Monday, 16 January 2017

कुछ चीज़ें टूटने के लिए नहीं होतीं Kavita 257

कुछ चीज़ें टूटने के लिए नहीं होतीं

वह मेरे पास आता है लौट-लौट कर
मैं उसके पास जाती हूँ लौट-लौट कर
कुछ चीज़ें टूटने के लिए नहीं होतीं।

छुप-छुप कर पढ़ता है वह मुझे
छुप-छुप कर पढ़ती हूँ मैं उसे
कुछ शौक स्थायी भाव की तरह होते हैं।

जलता है वह मेरे परिचित लड़कों से
जलती हूँ मैं उसकी परिचित लड़कियों से
कुछ ईर्ष्याएं सकारात्मक होती हैं।

लड़े चाहे जितना, उसे बातें मेरी ही पसंद
लड़ूँ चाहे जितना, मुझे बातें उसकी ही पसन्द
कुछ नकार ह्रदय से स्वीकार होते हैं।

वह ना-ना करके भी रीझता मुझ पर ही है
मैं ना-ना करके भी रीझती उस पर ही हूँ
कुछ रिश्ते ऐसे ही बकवास होते हैं।

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