Sunday, 22 January 2017

कहाँ है अपनापन? Kavita 259

कहाँ है अपनापन?

आँखों में सपने
सपनों में अपने
कहाँ है अपनापन?

बाहर हलचल
भीतर दहशत
खून में वहशीपन।

कलकल कलपा
छलछल छलका
लाज का पानीपन।

ना वे बातें
ना मुलाकातें
ना वह प्रेमीपन।

मन आवारा
खुद से हारा
कैसा पागलपन।

Tuesday, 17 January 2017

मैं अदृश्य हो जाऊँगी Kavita 258

मैं अदृश्य हो जाऊँगी

अब तुम मेरे
बिम्ब-चक्र से निकलने वाली
तरंगों के स्पर्श की सीमा में हो।

मैं भौतिक अर्थों में देह नहीं हूँ
मन भी नहीं हूँ
मैं एक कल्याणकारी किरण-समूह हूँ
जिसकी जादुई रोशनी में धुल कर
तुम अपने को नया कर पाओगे।

मेरा अस्तित्व तुम्हें बनाने के लिए है
बिगाड़ने के लिए नहीं।

समय की रफ़्तार के साथ
धीरे-धीरे मौसम में रंग घुलेंगे
हवाओं में बजेगा संगीत।
खुशबुओं की परिधि में होंगे तुम।

मैं आकाश में उड़ते हुए देखूँगी
तुम्हारे चेहरे पर सच्ची खिलखिलाहट।

तुम्हें दृश्य में बदल कर
मैं अदृश्य हो जाऊँगी।

Monday, 16 January 2017

कुछ चीज़ें टूटने के लिए नहीं होतीं Kavita 257

कुछ चीज़ें टूटने के लिए नहीं होतीं

वह मेरे पास आता है लौट-लौट कर
मैं उसके पास जाती हूँ लौट-लौट कर
कुछ चीज़ें टूटने के लिए नहीं होतीं।

छुप-छुप कर पढ़ता है वह मुझे
छुप-छुप कर पढ़ती हूँ मैं उसे
कुछ शौक स्थायी भाव की तरह होते हैं।

जलता है वह मेरे परिचित लड़कों से
जलती हूँ मैं उसकी परिचित लड़कियों से
कुछ ईर्ष्याएं सकारात्मक होती हैं।

लड़े चाहे जितना, उसे बातें मेरी ही पसंद
लड़ूँ चाहे जितना, मुझे बातें उसकी ही पसन्द
कुछ नकार ह्रदय से स्वीकार होते हैं।

वह ना-ना करके भी रीझता मुझ पर ही है
मैं ना-ना करके भी रीझती उस पर ही हूँ
कुछ रिश्ते ऐसे ही बकवास होते हैं।

Sunday, 15 January 2017

एक उदास कविता Kavita 256

एक उदास कविता

फिर रहने लगी हूँ उदास
महसूस होते हो तुम आसपास।

कितना अजीब सा यह सब कुछ है
तुम हो भी और नहीं भी हो।

हवा में तैरती हुई एक छाया है
फिसल जाती है छू कर मुझे।

प्यार का अपराधीकरण होगा
जो मैंने कह दिया तुम्हें अपना।

कुछ तो है जो बरस जाता है
न कहीं बादल है, न बिजली है।

चाह तो है पर राह नहीं
नीति वाक्यों का हुजूम है।

मौन के सन्नाटे को तुम भी सुनो
अब शब्दों का शोर बेमानी है।

प्रेम की कारीगरी Kavita 255

प्रेम की कारीगरी

तुम यादों में आते हो
तो सपने साथ लाते हो।
सजाते भी तुम हो
तोड़ते भी तुम हो।
क्या इसी को कहते हैं
प्रेम की कारीगरी?

नहीं, यह प्रेम नहीं
प्रेम से अलग कुछ है।
प्रेम तो तब होता
जब हम कभी मिलते।
क्या इसी को कहते है
रूह से रूह तक?

वक़्त सिर्फ बीता नहीं
रगों में उतर गया है।
एक दूसरे का सोचना तक
हम सुन लेते हैं।
क्या इसी को कहते हैं
दिल को दिल से राह?

जहाँ तुम व्यर्थ हो
वहाँ मैं सार्थक।
जहाँ मैं व्यर्थ हूँ
वहाँ तुम सार्थक।
क्या इसी को कहते हैं
पूरक होना?

तुम मुझे जियो
मैं तुम्हें जिऊँ।
यह जीने का वरदान है
समाधिस्थ होने का पर्याय।
क्या इसी को कहते हैं
सम्पूर्ण होना?