Sunday, 31 July 2016

ऐसे टाला मैंने विपत्ति को

ऐसे टाला मैंने विपत्ति को

मित्रों, आज मैंने सोचा, ज़रा खुद को ही सर्च करूँ. गूगल पर Manika Mohini टाइप करके सर्च किया तो भड़ास डॉट कॉम पर छपा अपना यह लेख देखा, जो 2013 में फेसबुक पर दिया था, लेकिन एक मित्र के इस सुझाव पर तुरंत हटा लिया था कि इस लेख से लोग तुम्हें ही बुरा कहेंगे. इस तुरंत जितनी देर में ही भड़ास ने इसे ले लिया. यह मेरे ब्लॉग में भी नहीं है. अब ब्लॉग में भी दे रही हूँ. मैंने इसे कोई शीर्षक नहीं दिया था, शीर्षक भड़ास ने दिया. आपके साथ शेयर कर रही हूँ. जब गूगल पर पब्लिक पढ़ रही है, तो आप मित्र क्यों नहीं पढ़ सकतेसकारात्मक रूप में लीजिएगा.


उस कामातुर मेहमान की मैंने यूं की मेहमानवाज़ी

Category विविध. Created on 04 December 2013  01.53
Written by मणिका मोहिनी 

Manika Mohini : मित्रों, रोज़ रेप की घटनाएं सुनने में आ रही हैं. इस सन्दर्भ में अपने निजी जीवन से जुडी एक घटना आप लोगों के साथ बांटना चाहती हूँ कि मैंने कैसे असामान्य परिस्थिति उत्पन्न होने पर प्रत्युत्पन्नमति से विपत्ति को टाला। हालांकि यह उदाहरण वर्तमान रेप के मामलों में बच कर निकलने में सहायक नहीं हो सकता लेकिन मेरी बात से शायद लड़कियों में कुछ जागरूकता या हौसला-अफजाई हो सके. मैंने एक लेखक के तौर पर अपना अनुभव बांटने के लिए अपने जीवन से जुडी इस घटना को अनावृत करने की हिम्मत जुटाई है. आशा है, आप इसे सकारात्मक रूप में लेंगे।
मैं शुरू से एकदम बिंदास किस्म की थी, जो जी में आए, करना, किसी से नहीं डरना, 'कोई हमारा क्या बिगाड़ लेगा', 'लड़कों की ऐसी की तैसी' टाइप। एक बार किसी कारणवश एक जान-पहचान का लड़का मेरे घर रात को ठहर गया कि उसका घर दूर होने से उसे रात में कोई वाहन नहीं मिल पाएगा, वह सुबह होते ही चला जाएगा। उस समय मेरा दो कमरे का घर था, जिसमें मैं और मेरा किशोर पुत्र रहते थे. मैंने उस मेहमान को बेड रूम में सो जाने के लिए कहा और मैं बालकनी में एक चारपाई पर बेटे के साथ सो गई. बालकनी की कुण्डी मैंने अपनी तरफ से लगा ली. आधी रात के बाद मैंने देखा कि वह मेहमान मेरी बालकनी का दरवाज़ा खटखट कर रहा है और बोल रहा है कि 'खोलो, खोलो, आओ ना.'

बालकनी के दरवाज़े में शीशा लगा हुआ था, इसलिए दोनों तरफ देखा जा सकता था. मैंने उसे कमरे में जाकर सो जाने के लिए कहा लेकिन वह दरवाज़ा खड़खड़ाता रहा और बोलता रहा, 'खोलो, आओ.' मैं पहले तो बहुत डर गई और समझ नहीं पाई कि क्या करूँ। आवाज़ सुन कर मेरा बच्चा बेटा कुनमुनाया लेकिन करवट बदल कर सो गया. अचानक मेरा दिमाग चला और मैंने उस मेहमान को बहुत कोमल आवाज़ में बड़े प्यार से कहा, 'ठीक है, तुम कमरे में जाकर बैठो, मैं आती हूँ.' उसे यकीन हो गया, वह चला गया. मैंने बालकनी का दरवाज़ा खोला और कमरे के दरवाज़े पर पहुंची। वह आराम से पलंग पर बैठा हुआ था, उसे पूरा यकीन था कि मेरे पास और कोई चारा नहीं है, मैं ज़रूर आऊंगी।

मैंने कमरे के बाहर खड़े होकर साहस जुटाया और कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया। मैंने सोचा, सुबह तक के लिए परेशानी ख़त्म हुई लेकिन उसके दिमाग पर फितूर सवार था. उसने अंदर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया। वह एक सरकारी आवासगृह था. मुझे डर लगा कि आसपास के लोगों ने सुन लिया तो बड़ी बदनामी होगी। मैं पहली मंज़िल का वह फ़्लैट बंद करके नीचे आई और उस आवासगृह के चौकीदार को लेकर वापस आई. चौकीदार ने कमरे का दरवाज़ा खोल कर उसे पीटना शुरू किया। तब तक हल्ला-गुल्ला सुन कर मेरा छोटा-सा बेटा भी जाग गया था.

मैंने बेटे से कहा, 'डंडा ला.' उसे डंडा नहीं मिला, उसने रसोई से झाड़ू लाकर मेरे हाथ में दे दी और मैंने भी उस मेहमान की मेहमाननवाज़ी की. चौकीदार ने उसी समय उसे मेरे घर और आवासगृह से बाहर निकाला। इस प्रकार अपनी प्रत्युत्पन्नमति के कारण मैंने एक अनचाही सिचुएशन से निजात पाई. लेकिन मैंने उसे इतने पर ही नहीं छोड़ा, अगले दिन अपनी सहेलियों और दोस्तों के साथ मिल कर साहित्य और नाटक के सर्कल में उसकी नाकाबंदी की कि वह कहीं भी दिखा तो उसकी खैर नहीं। मित्रों, यह पुलिस-कोर्ट-कचहरी की चेतना तो अब कुछ वर्षों से जागी है. मैंने अपने से जुड़े बहुत सारे मामले खुद निबटाए हैं.

मुझे मालूम है, अब बहुत से लोग मुझे समझाएंगे कि मुझे उसे अपने घर में शरण ही नहीं देनी चाहिए थी. पर-उपदेश घनेरे। बंधुओं, हममें मुश्किलों से निबटने की हिम्मत है, इस भवसागर में डूबने थोड़े ही आए हैं. फिलहाल इतना ही.
क्रिएटिव राइटर मणिका मोहिनी के फेसबुक वॉल से.

1 comment:

  1. आपको पहले ही डंडा ढूंढ लेना था फिर अपने हाथों से दनादन इतनी पिटाई करनी थी कि फिर भूले से भी ऐसी वाहियात हरकत करने कि हिमाकत न कर पाता किसी के साथ भी ...
    प्रेरक

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