Wednesday, 5 October 2016

प्राक्कथन

प्राक्कथन

(मेरे सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह 'कभी हम भी तुम भी थे आशना' का प्राक्कथन)

मेरी सर्जनात्मक साहित्य से जुड़ी 16 पुस्तकें 1996 तक प्रकाशित हो चुकी थीं. उसके बाद लगभग 15 वर्ष मैं नितांत अकेलेपन में रही, जिसे 'मैं वैराग्य' कहती हूँ. पुस्तकों से, लिखने-पढ़ने से, सामाजिक सम्मिलनों से एकदम दूर. इस दुनिया में रहते हुए भी इस दुनिया में नहीं. इस बीच मैं कैंसर नाम की अत्यंत भयंकर और शाही बीमारी के दौर से भी गुज़री. जीने की समस्त इच्छाएँ जब समाप्त हो जाएँ, कोई मोहमाया न रहे, लगे, सब जी लिया, कुछ और जीने को सेष नहीं है, हर राग से दूर, तो उसे वैराग्य ही कहेंगे ना?

मुझे अपने अतीत की बहुत सारी बातें भूल गईं, लोग भूल गए, कभी-कभी लगता, बस एक लकीर है, एक लक्ष्मण रेखा, जिसे पार किया तो सब समाप्त. दिमाग़ फ़ेल. लेकिन दिमाग़ फ़ेल होने से बच गया, बस खाली हो गया. या यूँ कहूँ कि ताज़ा भरने के लिए फ्रेश हो गया.

मुझे नियति पर घनघोर विश्वास है. चमत्कारों पर भी. तो यह नियति का ही खेल था कि अगस्त, 2012 में मेरे लेखक का पुनर्जन्म हुआ. भगवान के निर्देश से मरी हुई मैंने दोबारा जन्म लिया. सोई हुई मैं लंबी नींद से जागी। साहित्य मेरे लिए एकमात्र शरणस्थली रहा है, जहाँ मैंने पहले भी कई बार टूटते हुए शरण ली है.

पुनर्जन्म के बाद मैंने जो भी लिखा, स्वान्तः सुखाय लिखा. चाहे छपने के लिए कहीं भेजा हो, परंतु वे स्वान्तः सुखाय ही हैं. बीच-बीच में मानसिक तौर पर वापस अपनी खोह में लौट जाती हूँ, जहाँ कोई दूसरा नहीं है. न किसी लक्ष्य पर पहुँचने की इच्छा, न तैयारी. न किसी से मिलने की ललक, न ज़रूरत. मैं उस मुकाम पर हूँ जहाँ मैं अपने आप में संतुष हूँ. आप कह सकते हैं कि मैं मर चुकी हूँ.

पाँच-छह पुस्तकें छपने के लिए तैयार हैं, पर अभी भी जैसे अर्धनिद्रा में हूँ. उदासीनता का दौर है. आलस है. वैराग्य है. उत्साहहीनता है. एकाध बार कोशिश की थी प्रकाशक खोजने की लेकिन दिल और दिमाग़ में इतनी ताकत नहीं थी कि जी-जान से जुट जाती. इस पुस्तक के छपने के पीछे बहुत सालों पहले की लेखिका सखी कृष्णा अग्निहोत्री का स्नेह-सौहार्द्य काम आया, जिनके सहयोग से श्री अरविन्द बाजपेयी, अमन प्रकाशन, कानपुर ने बिना किसी शर्त के पुस्तक छापने के लिए सहमति दी. मैं इन दोनों की हृदय से आभारी हूँ. उन पाठकों की भी शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने पुस्तक रूप में आने से पूर्व इन कहानियों को पढ़ा और सराहा.

मणिका मोहिनी 

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