Monday, 25 July 2016

भूमिका द्विवेदी की कविता

भूमिका द्विवेदी की कविता

आप चाहे तीसरी पत्नी थीं, पर आपका तो पहला पति था। पति की मृत्यु के दूसरे ही दिन कोई दर्द भरी कविता बेशक लिख ले लेकिन उस कविता को लेकर फेसबुक पर कैसे आ सकता है? क्या इसे फेसबुक का चस्का कहेंगे? जो भी हो, ऐसे लोगों पर एक धिक्कार तो बनता ही है, जो मरने वाले के उठाले तक सब्र नहीं कर सके और फेसबुक पर पतिव्रता नारी के रूप में वाहवाही लूटने आ गए कि भई, एक दिन पहले ही मरे पति का कितना सोग मना रही है। Bhumika pyari, kuchh din to ruk jaati. (Neelabh died on 23 July at 5am, cremated around 5pm same day. This poem was posted on 24 July at 11.33am.· 

अब नहीं मिलेंगे मेरी तकिया पर अधकचरे
अधरंगे बाल तुम्हारे,
अब नहीं देख सकूंगी, प्रेमी करतब
और बवाल सारे
अब नहीं सहला पाऊंगी माथा तुम्हारा
कभी बुखार से तपता
तो कभी शीतल जल जैसा
अब नहीं नहलाऊंगी तुम्हें
कुर्सी पर बिठाकर
चिढ़ाकर
दुलराकर
चन्दन वाले तुम्हारे प्रिय साबुन से..
नहीं पुकारोगे तुम अब बार बार
"मेरी जान एक गिलास ठंडा पानी दे दो,
बाथरूम तक पंहुचा दो मेरी प्यारी"
नीचे सीढ़ियों तक तुम्हारी कार आते ही मोहल्लेवाले अब नहीं बतायेंगे मुझे,
"भाभी अंकलजी आ गये,
लिवा लाईये उन्हें"
"दीदी अंकल जी फ़िर बाहर, वौशरूम, फ़्रिज के पास, दरवाज़े पर, आलमारी के पीछे गिर गये हैं, किसी को बुलाईये, इन्हीं उठाईये.." कामवाली बाईयाँ भी हरकारा नहीं देंगी इस तरह.
अब दवा खिलाने नहीं आऊंगी तुम्हें,
ना करवाऊंगी अल्ट्रासाउन्ड, ना डौपलर, ना सिटी स्कैन, ना ब्लड, न यूरिन, न, खंखार का टेस्ट तुम्हारा बार बार.
अब गिड़गिड़ाऊंगी भी नहीं कि खाना खा लो, देखो दवा का टाइम हो गया है."
अब नहीं सुनाओगे तुम मुझे मेरी पसंद की कविता,
ना गढ़ोगे शेर और जुमले मुझ पर
ना खींचोगे मेरी फोटो, ना फ़्रेम करवाओगे उनपर
न सजाओगे मुझे कहीं ले जाने के लिये.
अब तो बस
हवा में तैरेंगी खूब सारी बातें तुम्हारीतुम्हें शून्य से भी ना जानने वाले
लगायेंगे तोहमतें मुझपर
अब तो सिर्फ़ कड़वी ज़बान
कड़वे झूठ सुनकर
रोती रहूंगी
तुम्हारा प्रेम याद करके अकेले उसी कमरे में
जहां बैठते थे तुम और हम
और खूब शिक़वे
खूब ठहाके
खूब फ़िकरे
और थोड़ी सी आत्मीयता भी
सहलायेगी मेरा मन
मेरा एकदम-से अकेला हुआ मन
तुम थोड़ा और रुकते
तो मजबूत बना जाते मुझे
तुम्हें तो अपनी दिवंगत पत्नी
और यारों से मिलने की जल्दी पड़ी थी.
तुम क्यूं इतनी जल्दी
हाथ छोड़ गये मेरा.
इतनी भी क्या जल्दी थी जी......



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