.

नीलाभ ने उस संग्रह की कहानियाँ लगभग एक वर्ष पहले ही पढ़ी थीं और उन पर एक बेहद खूबसूरत टिप्पणी की थी (जो फेसबुक पर छपी थी) कि 'मणिका मोहिनी की कहानियाँ समय से आगे की कहानियाँ हैं, इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित होना चाहिए.' मेरी कहानियों के प्रति नीलाभ जी की इस राय की मैं ह्रदय से आभारी हूँ. नीलाभ यदि अपने पिता के व्यवसाय के प्रति संवेदनशील होते और इसे अच्छा काम समझते तो इस रिटायरमेंट की अवस्था में इसे पुनः शुरू कर सकते थे. उनके पास एक युवा बीवी थी इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए. फिर मेरे उस संग्रह का दूसरा संस्करण छापने का गुनाह करते। तब खुल कर कन्फेशन करते कि यह गुनाह किया है.

चाहे कोई मुझसे दुश्मनी करे, मैं लम्बे अर्से तक उसके लिए अपने मन में वैमनस्य नहीं रख पाती, नीलाभ के कुछ प्रेम पत्र (क्षमा कीजिए, हम गालियों को भी प्रेम पत्र कहते हैं) मेरे फोन के मैसेज बॉक्स में सुरक्षित हैं. मुझसे दुश्मनी इसलिए नहीं होती क्योंकि मैं हर बात के पीछे व्यक्ति का मनोविज्ञान समझने की कोशिश करती हूँ. 

मैंने नीलाभ का मनोविज्ञान यह समझा है कि वे मन के भीतर बहुत अकेले थे. उन्हें दूर-दूर तक कोई अपना नज़र नहीं आता था. उन्होंने जीवन में बहुत खोया, पाया कुछ नहीं. जिसे लोग उनके द्वारा 'पाना' समझ रहे हैं, वह मृगतृष्णा है. न वे किसी से प्यार करते थे, न कोई उनसे प्यार करता था. न वे किसी के अपने थे, न कोई उनका अपना था. मैंने सुना था कि वे पक्के शराबी थे. शराब पीकर प्यार नहीं किया जाता, सेक्स किया जाता है. हैविंग सेक्स और मेकिंग लव में बहुत बड़ा फर्क होता है. सब वक़्त-कटी का मामला था. वे बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाते थे और उसे बुद्धि से समझने की कोशिश नहीं करते थे. उनका क्रोध उनकी बुद्धि से आगे चलता था. अपने क्रोध के कारण उन्होंने बहुत से लोगों से रिश्ते बिगाड़े।वैसे भी उन्हें बना के रखना नहीं आता था. उनके जीवन में अनन्त समस्याएँ थीं, पर उनकी समस्याओं में उनसे सही सलाह-मश्वरा करने वाला उनका कोई मित्र / मित्राणी या तो नहीं था या वे किसी की सुनते नहीं थे. उनका एक सौभाग्य था कि कम से कम दुनिया-दिखावे के लिए एक रिश्ता उनके पास था.

यह दुखद स्थिति थी कि इतना अकेलापन झेल कर भी उन्हें जीना नहीं आया. बहुतों को नहीं आता. यह जीवन जीना भी एक कला है जो सबको नहीं आती. उन्होंने यौवन गुज़ारा 'ज़िन्दगी के भी मज़े और मौत से गाफिल नहीं' अंदाज़ में. अंत समय के लिए कुछ बचा कर नहीं रखा, 'जिसने दिया है तन को, देगा वही कफ़न को' अंदाज़ में. 70 साल की उम्र के किसी व्यक्ति को रोज़ी-रोटी कमाने के लिए खटना पड़े तो यह दुखद स्थिति है. उनकी तीसरी युवा बीवी, स्त्री की आज़ादी की पक्षधर, भी उन पर आश्रित थी. पता नहीं क्यों? (उनकी मृत्यु के अगले दिन फेसबुक पर प्रकाशित उनकी पत्नी की कविता से पता चला कि कामवाली बाइयाँ हरकारा देती थीं, 'दीदी, अंकल जी फ़िर बाहर, वौशरूम, फ़्रिज के पास, दरवाज़े पर, आलमारी के पीछे गिर गये हैं, किसी को बुलाईये, इन्हीं उठाईये..' ओह, यह पढ़ कर तो दिल दहल उठा. पत्नी के घर में होते हुए भी उन्हें सहारा देकर वॉशरुम, फ्रिज, दरवाज़े, अलमारी के पास ले जाने वाला भी कोई नहीं था. चाहे किसी ने कितने भी ज़ुल्म किए हों, उसकी असहाय अवस्था में उस पर थोड़ा तो तरस खाओ. ये दो-दो, चार-चार शादियां करने वाले ऐसी ही बुरी मौत मरते हैं. अगर इस भले आदमी का अंतिम वक़्त सुकून भरा होता तो वह दो क्या, एक भी माफीनामा नहीं लिखता. उसका ज़मीर नहीं जागा था, मौत की भयंकरता उससे हाथ जुड़वा रही थी.

जीवंत रचनाएँ लिखने वाले एक लेखक की अपनी ज़िन्दगी की कहानी इतनी मरी हुई होगी, मुझे विश्वास न था. नीलाभ के जीवन की कहानी आकर्षित भी करती है और उदास भी. एक बौद्धिक, प्रतिभाशाली, उम्रदराज़ पुरुष, किसी ने भी उसे प्रेम नहीं किया। कई बार वह मुझे victim (सताया हुआ) लगता है, तो कई बार शातिर, और कई बार मूर्ख. अनेक बार ख्याल आया है कि क्या प्रतिभाशाली व्यक्ति इतना नादान भी होता है जो अपने से जुड़े स्वार्थी तत्वों को पहचान नहीं पाता? आखिर उसकी कौन सी दुर्बलता उसे 'झूठ' से जुड़े रहने के लिए विवश करती है? क्या उसकी आत्मा इतनी भी जागृत नहीं हुई होती कि उसे वफ़ा और बेवफ़ा की पहचान करना सिखा सके? क्या जीवन के हादसों ने उसे भीतर से इतना खोखला कर दिया होता है कि उसमें अकेले, बिना सहारे के खड़े होने की ताकत नहीं होती? वह खुद भी लोगों की आस्तीन में साँप था और अपनी आस्तीन में साँप पालने का भी शौकीन था? ऐसा व्यक्ति मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अच्छा ऑब्जेक्ट हो सकता है. बहुत से लोग अस्पताली तजुर्बों के लिए मृत्यु-उपरान्त अपना शरीर दान करने की वसीयत लिख देते हैं. क्यों नहीं ऐसे विश्रृंखलित दिमाग के लोग जीवित रहते अपना मस्तिष्क मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए दान कर देते? आखिर पता तो चलता कि एक प्रतिभाशाली, बुद्धिमान व्यक्ति इतनी विश्रृंखलता का शिकार कैसे हो जाता है?

सिर्फ एक सन्दर्भ पर टिप्पणी करना चाहूँगी। उन्होंने खुलेआम फेसबुक पर स्वीकारा (सन्दर्भ पोस्ट 30 मार्च) कि वे एक 30-35 वर्षीय कन्या के साथ हमबिस्तर हुए. फिर बताया कि वह उनके घर से कुछ सामान उठा कर ले गई, जिसकी उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट की. प्यारे भाई, अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ सोओगे तो क्या मुफ्त में सोओगे? इसीलिए कहती हूँ, सब तमाशबीन थे. तुम्हें खुद उसे कुछ दे-दिला के विदा करना चाहिए था, ताकि शान से कह सकते, 'आय हैव पेड फॉर इट.' बातें तो और भी हैं, लेकिन पंगा कौन ले? इतना पंगा लेने की ही हिम्मत कर ली, यह क्या कम है?

मैं दूसरों की मूर्खताओं, गलतियों, तदुत्पन्न दुखों एवं असंगतियों के बारे में व्यर्थ चिंतित रहती हूँ, खासकर उनके बारे में जो परिवार का भ्रम देते हुए दो जानलेवा दुश्मनों की भाँति साथ रहते हैं. न जाने कब, एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंप दें? संभल के भाई, संभल के,

मैंने अपने पहले के लेख में नीलाभ से कहा था....
अपने चेहरे पे मुस्कानों को सजाते चलिए
ज़िन्दगी जंग है बस यूँ ही निभाते चलिए।
सो ज़िन्दगी की जंग में नीलाभ जीते या हारे, इसकी गणना करने वाली मैं कौन?


Tuesday, 12 July 2016

मेरा पुत्र

मेरा पुत्र

एक बार एक गैर-साहित्यिक व्यक्ति ने मेरी कविताओं के बारे में एक अच्छी टिप्पणी की (जो मुझे अच्छी लगी) कि 'आप कविताओं में कहानियाँ लिखती हैं।'

मेरा पुत्र, कंप्यूटर इंजीनियर मनीष मोहन. इन्हें बचपन में कुछ-कुछ लिखने का शौक था और अपनी 13-14 वर्ष की आयु में मुझे बिना बताए अंग्रेजी पत्रिका 'टार्गेट' में अपनी छोटी-मोटी रचनाएं भेजी थीं जो छपने पर मुझे दिखाई थीं. फिर शायद 14-15 वर्ष की आयु में 'इण्डिया टुडे' में किसी राजनीतिक विषय पर इनकी एक लम्बी प्रतिक्रिया छपी थी, जिसे पढ़ कर बहुत लोग हैरान रह गए थे. फिर 15 वर्ष की आयु में एक अंग्रेजी कहानी लिखी, जिसका हश्र यह हुआ कि बरसों बाद उसे थोड़ा संवार कर हिन्दी में मैंने अपने नाम कर लिया. अपनी किशोरावस्था में ही ये चित्रकारी भी किया करते थे और कागज़ पर पेन या पेन्सिल से किसी भी व्यक्ति का चेहरा हूबहू उतार दिया करते थे। (काश मैं वो चित्रकारी संभाल कर रख पाती). मैं खुश थी कि शायद यह लेखक या कलाकार बन कर अपनी माँ की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाएं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन्होने मुझे तसल्ली दी, 'माँ, मैं जो सौफ़टवेअर बनाता हूँ, वह भी बहुत रचनात्मक होता है.' तो मित्रों, यही वह गैर-साहित्यिक व्यक्ति हैं जिन्होंने मेरी कविताओं के बारे में यह टिप्पणी की, 'माँ, आप कविताओं में कहानियाँ लिखती हैं।' वाह, कितनी खूबसूरत बात, कविता के रस से भरी, कहानी की रोचकता से भरी। इस गैर-साहित्यिक पुत्र पर साहित्यिक माँ कैसे न मर जाए खुदा....