Thursday, 2 February 2017

भ्रमित लोग Kavita 260

भ्रमित लोग

मैं इसे याद करती हूँ
लोग समझते हैं, मैं उसे याद करती हूँ।

मैं इस के लिए रोती हूँ
लोग समझते हैं, मैं उस के लिए रोती हूँ।

मैं इसे बेइंतहा चाहती हूँ
लोग समझते हैं, मैं उसे बेइंतहा चाहती हूँ।

मैं इस पर मरती हूँ
लोग समझते हैं, मैं उस पर मरती हूँ।

मैं इस पर कविता लिखती हूँ
लोग समझते हैं, मैं उस पर कविता लिखती हूँ।

मैं इस से टूट कर भी जुड़ी हुई हूँ
लोग समझते हैं, मैं उस से टूट कर भी जुड़ी हुई हूँ।

मैं वहाँ हूँ, जहाँ हूँ
लोग समझते हैं, मैं वहाँ हूँ, जहाँ मैं नहीं हूँ।

मैं वर्तमान में भ्रमण कर रही हूँ
लोग अतीत में भ्रमण कर रहे हैं।

मैं होशोहवास में हूँ
लोग भ्रमित हैं।

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