Tuesday, 2 August 2016

Jyotsna Misra

Jyotsna Misra

मेरी फेसबुक मित्र ज्योत्स्ना मिश्रा (Jyotsna Misra) ने कल शाम मुझे यह सन्देश भेजा कि उनकी एक कविता वायरल हो रही है, बहुत लोगों के स्टेटस पर नज़र आ रही है, वे क्या करें?
मैं खुद इस साहित्य चोरी की Victim (पीड़ित) रही हूँ. मैं इसीलिए अपनी कविता-कहानी शेयर करने के लिए मना करती हूँ कि समयान्तर में किसी अन्य के नाम से कहीं की कहीं पहुँच जाएगी. आप ही बताएँ कि इस समस्या का समाधान क्या है? कुछ नासमझ लोग कहते हैं कि आपका लिखा बहुत कोगों तक पहुँच रहा है, आपको ख़ुशी होनी चाहिए. अजी जब हमारे लिखे के साथ हमारा नाम ही नहीं है, लिखे का श्रेय पोस्ट उड़ाने वाले ले रहे हैं तो क्या ख़ाक ख़ुशी होगी? अब नीचे पढ़िए....
Conversation started today
17:35
Jyotsna Misra
मनिका जी एक कमाल की बात आपको बताना चाहती हूँ मैने 11अप्रैल को अपनी एक कविता "औरतें अजीब होती हैं" फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी. मै कोई कवि नही एक गायनकोलाॅजिस्ट हूँ जिसे कभी कभार अपने मरीजों से किस्से कविताएँ मिल जाती हैं.
यह कविता मैने इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन के महिला दिवस के समारोह के लिए लिखी थी और पढ़ी थी.
अब पता चल रहा है कि यह बहुत लोगों को पसंद आ रही है.
इसके सैकड़ों शेयर हो चुके हैं.
कविता कवि को पीछे छोड़ बहुत आगे निकल चुकी है.
कविता वायरल है. कवि का कोई नाम नहीं जानता।
गूगल आंटी भी कविता से परिचित हैं, कवि से नहीं।
यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी
पर कुछ अति उत्साहित महानुभावों ने इसे गुलजार साहब के माथे मढ़ दिया है.
कौन समझाये इन्हें कि गुलजार साहब इतना कच्चा नहीं लिखते।
बेचारे गुलजार साहब।
और बेचारी मैं.
आपकी मित्र सूची में शामिल ममता कश्यप जी ने भी इसे गुलजार की कह कर पोस्ट किया है.
डर है किसी दिन आपने भी इसे गुलजार की कह दिया तब तो ये अफवाह सच हो जायेगी।
क्या किया जाये ?
कुछ मदद करेंगीं क्या ?
कितनों से एतराज करूं? पता नहीं, कहाँ कहाँ घूम रही है?
क्राफ्ट के हिसाब से बहुत कच्ची है. मुझे अंदाज़ा ही नहीं लगा कि ऐसे उड़ जायेगी।
फेसबुक पर सर्च में "औरते अजीब होती हैं" डाल कर देखें। अनगिनत पोस्ट हैं.
किस किस को बताऊं? समझ नही आ रहा, कैसे इसे अपनी क्लेम करूं?
ममता कश्यप (Mamta Kashyap) जी ने 29 जुलाई को, गुलजार की है, ये क्या सोच कर लिख दिया?
ध्रुव जी ने भी लाइक मार दिया।
richasameer03 ने अपने पेज अपना अपना आसमान में इसे 14 अप्रैल को प्रकाशित किया है.
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मुझे पीड़ित लोगों से सच में हमदर्दी होती है. साथ ही ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए मेरा अंतर्मन मुझे उकसाता है. मेरी कविता की चोरी होने पर मेरा क्रोध सीमा पार कर जाता है. ज्योत्स्ना की भलमनसाहत देखिए, मुझे लिखती हैं, 'इसे चोरी कह कर मै कविता पसंद करने वालों का दिल नही दुखाना चाहती। बस कविता के साथ अपना नाम जुड़ा चाहती थी.' नीचे वह कविता दे रही हूँ और ज्योत्स्ना मिश्रा के चित्र भी.
औरतें अजीब होतीं हैं
लोग सच कहते हैं
औरतें अजीब होतीं है
रात भर सोती नहीं पूरा
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं
नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं
दरवाजों की कुंडिया
बच्चों की चादर
पति का मन
और जब जगाती सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं
हवा की तरह घूमतीं
घर बाहर
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती
आशायें
पुराने पुराने अजीब से गाने
गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद ये दूर हो कर ही
सब के करीब होतीं हैं
औरतें सच में अजीब होतीं हैं
कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर
देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध
कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं
बीच में ही छोड़ कर
ढूँढने लगतीं हैं
बच्चों के मोजे पेन्सिल किताब
बचपन में खोई गुडि़या
जवानी में खोए पलाश
मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी
छिपन छिपाइ के ठिकाने
वो छोटी बहन
छिप के कहीं रोती
सहेलियों से लिए दिये चुकाए हिसाब
बच्चों के मोजे,पेन्सिल किताब
खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो ?सो गयीं क्या
खाती रहती झिङकियाँ
न शौक से जीती ,न ठीक से मरती
कोई काम ढ़ंग से नहीं करती
कितनी बार देखी है
मेकअप लगाये,चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी
वो ब्यूटीशियन
वो भाभी ,वो दीदी
चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिखही जाती है
काॅरीडोर में
जल्दी जल्दी चलती
नाखूनों से सूखा आटा झाडते
सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल आई
वो लेडी डाॅक्टर
दिन अक्सर गुजरता है
शहादत में
रात फिर से सलीब होतीहै
सच है
औरतें बेहद अजीब होतीं हैं
सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में तितलियां संजोतीं हैं
और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फ़जा़एं सचमुच खिलखिलातीं हैं
तो ये सूखे कपड़ों ,अचार ,पापड़
बच्चों और सब दुनिया को
भीगने से बचाने को
दौड़ जातीं हैं
खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं
अनगिनत खाइयों पर
अनगिनत पुल पाट देतीं
ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों जंगलों में
नदी कीतरह बहती
कोंपल की तरह फूटती
जि़न्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या ?
ऐसा कोई करता है क्या
एक एक बूँद जोड़ कर
पूरी नदी बन जाती
समन्दर से मिलती तो
पर समन्दर न हो पाती
आँगन में बिखरा पडा़
किरची किरची चाँद
उठाकर जोड़ कर
जूड़े में खोंस लेती
शाम को क्षितिज के
माथे से टपकते
सुर्ख सूरज को उँगली से
पोंछ लेती
कौन कर सकता था
भला ऐसा /औरत के सिवा
फर्क है,अच्छे में बुरे में ,ये बताने के लिये
अदन के बाग का फल
खाती है खिलाती है
हव्वा आदम का अच्छा नसीब होती है
लेकिन फिर भी कितनी अजीब होती है
औरतें बेहद अजीब होती हैं
औरतें अजीब होतीं हैं
______ज्योत्स्ना

ज्योत्स्ना ने ये अंतिम शब्द लिख कर मेरा जैसे आभार व्यक्त किया.... 'अभी तक मै आपको एक celebrity की तरह फाॅलो करती थी, अब आपसे व्यक्तिगत रूप से interact कर रही हूँ. बहुत बड़ी बात है ये मेरे लिए.'



18 comments:

  1. MAM MUJHE AAPKA CONTACT NO. CHAHIYE i am RJ Preeti PLS SEND priti3010@gmail.com

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  2. bhut hee sundar abhivykti hai

    dr a dunputh

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  3. मजे की बात यह है कि ज्योत्स्ना मिश्रा की (?) कविता गुलजार के नाम से लोग शेयर कर रहे हैं और ज्योत्स्ना मिश्रा इस पर दु:खी है कि उसकी कविता उसके नाम से नहीं आ रही।
    पर सच यह है कि जिसे ज्योत्स्ना मिश्रा अपनी कविता कह रही है, वह कविता तो मेरी दो कविताओं को उठाकर उनमें हेरफेर और जोड़ तोड़ कर 'तैयार' की गयी है। ज्योत्स्ना मिश्र स्वयं कहती हैं कि वे कवि नहीं बल्कि मेडिकल की व्यक्ति है।

    रही बात मेरी कविताओं की, तो वर्ष २००४ में प्रकाशित मेरे उक्त संकलन सहित अन्य भी अनेक कविताएँ कविताकोश पर लगभग ९-१० वर्ष से विद्यमान हैं। हिन्दयुग्म वाले पुरस्कार के रूप में कविता प्रतियोगिता के विजेताओं को ९ वर्ष पहले ये बाँट चुके हैं, ये कविताएँ मेरी साइट और ब्लॉग सहित अन्य कई संकलनों में सम्मिलित रही हैं। इसलिए कई माध्यमों से दुनियाभर में पहुँच चुकी हैं, उपलब्ध हैं। नेट पर पड़ी चीज उठाने में माहिर लोग भी इन्हें देखते हैं। इसलिए ज्योत्स्ना मिश्रा को दूसरों की रचना की पंक्तियाँ उठाकर बीच बीच में अपने मसाले डाल कर कविता लिखने से बाज आना चाहिए। वरना चोर को मोर वाली बात सच हो जाती है।

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  4. http://www.kavitakosh.org/kk/औरतों_के_नाम_/_कविता_वाचक्नवी

    कभी पूरी नींद तक भी
    न सोने वाली औरतो!
    मेरे पास आओ,
    दर्पण है मेरे पास
    जो दिखाता है
    कि अक्सर फिर भी
    औरतों की आँखें
    खूबसूरत होती क्यों हैं,
    चीखों-चिल्लाहटों भरे
    बंद मुँह भी
    कैसे मुस्कुरा लेते हैं इतना,

    और, आप!
    जरा गौर से देखिए
    सुराहीदार गर्दन के
    पारदर्शी चमड़े
    के नीचे
    लाल से नीले
    नीले से हरे
    और हरे से काले होते
    उँगलियों के निशान
    चुन्नियों में लिपटे
    बुर्कों से ढँके
    आँचलों में सिमटे
    नंगई सँवारते हैं।

    टूटे पुलों के छोरों पर
    तूफान पार करने की
    उम्मीद लगाई औरतो !
    जमीन धसक रही है
    पहाड़ दरक गए हैं
    बह गई हैं- चौकियाँ
    शाखें लगातार काँपती गिर रही हैं
    जंगल
    दल-दल बन गए हैं
    पानी लगातार तुम्हारे डूबने की
    साजिशों में लगा है,

    अंधेरे ने छीन ली है भले
    आँखों की देख,
    पर मेरे पास
    अभी भी बचा है
    एक दर्पण
    चमकीला।

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  5. http://www.kavitakosh.org/kk/औरतें_डरती_हैं_/_कविता_वाचक्नवी

    औरतें डरती हैं : कविता वाचक्नवी

    अजीब सच हैं ये
    कि औरतें डरती हैं
    अपने शब्दों के अर्थ समझाने में।

    काली किताब के
    पन्नों में दबे शब्द
    किसी अंधी खोह की सीढ़ियाँ
    उतर जाते हैं,
    किरण-भर उजाला
    घडी़-भर को
    शब्दों का मुँह फेरता है ऊपर
    पर भीड़ के हाथों
    चुन-चुन
    अर्थ तलाशती खोजी सूँघें
    छिटका देंगी अनजानी गंध की
    बूँदें दो
    और गिरफ़्तार हो जाएगी
    पन्ना-पन्ना पुस्तक
    जाने कितनी उँगलियों की गंध सहेजी

    इसीलिए डरती हैं औरतें
    अपने सारे
    अजीब सच लेकर
    सच में।

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  6. कविता जी आपकी कवितायें बहुत ही सुंदर हैं, अफसोस हुआ कि अभी तक आपको पढने का सौभाग्य नहीं मिला, मैने जो लिखा वो सीधे सादे शब्दो मे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी लिखीहै, आप इसे अपनी कृति कह कर खुद को छोटा क्यों कर रहीं हैं,आप एक उत्कृष्ट कवि लगीं मुझे
    मैं कवि नहीं हूँ,लेकिन अपनी नज़रों में ही सही सम्मान की हकदार हूँ,मेरी कविता और आपकी कविता में बस एक ही साम्य है,कि ये दोनों ही स्त्री के विषय पर, एक स्त्री के दृष्टिकोण से लिखी गयीं हैं,
    जहाँ तक मुझे लगता है असल समस्या यह है कि मेरा लिखा हुआ इतना ज्यादा पापुलर क्यों हुआ जबकि आपनै इसी विषय पर बेहतर लिखा है, तो कविता जी श्रेष्ठता और लोकप्रियता में कोई साम्य नहीं बिठाया जा सकता, कब क्या पाठक के दिल को छू जाये कहा नहीं जा सकता,
    आपको क्या लगता है कि" औरतें अजीब होतीं है"इसलिये लोकप्रिय हुई क्योंकि इसका लेखन बहुत अच्छा था?(दूसरे शब्दों में क्योंकि ये आपकी कविताओं की चोरी थी?)
    नहीं कविता जी ये इसलिए लोकप्रिय हुई क्योंकि इससे औरतों नें खुद को रिलेट किया उन औंरतों ने भी जो आपके जितनी महान नहीं थीं
    इसमें नाखूंनों से आटा झाड़ती डाक्टर मैं हूँ, चेहरे के नील छिपाती काँस्टेबल लड़की सचमुच ड्यूटी पर जाने के पहले पेन किलर लेने मेरी क्लीनिक पर आई थी,मैनें अपनीं माँ को देखा है जरूरी मीटिंग्स में जाने के पहले लदरफदर भागते हुये अचार की बरनियाँ सहेजते
    वो टीचर मेरे बच्चों की क्लासटीचर है
    तो कविता जी आप अपने आप को तुच्छ न करें इस कविता को अपनी कह कर,इसमें क्राफ्ट की महानता जैसा कुछ नहीं ये बहुत सीधे सादे शब्दों में कही गयी स्त्रीमन की बात है, और स्त्रीमन पर तो आपका एकाधिकार नहीं ही समझती होंगीं आप शायद??
    वैसे कभी शैलजा पाठक की इसी विषय पर "कमाल की औरतें "पढिये ,बेइंताहाई खूबसूरत लिखा है उन्होंने इसी विषय पर

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  7. Hey Jyotsna! I love this poem of yours. My name is Sunjoy Shekhar. I have translated some work of Gulzar Saa'ab! If you permit me, I would love to translate this poem in English. I have cried reading this and must have read it at least a hundred times. I can see my mother, my aunts, my sisters, cousins in the poem. Do let me know if i may. write me at sunjoy@sunjoyshekhar.com

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    1. Sorry for late reply ,sanjay ji actually i was waiting for my poetry collection by same name to get published, so that I can send it to you, I Will contact you on email.

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    2. Sorry for late reply ,sanjay ji actually i was waiting for my poetry collection by same name to get published, so that I can send it to you, I Will contact you on email.

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  8. bahut achchi prastuti Jyotsna Ji... Meri mamma ne aapki kavita abhi share ki gulzar ji k naam se.. aur na jane kyu laga ki ek stri hi stri ki bhavnao ko vyakta kar sakti hai.. internet par dhunda aur meri vikalta sahi nikli... unhe message bheja.. aur jaha kahi yah kavita dikhegi.. mai aapka naam share zarur karungi...

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    1. बहुत शुक्रिया जुही आपका और आपकी माँ का, ये मेरी नहीं हम सब की कविता है,

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    2. बहुत शुक्रिया जुही आपका और आपकी माँ का, ये मेरी नहीं हम सब की कविता है,

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  9. Jyotsna ji, a friend of mine has recited this poem of yours and it's beautiful. I wish I could somehow send you her recording. My mail id is vasucrazin@gmail.com.
    Respect and regards
    Vasuda Bhaskar

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    1. Vasuda, thanks a lot for appreciation, my email is docjyotsna1@gmail.com.

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    2. Vasuda, thanks a lot for appreciation, my email is docjyotsna1@gmail.com.

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    4. Thanks a lot vasuda for appreciation, my id is docjyotsna1@gmail.com

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    5. Thanks a lot vasuda for appreciation, my id is docjyotsna1@gmail.com

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