Sunday, 14 August 2016

एक लड़की

एक लड़की

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे बुझता चिराग़
जैसे आँखों में ख्वाब
जैसे बहका हो मन
जैसे तन में अगन
जैसे भटकी-भटकी
जैसे भीग रही हो बिन बरसात के।

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे खेल रही है भीड़ में
जैसे खोज रही है भीड़ में
किसी का थामने को हाथ
हाय कोई तो दे उसका साथ
किसी को चुरा कर ले जाए
उड़ जाए बेहद्दी आकाश में।

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे डोल रही है कटी पतंग सी
ज़िन्दगी ऐसे जैसे मलंग सी
आदतें ऐसी जैसे लफंग सी
रास्तों की कमी नहीं
मंज़िल का पता नहीं
जाए तो जाए कहाँ अवसाद में?

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे हँसूँ उसके ऊपर
या कि रोऊँ उसके ऊपर
या कि लिखूँ गाथा उसकी
या कि छोड़ूँ उसका किस्सा
लिख-लिख कर बदनाम कहानी
उसने खुद को दी सौगात में।

Tuesday, 9 August 2016

कवयित्री शुभम श्री

कवयित्री शुभम श्री

एक कविता पर साहित्य जगत में हंगामा मचा है. कवयित्री शुभम श्री की कविता 'पोएट्री मैनेजमेंट' को इस वर्ष का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देने का निर्णय निर्णायक उदय प्रकाश के द्वारा लिया गया. चारों तरफ से जो विरोध के स्वर उठे तो उदय प्रकाश का स्पष्टीकरण वक्तव्य आया है जो नीचे प्रस्तुत है. कमाल यह है कि न युवा कवयित्री की कविता किसी को समझ (पसंद) आई, न निर्णायक का स्पष्टीकरण. मुझे भी नहीं. शायद आपको पसंद आए. कितनी बकवास कविता है, यह तो हम बाद में सोचेंगे, पर सवाल यह है कि यह कविता है भी या नहीं? पर पुरस्कृत है, इसलिए पढ़ लीजिए. 
पोएट्री मैनेजमेण्ट
कविता लिखना बोगस काम है ! अरे फ़ालतू है ! एकदम बेधन्धा का धन्धा ! पार्ट टाइम ! साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सेमबीए टाइप मज्जा आ जाता गुरु ! माने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूँजीवाद विरोधी कविता सेंसेक्स लुढ़का चैनल पर चर्चा यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू? वित्त मन्त्री का बयान छोटे निवेशक भरोसा रखें आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी मीडिया में हलचल समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है आपको क्या लगता है आम आदमी कैसे सामना करेगा इस संग्रह का ? अपने जवाब हमें एसएमएस करें अबे, सीपीओ (चीफ़ पोएट्री ऑफ़िसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी ! हर प्रोग्राम में ऐड आएगा रिलायंस डिजिटल पोएट्री लाइफ़ बनाए पोएटिक टाटा कविता हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए लोग ड्राइँग रूम में कविता टाँगेंगे अरे वाह बहुत शानदार है किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है नहीं जी, इम्पोर्टेड है असली तो करोड़ों डॉलर की थी हमने डुप्लीकेट ले ली बच्चे निबन्ध लिखेंगे मैं बड़ी होकर एमपीए करना चाहती हूँ एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस आपका सपना हमारा भी है डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ़ पैट (पोएट्री एप्टीट्यूड टैस्ट) की परीक्षाओं में फिर लड़ियाँ अव्वल पैट आरक्षण में धाँधली के ख़िलाफ़ विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला देश में आठ नए भारतीय काव्य संस्थानों पर मुहर तीन साल की उम्र में तीन हज़ार कविताएँ याद भारत का नन्हा अजूबा ईरान के रुख़ से चिन्तित अमेरिका फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त ये है ऑल इण्डिया रेडियो अब आप सुनें सीमा आनन्द से हिन्दी में समाचार नमस्कार आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना हो गए इसमें देश के सभी कविता गुटों के प्रतिनिधि शामिल हैं विदेश मन्त्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी क़ीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मण्टो और फ़ैज़ से भारत अपना दावा वापस ले चीन ने आज फिर नए काव्यालंकारों का परीक्षण किया सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फिलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली काव्य संकलन पैदा करेंगे भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक़ आवारा जी काआज तड़के निधन हो गया उनकी असमय मृत्यु पर राष्ट्रपति ने शोक ज़ाहिर किया है उत्तर प्रदेश में फिर दलित कवियों पर हमला उधर खेलों में भारत ने लगातार तीसरी बार कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है भारत ने सीधे सेटों में ‍‍६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता समाचार समाप्त हुए आ गया आज का हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयरस्टाइल का बुखार कवियित्रियों से सीखें हृस्व दीर्घ के राज़ ३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेण्ट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए २५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें
गुरु मज़ा आ रहा है सुनाते रहो अपन तो हीरो हो जाएँगे जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़ जुल्म हो जाएगा गुरु चुप बे थर्ड डिविज़न एम० ए० एमपीए की फ़ीस कौन देगा? प्रूफ़ कर बैठ के ख़ाली पीली बकवास करता है !
अब निर्णायक का स्पष्टीकरण....
समकालीन युवा कविता का सबसे प्रतिष्ठित और बहुचर्चित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार इस बार युवा कवयित्री शुभमश्री, (जन्‍म 1991) की कविता 'पोएट्री मैनेजमेंट' को देने का निर्णय लिया गया है।

यह कविता नयी दिल्‍ली से प्रकाशित होने वली अनियतकालिक पत्रिका 'जलसा-4' में प्रकाशित हुई है।

बहुत कम उम्र और बहुत कम समय में शुभमश्री ने आज की कविता में अपनी बिल्‍कुल अलग पहचान बनाई है। कविता की चली आती प्रचलित भाषिक संरचनाओं, बनावटों, विन्‍यासों को ही किसी खेल की तरह उलटने-पलटने का निजी काम उन्‍होंने नहीं किया है बल्कि समाज, परिवार, राजनीति, अकादेमिकता आदि के बारे में बनी-बनाई रूढ़ और सर्वमान्‍य हो चुकी बौद्धिक अवधारणाओं के जंगल को अपनी बेलौस कविताओं की अचंभित कर देने वाली 'भाषा की भूल-भुलइया' में तहस-नहस कर डाला है। हमारे आज के समय में शुभमश्री एक असंदिग्‍ध प्रामाणिक विद्रोही (rebel) कवि हैं। सिर्फ पच्‍चीस वर्ष की आयु में इस दशक के पिछले कुछ वर्षों में उनके पास ऐसी अनगिनत कविताएं हैं, जिन्‍होंने राजनीति, मीडिया, संस्‍कृति में लगातार पुष्‍ट की जा रहीं तथा हमारी चेतना में संस्‍कारों की तरह बस चुकी धारणाओं, मान्‍यताओं, विचारों को किसी काग़ज़ी नीबू की तरह निचोड़ कर अनुत्‍तरित सवालों से भर देती हें। औश्र ऐसा वे कविता के भाषिक पाठ में प्रत्‍यक्ष दिखाई देने वाली किसी गंभीर बौद्धिक मुद्रा या भंगिमा के साथ नहीं करतीं, बल्कि वे इसे बच्‍चों के किसी सहज कौतुक भरे खेल के द्वारा इस तरह हासिल करती हैं कि हम हतप्रभ रह जाते हैं। इतना ही नहीं वे अब तक लिखी जा रही कविताओं के बारे में बनाये जाते मिथकों, धारणाओं और भांति-भांति के आलोचनात्‍मक प्रतिमानों द्वारा प्रतिष्ठित की जाती अवधारणाओं को भी इस तरह मासूम व्‍यंजनाओं, कूटोक्तियों से छिन्‍न-भिन्‍न कर देती हैं कि हमें आज के कई कवि और आलोचक जोकर या विदूषक लगने लगते हैं। उनकी एक कविता 'कविताएं चंद नंबरों की मोहताज हैं' की इन पंक्तियों के ज़रिए इसे समझा जा सकता है:

'भावुक होना शर्म की बात है आजकल और कविताओं को दिल से पढ़ना बेवकूफ़ी / शायद हमारा बचपना है या नादानी / कि साहित्‍य हमें जिंदगी लगता है और लिखे हुए शब्‍द सांस / कितना बड़ा मज़ाक है कि परीक्षाओं की तमाम औपचारिकताओं के बावजूद / हमें साहित्‍य साहित्‍य ही लगता है प्रश्‍नपत्र नहीं / खूबसूरती का हमारे आसपास बुना ये यूटोपिया टूटता भी तो नहीं... नागार्जुन-धूमिल-सर्वश्‍वर-रघुवीर सिर्फ आठ ंनबर के सवाल हैं।'

अपने भाषिक पाठ में बच्‍चों का खेल दिखाई देतीं शुभमश्री की कविताएं गहरी अंतर्दृष्टि और कलात्‍मक-मानवीय प्रतिबद्धता तथा निष्‍ठा से भरी मार्मिक डिस्‍टोपिया की बेचैन और प्रश्‍नाकुल कर देने वाली अप्रतिम कविताएं हैं।

शुभमश्री ने किसी कर्मकांड या रिचुअल की तरह रूढ़, खोखली, उकताहटों से भरी पिछले कुछ दशकों की हिंदी कविता के भविष्‍य के लिए नयी खिड़कियां ही नहीं खोली हैं बल्कि उसे जड़-मूल से बदल डाला है। जब कविता लिखना एक 'फालतू' का 'बोगस काम' या खाते-पीते चर्चित पेशेवरों के लिए 'पार्ट टाइम' का 'बेधंधे का धंधा' बन चुकीं थीं, शुभमश्री ने उसे फिर से अर्थसंपन्‍न कर दिया है।

उनकी कविताएं हमारे समय की विता के भूगोल में एक बहुप्रतीक्षित दुर्लभ आविष्‍कार की तरह अब हमेशा के लिए हैं।

उदय प्रकाश




Tuesday, 2 August 2016

Jyotsna Misra

Jyotsna Misra

मेरी फेसबुक मित्र ज्योत्स्ना मिश्रा (Jyotsna Misra) ने कल शाम मुझे यह सन्देश भेजा कि उनकी एक कविता वायरल हो रही है, बहुत लोगों के स्टेटस पर नज़र आ रही है, वे क्या करें?
मैं खुद इस साहित्य चोरी की Victim (पीड़ित) रही हूँ. मैं इसीलिए अपनी कविता-कहानी शेयर करने के लिए मना करती हूँ कि समयान्तर में किसी अन्य के नाम से कहीं की कहीं पहुँच जाएगी. आप ही बताएँ कि इस समस्या का समाधान क्या है? कुछ नासमझ लोग कहते हैं कि आपका लिखा बहुत कोगों तक पहुँच रहा है, आपको ख़ुशी होनी चाहिए. अजी जब हमारे लिखे के साथ हमारा नाम ही नहीं है, लिखे का श्रेय पोस्ट उड़ाने वाले ले रहे हैं तो क्या ख़ाक ख़ुशी होगी? अब नीचे पढ़िए....
Conversation started today
17:35
Jyotsna Misra
मनिका जी एक कमाल की बात आपको बताना चाहती हूँ मैने 11अप्रैल को अपनी एक कविता "औरतें अजीब होती हैं" फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी. मै कोई कवि नही एक गायनकोलाॅजिस्ट हूँ जिसे कभी कभार अपने मरीजों से किस्से कविताएँ मिल जाती हैं.
यह कविता मैने इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन के महिला दिवस के समारोह के लिए लिखी थी और पढ़ी थी.
अब पता चल रहा है कि यह बहुत लोगों को पसंद आ रही है.
इसके सैकड़ों शेयर हो चुके हैं.
कविता कवि को पीछे छोड़ बहुत आगे निकल चुकी है.
कविता वायरल है. कवि का कोई नाम नहीं जानता।
गूगल आंटी भी कविता से परिचित हैं, कवि से नहीं।
यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी
पर कुछ अति उत्साहित महानुभावों ने इसे गुलजार साहब के माथे मढ़ दिया है.
कौन समझाये इन्हें कि गुलजार साहब इतना कच्चा नहीं लिखते।
बेचारे गुलजार साहब।
और बेचारी मैं.
आपकी मित्र सूची में शामिल ममता कश्यप जी ने भी इसे गुलजार की कह कर पोस्ट किया है.
डर है किसी दिन आपने भी इसे गुलजार की कह दिया तब तो ये अफवाह सच हो जायेगी।
क्या किया जाये ?
कुछ मदद करेंगीं क्या ?
कितनों से एतराज करूं? पता नहीं, कहाँ कहाँ घूम रही है?
क्राफ्ट के हिसाब से बहुत कच्ची है. मुझे अंदाज़ा ही नहीं लगा कि ऐसे उड़ जायेगी।
फेसबुक पर सर्च में "औरते अजीब होती हैं" डाल कर देखें। अनगिनत पोस्ट हैं.
किस किस को बताऊं? समझ नही आ रहा, कैसे इसे अपनी क्लेम करूं?
ममता कश्यप (Mamta Kashyap) जी ने 29 जुलाई को, गुलजार की है, ये क्या सोच कर लिख दिया?
ध्रुव जी ने भी लाइक मार दिया।
richasameer03 ने अपने पेज अपना अपना आसमान में इसे 14 अप्रैल को प्रकाशित किया है.
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मुझे पीड़ित लोगों से सच में हमदर्दी होती है. साथ ही ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए मेरा अंतर्मन मुझे उकसाता है. मेरी कविता की चोरी होने पर मेरा क्रोध सीमा पार कर जाता है. ज्योत्स्ना की भलमनसाहत देखिए, मुझे लिखती हैं, 'इसे चोरी कह कर मै कविता पसंद करने वालों का दिल नही दुखाना चाहती। बस कविता के साथ अपना नाम जुड़ा चाहती थी.' नीचे वह कविता दे रही हूँ और ज्योत्स्ना मिश्रा के चित्र भी.
औरतें अजीब होतीं हैं
लोग सच कहते हैं
औरतें अजीब होतीं है
रात भर सोती नहीं पूरा
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं
नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं
दरवाजों की कुंडिया
बच्चों की चादर
पति का मन
और जब जगाती सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं
हवा की तरह घूमतीं
घर बाहर
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती
आशायें
पुराने पुराने अजीब से गाने
गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद ये दूर हो कर ही
सब के करीब होतीं हैं
औरतें सच में अजीब होतीं हैं
कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर
देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध
कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं
बीच में ही छोड़ कर
ढूँढने लगतीं हैं
बच्चों के मोजे पेन्सिल किताब
बचपन में खोई गुडि़या
जवानी में खोए पलाश
मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी
छिपन छिपाइ के ठिकाने
वो छोटी बहन
छिप के कहीं रोती
सहेलियों से लिए दिये चुकाए हिसाब
बच्चों के मोजे,पेन्सिल किताब
खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो ?सो गयीं क्या
खाती रहती झिङकियाँ
न शौक से जीती ,न ठीक से मरती
कोई काम ढ़ंग से नहीं करती
कितनी बार देखी है
मेकअप लगाये,चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी
वो ब्यूटीशियन
वो भाभी ,वो दीदी
चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिखही जाती है
काॅरीडोर में
जल्दी जल्दी चलती
नाखूनों से सूखा आटा झाडते
सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल आई
वो लेडी डाॅक्टर
दिन अक्सर गुजरता है
शहादत में
रात फिर से सलीब होतीहै
सच है
औरतें बेहद अजीब होतीं हैं
सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में तितलियां संजोतीं हैं
और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फ़जा़एं सचमुच खिलखिलातीं हैं
तो ये सूखे कपड़ों ,अचार ,पापड़
बच्चों और सब दुनिया को
भीगने से बचाने को
दौड़ जातीं हैं
खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं
अनगिनत खाइयों पर
अनगिनत पुल पाट देतीं
ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों जंगलों में
नदी कीतरह बहती
कोंपल की तरह फूटती
जि़न्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या ?
ऐसा कोई करता है क्या
एक एक बूँद जोड़ कर
पूरी नदी बन जाती
समन्दर से मिलती तो
पर समन्दर न हो पाती
आँगन में बिखरा पडा़
किरची किरची चाँद
उठाकर जोड़ कर
जूड़े में खोंस लेती
शाम को क्षितिज के
माथे से टपकते
सुर्ख सूरज को उँगली से
पोंछ लेती
कौन कर सकता था
भला ऐसा /औरत के सिवा
फर्क है,अच्छे में बुरे में ,ये बताने के लिये
अदन के बाग का फल
खाती है खिलाती है
हव्वा आदम का अच्छा नसीब होती है
लेकिन फिर भी कितनी अजीब होती है
औरतें बेहद अजीब होती हैं
औरतें अजीब होतीं हैं
______ज्योत्स्ना

ज्योत्स्ना ने ये अंतिम शब्द लिख कर मेरा जैसे आभार व्यक्त किया.... 'अभी तक मै आपको एक celebrity की तरह फाॅलो करती थी, अब आपसे व्यक्तिगत रूप से interact कर रही हूँ. बहुत बड़ी बात है ये मेरे लिए.'