Sunday, 31 July 2016

Cancer Celebration (कैंसर उत्सव)

Cancer Celebration (कैंसर उत्सव)

मैं सोचती हूँ, जो भी लोग कर्मशील है, अपने ध्येय के प्रति जागरूक एवं जुझारू हैं, वे अत्यंत जिजीविषा से भरे होते हैं. उन्हें लगता है कि वे जीवन में कुछ ख़ास करने के लिए आए है, जिसे पूरा करने के लिए उन्हें ज़िंदा रहना ही है. यही जीवन जीने की अदम्य लालसा उनके दुःख-दर्द को भी उत्सवी बना देती है.
मेरे परिवार में कैंसर से कई मौतें हो चुकी थीं, इसलिए 2007 में जब एक दिन ड्राइव करते हुए मेरा दायाँ हाथ स्टीयरिंग व्हील पर ही टिका रह गया, उठा ही नहीं तो मुझे तुरंत लगा कि हो न हो, इसकी वजह कैसर ही है. मैं अकेली धर्मशिला अस्पताल गई और डॉक्टर से कहा कि मेरी बाज़ू काट दो. मैं सोचती थी, अंग-भंग के बाद मुझे और तकलीफों से नहीं गुज़रना पड़ेगा। डॉक्टर ने कॉम्प्लिमेंट दिया, 'आप बहुत बहादुर है,' लेकिन फिर भी सारे टेस्ट करने को बोला।
अगले दिन बेटा रिपोर्ट लेने गया, टेस्ट पॉजिटिव थे, बेटे ने बताया कि रिपोर्ट देख कर वहीँ उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े. उसके अगले दिन ऑप्रेशन हुआ. बाज़ू नहीं कटा.
उसके बाद आठ बड़ी स्ट्रोंग कीमो लगीं, कीमो के दौरान मुँह में छाले, उल्टियाँ, सारा दिन बेहोशी. सिर पर हाथ लगाती तो बालों के गुच्छे हाथ में आ जाते. पार्लर से बाल काटने वाला घर बुलाया गया और पूरे सिर पर उस्तरा फिरवा दिया गया. सिर गंजा हो गया. लेकिन ज़रा सी हिम्मत होते ही खुद ड्राइव करके काम पर जाती थी, बेटे के मना करने के बावजूद।
उसके बाद पचास रेडियो थेरेपी, जल कर शरीर काला पड़ गया था. अभी भी हाथों पर जहाँ-तहाँ कालिख चिपटी हुई है. इतनी सुइयाँ घुपीं कि मैंने डॉक्टर से कहा कि कैंसर से मेरी मौत हो या न हो, इन इंजेक्शंस से ज़रूर हो जाएगी।
आखिरकार मैं ठीक हुई, 10 महीने बाद, डॉकटर के इस विश्वास के साथ कि "मौत तो सबकी होनी है लेकिन आपकी मौत कैंसर से नहीं होगी।"
काम पर जाना मैंने कभी नहीं छोड़ा. कई महीनों तक चलते हुए ऐसा लगता था, जैसे दो पतली लकड़ियों पर कोई कपड़ा झूल रहा हो. डॉक्टर ने बताया था कि कैंसर के बाद शरीर की हड्डियां कमज़ोर पड़ जाती हैं, इतनी कि गिरने का बहुत डर रहता है. और एक बार गिरे तो हिप बोन (Hip bone) या नी बोन (Knee bone) टूटना अवश्यम्भावी है. इसलिए बहुत एहतियात बरतनी पड़ती थी. उस समय से जो बेटे ने हाथ पकड़ कर चलना शुरू किया, आज तक नहीं छोड़ा. अपने काम के अलावा मैं कहीं अकेले नहीं जाती. हर समय बेटा या परिवार साथ होता है. इसलिए बरसों से कहीं अकेले जाने की आदत ही छूट गई.
ठीक होने के बाद घर में पूजा हुई, जश्न हुआ, एक बहुत बड़ी दावत हुई. रिश्तेदारों ने तोहफ़ों के साथ दुआएँ दी.
अब मैं इतनी चुस्त दुरुस्त हूँ, कि कोई कह ही नहीं सकता कि मुझे कभी यह शाही रोग कैंसर हुआ था.
बेटे की शुक्रगुज़ार हूँ कि वह मेरी पूरी बीमारी के दौरान 10 महीने मेरे पास घर पर ही रहा. बरखा ने भी पूरी सेवा की. तो…... दुःख आते जाते रहते हैं, हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।

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