Monday, 25 July 2016

नीलाभ अश्क : मृत्यु 22 जुलाई

नीलाभ अश्क
निरंकुश बवाल, जी का जंजाल
मृत्यु 23 जुलाई.

'लागा चुनरी में दाग' शीर्षक से मैंने हाल ही में कुछ लेखकों के संस्मरण लिखे थे, उसी श्रृंखला में यह लेख 8 अप्रैल, '16 को लिखा और पोस्ट किया था, जो नीलाभ ने भी पढ़ा था. यह लेख कुछ परिवर्तन के साथ यहाँ पुनः दे रही हूँ.

इस चुनरी में दाग़ क्या, यह तो पूरी दाग़-दगीली है. नीलाभ के बारे में कुछ लिखना, मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डालने के समान है. आ बैल, मुझे मार. मेरी हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी।

मैं नीलाभ के बारे में क्या जानती हूँ? मुझे नहीं ध्यान कि मैं नीलाभ से कभी मिली होऊं. वे जब अपने दिल्ली के किस्से बयान करते थे तो मैं हैरान होती थी कि वे दिल्ली में रहते थे. हाँ, हमारी बात फोन पर अवश्य हुई थी, वह भी पिछले एक वर्ष के दौरान ही. शायद दो-तीन वर्ष वे मेरे फेसबुक मित्र भी रहे. जो मैं उनके बारे में जानती हूँ, वह सारा जगत जानता है. मैं अकेली इस बात का श्रेय नहीं ले सकती कि मैं उनके बारे में कुछ ख़ास जानती हूँ. उनका हर आम और ख़ास चौराहे पर सजा हुआ है. न न, किसी दूसरे ने यह सत्कार्य करने की ज़हमत नहीं उठाई, उन्होंने खुद सजाया है.

मैंने इनका नाम सुना उपेंद्र नाथ अश्क के पुत्र के रूप में. उपेंद्र नाथ अश्क जी लेखन के साथ-साथ पुस्तक-प्रकाशन का काम भी करते थे. उनके प्रकाशन व्यवसाय का नाम था, नीलाभ प्रकाशन। नीलाभ उनके पुत्र का नाम है. जैसे आमतौर पर लोग अपने बच्चों के नाम पर अपने व्यवसाय का, घर का नाम रख देते हैं, वैसे ही नीलाभ प्रकाशन नाम रखा गया, यह उन्होंने मुझे इसी रूप में बताया भी था कि उन्होंने अपने बेटे के नाम पर प्रकाशन का नाम रखा है. उन्होंने मेरा एक कहानी संग्रह प्रकाशित किया था, जो उन्होंने मुझसे खुद माँगा था, नई लेखिका होने के नाते। उपेंद्र नाथ अश्क जी ही इस सिलसिले में मुझसे मिले भी थे, किसी काम से दिल्ली आए होंगे, शायद किसी गेस्ट हाउस या होटल में ठहरे थे, वहीँ मुझे मिलने के लिए बुलाया था. उन्होंने मुझे रॉयल्टी स्वरूप एक मनीऑर्डर भी भेजा था, जो बहुत ही थोड़ी राशि का था, टोकन अमाउंट की तरह. मैं उसे पाकर बहुत खुश हुई थी, इसलिए भी कि उस समय मेरे दिन बहुत कड़की में गुज़र रहे थे. तब तक मैंने नीलाभ का नाम इतना भर सुना था कि अश्क जी के बेटे का नाम नीलाभ है.

पिता का व्यवसाय, सम्पत्ति पुत्र को विरासत के रूप में मिलती है, लेकिन पिता के निर्णय, चुनाव. उनके अपने जीवन में किए गए कार्य, इन सब को पुत्र अपना नहीं कह सकता. इसलिए जब नीलाभ ने यह कहा कि उन्होंने मेरा कहानी संग्रह छापने का गुनाह किया है, तो मुझे हैरानी हुई थी. वे बाइज़्ज़त इस गुनाह से बरी हों. यह यदि गुनाह था तो इस गुनाह के हकदार उनके पिताश्री थे, वे नहीं.

नीलाभ ने उस संग्रह की कहानियाँ लगभग एक वर्ष पहले ही पढ़ी थीं और उन पर एक बेहद खूबसूरत टिप्पणी की थी (जो फेसबुक पर छपी थी) कि 'मणिका मोहिनी की कहानियाँ समय से आगे की कहानियाँ हैं, इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित होना चाहिए.' मेरी कहानियों के प्रति नीलाभ जी की इस राय की मैं ह्रदय से आभारी हूँ. नीलाभ यदि अपने पिता के व्यवसाय के प्रति संवेदनशील होते और इसे अच्छा काम समझते तो इस रिटायरमेंट की अवस्था में इसे पुनः शुरू कर सकते थे. उनके पास एक युवा बीवी थी इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए. फिर मेरे उस संग्रह का दूसरा संस्करण छापने का गुनाह करते। तब खुल कर कन्फेशन करते कि यह गुनाह किया है.

चाहे कोई मुझसे दुश्मनी करे, मैं लम्बे अर्से तक उसके लिए अपने मन में वैमनस्य नहीं रख पाती, नीलाभ के कुछ प्रेम पत्र (क्षमा कीजिए, हम गालियों को भी प्रेम पत्र कहते हैं) मेरे फोन के मैसेज बॉक्स में सुरक्षित हैं. मुझसे दुश्मनी इसलिए नहीं होती क्योंकि मैं हर बात के पीछे व्यक्ति का मनोविज्ञान समझने की कोशिश करती हूँ. 

मैंने नीलाभ का मनोविज्ञान यह समझा है कि वे मन के भीतर बहुत अकेले थे. उन्हें दूर-दूर तक कोई अपना नज़र नहीं आता था. उन्होंने जीवन में बहुत खोया, पाया कुछ नहीं. जिसे लोग उनके द्वारा 'पाना' समझ रहे हैं, वह मृगतृष्णा है. न वे किसी से प्यार करते थे, न कोई उनसे प्यार करता था. न वे किसी के अपने थे, न कोई उनका अपना था. मैंने सुना था कि वे पक्के शराबी थे. शराब पीकर प्यार नहीं किया जाता, सेक्स किया जाता है. हैविंग सेक्स और मेकिंग लव में बहुत बड़ा फर्क होता है. सब वक़्त-कटी का मामला था. वे बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाते थे और उसे बुद्धि से समझने की कोशिश नहीं करते थे. उनका क्रोध उनकी बुद्धि से आगे चलता था. अपने क्रोध के कारण उन्होंने बहुत से लोगों से रिश्ते बिगाड़े।वैसे भी उन्हें बना के रखना नहीं आता था. उनके जीवन में अनन्त समस्याएँ थीं, पर उनकी समस्याओं में उनसे सही सलाह-मश्वरा करने वाला उनका कोई मित्र / मित्राणी या तो नहीं था या वे किसी की सुनते नहीं थे. उनका एक सौभाग्य था कि कम से कम दुनिया-दिखावे के लिए एक रिश्ता उनके पास था.

यह दुखद स्थिति थी कि इतना अकेलापन झेल कर भी उन्हें जीना नहीं आया. बहुतों को नहीं आता. यह जीवन जीना भी एक कला है जो सबको नहीं आती. उन्होंने यौवन गुज़ारा 'ज़िन्दगी के भी मज़े और मौत से गाफिल नहीं' अंदाज़ में. अंत समय के लिए कुछ बचा कर नहीं रखा, 'जिसने दिया है तन को, देगा वही कफ़न को' अंदाज़ में. 70 साल की उम्र के किसी व्यक्ति को रोज़ी-रोटी कमाने के लिए खटना पड़े तो यह दुखद स्थिति है. उनकी तीसरी युवा बीवी, स्त्री की आज़ादी की पक्षधर, भी उन पर आश्रित थी. पता नहीं क्यों? (उनकी मृत्यु के अगले दिन फेसबुक पर प्रकाशित उनकी पत्नी की कविता से पता चला कि कामवाली बाइयाँ हरकारा देती थीं, 'दीदी, अंकल जी फ़िर बाहर, वौशरूम, फ़्रिज के पास, दरवाज़े पर, आलमारी के पीछे गिर गये हैं, किसी को बुलाईये, इन्हीं उठाईये..' ओह, यह पढ़ कर तो दिल दहल उठा. पत्नी के घर में होते हुए भी उन्हें सहारा देकर वॉशरुम, फ्रिज, दरवाज़े, अलमारी के पास ले जाने वाला भी कोई नहीं था. चाहे किसी ने कितने भी ज़ुल्म किए हों, उसकी असहाय अवस्था में उस पर थोड़ा तो तरस खाओ. ये दो-दो, चार-चार शादियां करने वाले ऐसी ही बुरी मौत मरते हैं. अगर इस भले आदमी का अंतिम वक़्त सुकून भरा होता तो वह दो क्या, एक भी माफीनामा नहीं लिखता. उसका ज़मीर नहीं जागा था, मौत की भयंकरता उससे हाथ जुड़वा रही थी.

जीवंत रचनाएँ लिखने वाले एक लेखक की अपनी ज़िन्दगी की कहानी इतनी मरी हुई होगी, मुझे विश्वास न था. नीलाभ के जीवन की कहानी आकर्षित भी करती है और उदास भी. एक बौद्धिक, प्रतिभाशाली, उम्रदराज़ पुरुष, किसी ने भी उसे प्रेम नहीं किया। कई बार वह मुझे victim (सताया हुआ) लगता है, तो कई बार शातिर, और कई बार मूर्ख. अनेक बार ख्याल आया है कि क्या प्रतिभाशाली व्यक्ति इतना नादान भी होता है जो अपने से जुड़े स्वार्थी तत्वों को पहचान नहीं पाता? आखिर उसकी कौन सी दुर्बलता उसे 'झूठ' से जुड़े रहने के लिए विवश करती है? क्या उसकी आत्मा इतनी भी जागृत नहीं हुई होती कि उसे वफ़ा और बेवफ़ा की पहचान करना सिखा सके? क्या जीवन के हादसों ने उसे भीतर से इतना खोखला कर दिया होता है कि उसमें अकेले, बिना सहारे के खड़े होने की ताकत नहीं होती? वह खुद भी लोगों की आस्तीन में साँप था और अपनी आस्तीन में साँप पालने का भी शौकीन था? ऐसा व्यक्ति मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अच्छा ऑब्जेक्ट हो सकता है. बहुत से लोग अस्पताली तजुर्बों के लिए मृत्यु-उपरान्त अपना शरीर दान करने की वसीयत लिख देते हैं. क्यों नहीं ऐसे विश्रृंखलित दिमाग के लोग जीवित रहते अपना मस्तिष्क मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए दान कर देते? आखिर पता तो चलता कि एक प्रतिभाशाली, बुद्धिमान व्यक्ति इतनी विश्रृंखलता का शिकार कैसे हो जाता है?

सिर्फ एक सन्दर्भ पर टिप्पणी करना चाहूँगी। उन्होंने खुलेआम फेसबुक पर स्वीकारा (सन्दर्भ पोस्ट 30 मार्च) कि वे एक 30-35 वर्षीय कन्या के साथ हमबिस्तर हुए. फिर बताया कि वह उनके घर से कुछ सामान उठा कर ले गई, जिसकी उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट की. प्यारे भाई, अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ सोओगे तो क्या मुफ्त में सोओगे? इसीलिए कहती हूँ, सब तमाशबीन थे. तुम्हें खुद उसे कुछ दे-दिला के विदा करना चाहिए था, ताकि शान से कह सकते, 'आय हैव पेड फॉर इट.' बातें तो और भी हैं, लेकिन पंगा कौन ले? इतना पंगा लेने की ही हिम्मत कर ली, यह क्या कम है?

मैं दूसरों की मूर्खताओं, गलतियों, तदुत्पन्न दुखों एवं असंगतियों के बारे में व्यर्थ चिंतित रहती हूँ, खासकर उनके बारे में जो परिवार का भ्रम देते हुए दो जानलेवा दुश्मनों की भाँति साथ रहते हैं. न जाने कब, एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंप दें? संभल के भाई, संभल के,

मैंने अपने पहले के लेख में नीलाभ से कहा था....
अपने चेहरे पे मुस्कानों को सजाते चलिए
ज़िन्दगी जंग है बस यूँ ही निभाते चलिए।
सो ज़िन्दगी की जंग में नीलाभ जीते या हारे, इसकी गणना करने वाली मैं कौन?


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