Wednesday, 15 February 2017

लड़की हेल्पर

लड़की हेल्पर

आजकल मेरी दुकान में एक 18 वर्षीय लड़की हेल्पर का काम करती है। गाँव की है, 7 भाई-बहन हैं, माँ-बाप ठेले पर सब्ज़ी बेचने का काम करते हैं। अन्य बच्चे भी कुछ करते होंगे। मैंने इसे बस यूँ ही रख लिया जैसे पहले एक लड़की के बारे में बता चुकी हूँ। आज के ज़माने में बिना किसी आर्थिक मज़बूती के माँ-बाप द्वारा 7-7 बच्चे पैदा करने में इस बेचारी का क्या दोष? 12वीं पास है, आगे की पढ़ाई ओपन से कर रही है। मैंने उसे खुद ही कह दिया है कि अपनी किताबें लेकर दुकान पर आ जाया करे और खाली समय में पढ़ लिया करे।
एक दोपहर मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। मैंने पूछा, 'क्या चाहिए? कुछ कहना है क्या?' बोली, 'मैम, आप मुझे कुछ अच्छी बातें सिखाइए। मैं अच्छी बातें सीखना चाहती हूँ।'
इसकी नौकरी के शुरू में ही मैंने इसे और दुकान में काम कर रही एक अन्य बड़ी लड़की को कभी झूठ न बोलने, कभी चोरी न करने, समय की पाबंदी और अनुशासन का पाठ पढ़ाया था। दोनों एक साथ बोली थीं, 'मैम, हम चोरी नहीं करते।' मैंने कहा था, 'दुकान खुलने का समय 10 बजे है। तुम दोनों रोज़ सवा दस आती हो। वक़्त की चोरी भी चोरी होती है।'
शायद मेरी इन बातों से लड़कियों को लगा हो कि मुझे गपशप का शौक है, जबकि मुझे बात करना बिलकुल पसंद नहीं। लेकिन उनका, खासतौर से छोटी का सौभाग्य देखिए कि उस दिन से रोज़ दोपहर में, यदि मैं दुकान पर होती तो मेरा उपदेश व्याख्यान शुरू हो जाता और वे दोनों उत्तम शिष्या की भाँति ध्यान लगाए सुनती रहतीं। बीच-बीच में जिज्ञासा भरे प्रश्न भी करतीं, अपनी बातें भी बतातीं। दोपहर में ग्राहक नहीं आते थे।
अनायास मेरे मस्तिष्क में यह कौंधा कि मेरे बच्चे यानि पोता-पोती मुझसे कभी इस तरह बात नहीं करते। इन फ़ैक्ट, वे घर में अपने माता-पिता के साथ भी ज़्यादा बात नहीं करते, अपने-अपने कमरे में रहते हैं, पढ़ाई करते या जो भी करते। मैंने यदि कभी उनसे कहा कि 'बच्चों, ऐसा-ऐसा है,' तो उनका तुरंत उत्तर आता है, 'हमें सब पता है।' कौन सी बात है जो आजकल के बच्चों को नहीं पता? बताने के लिए इंटरनेट है। बड़ों की और अपनों की ज़रूरत ख़त्म हो गई है।
मैं चूँकि संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी, और उससे ज़्यादा समय अकेली गुज़ारने के बाद भी संयुक्त परिवार ही मुझे पसंद है, इसलिए कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता था कि हम लोग घर में हर समय आपस में बात क्यों नहीं करते? बात करने का समय बँधा हुआ है, खाना खाते समय या चाय-नाश्ता करते समय या बाहर कहीं साथ घूमने जाएँ तब। बचपन में कभी घर में बात करने के लिए हम इस तरह समय के बंधन में नहीं रहे।
इन दिनों यह बात practically समझ में आई कि बातों का मज़ा और सुख साधन-सम्पन्न लोग नहीं भोगते, घरवाले एक-दूसरे को कम्पनी तब देते हैं जब परिवार के सदस्य छोटे से घर में सिकुड़ कर रह रहे हों। जितना आप आगे बढ़ेंगे, जितना आप टेक्नोलॉजी के नज़दीक जाएँगे, उतना आप अपनों से दूर होते जाएँगे। हम पुराने लोग, (इस मामले में मैं अपने को पुराना ही कहूँगी), इस आधुनिक सभ्यता में अपनी जड़ों से कट रहे हैं, टूट रहे हैं।
अपनी जड़ों से दोस्ती अब नहीं हो सकती। अब वह पहले वाला वक़्त नहीं आ सकता क्योंकि हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं, पीछे लौटना मुश्किल है। मैंने इन दिनों प्रैक्टिकल अनुभव से यह जाना है। जड़ों तक लौटने के लिए हमें गरीब यानि संसाधनहीन होना पड़ेगा, टेक्नोलॉजी से दूर होना पड़ेगा, जो संभव नहीं है। उन्नति करने की कोशिश में हम आगे बढ़े हैं। हमारी पीढ़ी को अभी भी पुरानी तरह के रिश्तों को जीने की आदत है। लेकिन इतना चल कर आगे आने के बाद पीछे लौटना संभव नहीं। आखिर यह उन्नति, यह तरक्की, यह नई सभ्यता हमारी ही तो चाही हुई है।

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