Wednesday, 7 September 2016

फ्री सेक्स

फ्री सेक्स

पत्रिका 'हंस' के सितंबर अंक में प्रकाशित विश्वदीपक के फ्रीसेक्स पर लिखे गए लेख ने एक बार फिर इस मुद्दे को उठाया है कि क्यों ना स्त्री को (पुरुष को भी) फ्री सेक्स यानि जिसके साथ मन चाहे, यौन सम्बन्ध बनाने की आज़ादी हो?

इसी वर्ष मई में यह मुद्दा इन्टरनेट पर उछला था जब ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा था, 'जिस सेक्स में स्वतंत्रता का अहसास नहीं है, वह रेप के बराबर है.' कविता की माँ लक्ष्मी कृष्णन ने भी अपनी बेटी के कथन से सहमति जताते हुए लिखा था कि हाँ, उन्होंने भी फ्री सेक्स का आनंद लिया है और कविता उस फ्रीसेक्स की ही उपज है. उनका मतलब यह था कि उन्होंने अपने पति के साथ स्वेच्छा से सम्बन्ध बनाया, उसी से कविता बेटी उत्पन्न हुई.

उस समय जो भी बहस हुई, उसमें कविता और उनकी माँ ने फ्रीसेक्स का अर्थ यह दिया कि पति के साथ अपनी इच्छा से सेक्स किया. यानि उन्हें फ्री सेक्स का सही अर्थ नहीं मालूम था.

पति के साथ सेक्स किया तो क्या अनोखा किया?

फ्री सेक्स का अर्थ है, जिस-तिस के साथ यौन सम्बन्ध बना लेना. One night stand की तरह.

उस समय मधुमती अधिकारी ने इस पर पोस्ट लिखी थी और मुझसे कहा था कि लोग फ्री सेक्स का अर्थ नहीं समझते, मैं इस पर कुछ लिखूँ। लेकिन मैं नहीं लिख पाई थी. आज फिर से इस विषय में पढ़ा तो सोचा, इस लेख के हवाले से ही कुछ लिखूँ।

यौन संबंधों की आज़ादी वैदिक काल से चली आ रही है. मराठी इतिहासकार विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े की चर्चित पुस्तक 'भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' में कहा गया है.... 

तीनों लोकों की रचना करने वाले ब्रह्मा में अपनी बेटी सरस्वती के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित किया था.

यम और यमी नाम के भाई बहन एक दूसरे के साथ पति-पत्नी की तरह रहते थे.

पाराशर ऋषि ने सुगंधी नाम की मत्स्य कन्या के साथ खुले में सम्भोग किया था.

चन्द्रमा अपने गुरू बृहस्पति की पत्नी तारा के साथ पति की हैसियत से रहते थे.

द्रौपदी और कुंती की कथा किसे नहीं मालूम?

लेखक विश्वदीपक ने अपने लेख में प्रश्न किया है, 'अगर यमी की भाई के साथ सम्भोग करने की इच्छा गलत नहीं है तो फिर किसी भी दूसरी लड़की की अपनी पसंद के पुरुष के साथ सम्भोग करने की इच्छा कैसे गलत हो गई?'

वैदिक काल की इस जीवन शैली का समर्थन मैं नहीं करती. मैं नहीं कहती कि वह अनुकरणीय है. सगे, खून के रिश्तों में हुए इस घालमेल की बातें पढ़-सुन कर मेरे मन में वितृष्णा उपजती है. उस समय का युग और था. तब चाहे भगवान पैदा हुए हों जिनकी हर बात को हम सही ठहराने के तर्क ढूँढ लेते हैं लेकिन इस युग तक आते-आते हमने जो सभ्यता विकसित की है, उसमें इस प्रश्न की कोई गुंजाइश नहीं कि उन्होंने ऐसा किया तो हम क्यों नहीं कर सकते? आज पीछे लौट कर हम उनसे यह नहीं पूछ सकते कि जैसा हम कर रहे हैं, आप वैसा क्यों नहीं कर सकते?

हर युग की मान्यता अलग होती है. रिश्तों का सम्मान ज़रूरी है, उसमें घालमेल नहीं होना चाहिए,

हाँ, फ्री लोगों को गैरों के साथ फ्री सेक्स करने की आज़ादी होनी चाहिए. मैं फ्री सेक्स की समर्थक हूँ, लेकिन रिश्तों में गन्दगी की नहीं.

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