Sunday, 15 January 2017

एक उदास कविता Kavita 256

एक उदास कविता

फिर रहने लगी हूँ उदास
महसूस होते हो तुम आसपास।

कितना अजीब सा यह सब कुछ है
तुम हो भी और नहीं भी हो।

हवा में तैरती हुई एक छाया है
फिसल जाती है छू कर मुझे।

प्यार का अपराधीकरण होगा
जो मैंने कह दिया तुम्हें अपना।

कुछ तो है जो बरस जाता है
न कहीं बादल है, न बिजली है।

चाह तो है पर राह नहीं
नीति वाक्यों का हुजूम है।

मौन के सन्नाटे को तुम भी सुनो
अब शब्दों का शोर बेमानी है।

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