Tuesday, 12 July 2016

मेरा पुत्र

मेरा पुत्र

एक बार एक गैर-साहित्यिक व्यक्ति ने मेरी कविताओं के बारे में एक अच्छी टिप्पणी की (जो मुझे अच्छी लगी) कि 'आप कविताओं में कहानियाँ लिखती हैं।'

मेरा पुत्र, कंप्यूटर इंजीनियर मनीष मोहन. इन्हें बचपन में कुछ-कुछ लिखने का शौक था और अपनी 13-14 वर्ष की आयु में मुझे बिना बताए अंग्रेजी पत्रिका 'टार्गेट' में अपनी छोटी-मोटी रचनाएं भेजी थीं जो छपने पर मुझे दिखाई थीं. फिर शायद 14-15 वर्ष की आयु में 'इण्डिया टुडे' में किसी राजनीतिक विषय पर इनकी एक लम्बी प्रतिक्रिया छपी थी, जिसे पढ़ कर बहुत लोग हैरान रह गए थे. फिर 15 वर्ष की आयु में एक अंग्रेजी कहानी लिखी, जिसका हश्र यह हुआ कि बरसों बाद उसे थोड़ा संवार कर हिन्दी में मैंने अपने नाम कर लिया. अपनी किशोरावस्था में ही ये चित्रकारी भी किया करते थे और कागज़ पर पेन या पेन्सिल से किसी भी व्यक्ति का चेहरा हूबहू उतार दिया करते थे। (काश मैं वो चित्रकारी संभाल कर रख पाती). मैं खुश थी कि शायद यह लेखक या कलाकार बन कर अपनी माँ की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाएं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन्होने मुझे तसल्ली दी, 'माँ, मैं जो सौफ़टवेअर बनाता हूँ, वह भी बहुत रचनात्मक होता है.' तो मित्रों, यही वह गैर-साहित्यिक व्यक्ति हैं जिन्होंने मेरी कविताओं के बारे में यह टिप्पणी की, 'माँ, आप कविताओं में कहानियाँ लिखती हैं।' वाह, कितनी खूबसूरत बात, कविता के रस से भरी, कहानी की रोचकता से भरी। इस गैर-साहित्यिक पुत्र पर साहित्यिक माँ कैसे न मर जाए खुदा....

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