Sunday, 15 January 2017

प्रेम की कारीगरी Kavita 255

प्रेम की कारीगरी

तुम यादों में आते हो
तो सपने साथ लाते हो।
सजाते भी तुम हो
तोड़ते भी तुम हो।
क्या इसी को कहते हैं
प्रेम की कारीगरी?

नहीं, यह प्रेम नहीं
प्रेम से अलग कुछ है।
प्रेम तो तब होता
जब हम कभी मिलते।
क्या इसी को कहते है
रूह से रूह तक?

वक़्त सिर्फ बीता नहीं
रगों में उतर गया है।
एक दूसरे का सोचना तक
हम सुन लेते हैं।
क्या इसी को कहते हैं
दिल को दिल से राह?

जहाँ तुम व्यर्थ हो
वहाँ मैं सार्थक।
जहाँ मैं व्यर्थ हूँ
वहाँ तुम सार्थक।
क्या इसी को कहते हैं
पूरक होना?

तुम मुझे जियो
मैं तुम्हें जिऊँ।
यह जीने का वरदान है
समाधिस्थ होने का पर्याय।
क्या इसी को कहते हैं
सम्पूर्ण होना?

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