Sunday, 14 August 2016

एक लड़की

एक लड़की

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे बुझता चिराग़
जैसे आँखों में ख्वाब
जैसे बहका हो मन
जैसे तन में अगन
जैसे भटकी-भटकी
जैसे भीग रही हो बिन बरसात के।

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे खेल रही है भीड़ में
जैसे खोज रही है भीड़ में
किसी का थामने को हाथ
हाय कोई तो दे उसका साथ
किसी को चुरा कर ले जाए
उड़ जाए बेहद्दी आकाश में।

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे डोल रही है कटी पतंग सी
ज़िन्दगी ऐसे जैसे मलंग सी
आदतें ऐसी जैसे लफंग सी
रास्तों की कमी नहीं
मंज़िल का पता नहीं
जाए तो जाए कहाँ अवसाद में?

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे हँसूँ उसके ऊपर
या कि रोऊँ उसके ऊपर
या कि लिखूँ गाथा उसकी
या कि छोड़ूँ उसका किस्सा
लिख-लिख कर बदनाम कहानी
उसने खुद को दी सौगात में।

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