Sunday, 12 February 2017

30. एक भावचित्र : मैं प्रेममयी

30. एक भावचित्र : मैं प्रेममयी
कुछ अहसास ऐसे होते हैं जो प्रेम को पूजा बना देते हैं और कुछ ऐसे, जो प्रेम को पतन। मेरा प्रेम हमेशा मुझे आध्यात्मिक ऊंचाइयां देता है और मैं भक्त की श्रेणी में होती हूँ। मैंने आध्यात्मिक रूप से पतित और कुसंस्कारी लोगों से कभी प्रेम नहीं किया। मैं डरती हूँ कि ऐसे लोगों के सितारे मेरे सितारों के साथ मिल कर विध्वंस मचा सकते हैं। मुझे रचना-धर्मिता पसंद है, तोड़-फोड़ नहीं। मैं प्रेम को रचती हूँ, कभी मिटाती नहीं। यूँ भी मेरा प्रेम एकांगी होता है। आत्मा से आत्मा का, रूह से रूह का। एकांगी प्रेम में आस्था और भक्ति चरम पर होती है, क्योंकि इसमें दूसरा कोई होता ही नहीं, होता भी है तो सक्रीय नहीं होता, होता भी है तो आलम्बन मात्र होता है, उपासना के लिए कोई पत्थर सामने रख लिया हो जैसे। आज भी मेरे सामने एक पत्थर रखा है। मैं पूज रही हूँ उसे, पूर्ण एकाग्रता के साथ। प्रेम मुझे ऊर्जा प्रदान करता है, मानव-मन के भीतर घुसने का रास्ता दिखाता है, अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाने-समझने की सामर्थ्य प्रदान करता है और मुझे तैयार करता है न्याय-युद्ध के लिए, जीवन-युद्ध में विजयी होने के लिए। मैं निरन्तर प्रेम में हूँ क्योंकि अभी जीवन की लड़ाइयाँ मेरे सामने हैं, जिनमें मुझे निरन्तर जीतना है।


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