Tuesday, 17 January 2017

मैं अदृश्य हो जाऊँगी Kavita 258

मैं अदृश्य हो जाऊँगी

अब तुम मेरे
बिम्ब-चक्र से निकलने वाली
तरंगों के स्पर्श की सीमा में हो।

मैं भौतिक अर्थों में देह नहीं हूँ
मन भी नहीं हूँ
मैं एक कल्याणकारी किरण-समूह हूँ
जिसकी जादुई रोशनी में धुल कर
तुम अपने को नया कर पाओगे।

मेरा अस्तित्व तुम्हें बनाने के लिए है
बिगाड़ने के लिए नहीं।

समय की रफ़्तार के साथ
धीरे-धीरे मौसम में रंग घुलेंगे
हवाओं में बजेगा संगीत।
खुशबुओं की परिधि में होंगे तुम।

मैं आकाश में उड़ते हुए देखूँगी
तुम्हारे चेहरे पर सच्ची खिलखिलाहट।

तुम्हें दृश्य में बदल कर
मैं अदृश्य हो जाऊँगी।

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